कानून के शासन को मानने वाला और इसके लिए सख़्त रहने वाला मुख्यमंत्री हर प्रदेश के लिए जरूरी है। जब तक उसकी यह सख्ती धर्म, जाति, लिंग और आर्थिक सामाजिक स्थिति के अनुसार बदलती नहीं है, जब तक वह सिर्फ़ और सिर्फ़ कानून के शासन के लिए प्रतिबद्ध रहता है तब तक यह योग्यता प्रदेश के लिए वरदान जैसी साबित होती है। असल में यहाँ रोल सख्ती का नहीं बल्कि कानून को निष्पक्ष तरीके से लागू करवाने का है। ध्यान इस पर दिया जाना चाहिए कि कानून निष्पक्ष रहे।

सड़क पर नमाज के लिए योगी की चेतावनी

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है, “उत्तर प्रदेश में अब सड़कों पर नमाज़ नहीं होगी… नमाज़ पढ़नी है तो शिफ्ट में पढ़िए.. प्यार से मानेंगे तो ठीक, नहीं मानेंगे तो दूसरा तरीका अपनाया जाएगा”। अगर थोड़ी देर के लिए भाषा की कठोरता के बारे में भूल जाएँ तो यह ठीक ही है कि नमाज़ पढ़ने के लिए सड़कों का इस्तेमाल क्यों करें? नमाज़ के लिए स्थल बने हुए हैं, नमाज़ वहीं पर पढ़नी चाहिए। मई के अंत में बकरीद आने वाली है, शायद सीएम योगी अपनी बात इसी संदर्भ में कह रहे हैं। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि अगर सीएम योगी क़ानून और व्यवस्था को लेकर सतर्क होते, कानून और व्यवस्था उनकी प्राथमिकता होती तो उनका ऐसा ही भाषण हर धर्म के लिए होता। मेरी नज़र में इस भाषा में उनका कोई भी संदेश या भाषण तब नहीं आया जब बात हिंदू धर्म के किसी आयोजन की हो रही हो। सावन के महीने में हर साल होने वाली पवित्र कांवड़ यात्रा के दौरान कुछ कांवड़ियों द्वारा किया जाने वाला उत्पात किसी से छिपा नहीं है। मेरठ, मुजफ्फरनगर, ग़ाज़ियाबाद, शाहजहांपुर, कानपुर, सहारनपुर और रुड़की और हरिद्वार में कांवड़ियों द्वारा कानून व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ा दी गईं लेकिन कभी सीएम योगी द्वारा इस किस्म की कठोर भाषा का इस्तेमाल नहीं किया गया।
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यूपी में कानून और व्यवस्था की बात क्यों नहीं?

मैं मन से यह चाहता था कि जनसंख्या के आधार पर भारत के सबसे बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री होने के नाते योगी आदित्यनाथ ईमानदारी से कानून और व्यवस्था की बात करते। लेकिन जब इसी भाषण को पूरा सुना तो पता चला कि वो सिर्फ़ कानून और व्यवस्था का इस्तेमाल कर रहे थे और उनका निशाना कहीं और था। इस भाषण की शुरुआत में योगी आदित्यनाथ बहुत गर्व से कहते हैं कि “लोग मुझसे पूछते हैं साहब आपके यहां यूपी में क्या सड़कों पर सचमुच नमाज नहीं होती? मैं कहता हूं क़तई नहीं होती है। आप जाके देख लो नहीं होती है”। कितने ताज्जुब की बात है कि 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य लेकर चल रहे मुख्यमंत्री के पास जब लोग आते हैं तो उनकी चिंता सिर्फ़ इतनी होती है कि सड़कों पर नमाज़ होती है या नहीं? सीएम के पास कोई यह पूछने नहीं आया कि क्या आपके प्रदेश में बलात्कार बंद हो गए? कोई यह पूछने नहीं आया कि आपके प्रदेश में सामाजिक न्याय की स्थिति क्या है? आपके यहाँ दलितों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों की स्थिति क्या है? आपके प्रदेश में आदिवासियों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों की स्थिति क्या है? ग़रीबी की स्थिति क्या है?

यूपी में बेतहाशा बढ़ती आर्थिक असमानता

अगर कोई आया भी होगा तो सीएम योगी कभी यह बात खुले मंच से नहीं बतायेंगे क्योंकि यूपी की हालत बहुत ज़्यादा बदहाल है और 8 सालों से सत्ता में रहने के बाद अब पूर्ववर्ती सरकारों को उतना कोसना संभव नहीं है जितना 2017 में था। योगी यह नहीं बताना चाहते कि आर्थिक समृद्धि को लेकर वो प्रदेश को लगातार झूठी दिलासा क्यों दे रहे हैं। असल में यूपी में लोगों की जेब में पैसा नहीं है लेकिन जीडीपी लगातार बढ़ती जा रही है। इसका कारण है बेतहाशा बढ़ती आर्थिक असमानता। यूपी सालाना प्रतिव्यक्ति आय के मामले में देश में 32वें स्थान पर है। यही आर्थिक असमानता नीति आयोग के मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स में भी दिखती है, जिसके अनुसार राज्य की 22.93% आबादी बहुआयामी गरीबी से जूझ रही है और यूपी देश का चौथा सबसे गरीब राज्य है। 

साक्षरता की बदहाल हालत यह है कि 67.68% की औसत साक्षरता दर के साथ उत्तर प्रदेश 29वें स्थान पर है। इसके बावजूद यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में भारी संख्या में स्कूल बंद किए गए हैं। 2014-2024 के बीच कुल बंद हुए लगभग 1 लाख स्कूलों में से एक चौथाई यानी लगभग 25 हज़ार तो सिर्फ़ यूपी में ही बंद कर दिए गए हैं।

श्रमबल की स्थिति

स्कूलों के बंद या उनका विलय होने से सर्वाधिक नुक़सान लैंगिक समानता को होता है। उत्तर प्रदेश ‘लैंगिक असमानता’ या कहें कि लैंगिक अंतराल के मामले में देश में सर्वाधिक बुरी स्थिति में है। श्रमबल में भागीदारी(LFPR) के मामले में यूपी आख़िरी स्थान पर है। यूपी में श्रमबल में जहाँ पुरुषों की भागीदारी लगभग 82% है वहीं महिलाओं की भागीदारी मात्र 32% ही है। शहरों में हालात तो और भी ज़्यादा बुरे हैं। यह तो धन्यवाद देना चाहिए उस विचार का जो ‘स्वयं सहायता समूह’ के रूप में देश के नीति निर्माताओं द्वारा लाया गया जिसने महिलाओं की भागीदारी को धीरे धीरे LFPR में बढ़ाया वरना ना जाने क्या होता। 1972 में SEVA (सेल्फ इम्प्लॉयड वुमन्स एसोसिएशन) से अपनी यात्रा शुरू करने वाले इस विचार ने 2011 में ‘राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन’ के माध्यम से एक आंदोलन का रूप ले लिया और महिलाओं की आर्थिक स्थिति को एक नया आयाम दिया लेकिन पिछले 10 साल इस नजर से बेहतर नहीं रहे।

महिलाओं की अनदेखी का प्रभाव हर क्षेत्र पर पड़ा। यूपी में महिला साक्षरता दर मात्र 57.18% है। किसी ने हो सकता है नमाज़ की तरह यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ से इस बारे में ना पूछा हो लेकिन स्वास्थ्य संकेतकों में यूपी की स्थिति चिंताजनक है। शिशु मृत्यु दर (IMR) के मामले में यूपी देश के सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले शीर्ष 3 राज्यों में शामिल है और मातृत्व मृत्यु दर के मामले में यूपी 28 राज्यों में से 26वें स्थान पर है।
विचार से और
योगी भाग्यशाली हैं कि उनसे लोग नमाज़ के बारे में आकर तो पूछते हैं और वो बड़े गर्व से कहते हैं कि “सरकार का नियम सार्वभौम है। सबके लिए समान रूप से लागू होता है…अराजकता नहीं सड़कों पर फैलने देंगे। प्यार से मानेंगे ठीक बात है। नहीं मानेंगे तो दूसरा तरीका अपनाएंगे”। नमाज़ के सिलसिले में उनको ‘अराजकता’ दिख रही है लेकिन उनका यह डर अपराधियों के ख़िलाफ़ न जाने क्यों नहीं चलता? महोबा में खुलेआम NEET की तैयारी करने वाली नाबालिग एक छात्रा को कुछ गुंडे ‘किडनैप’ करके ले गए। उसके साथ 16 दिनों तक बलात्कार किया गया, प्रताड़ित किया गया और यूपी की काबिल पुलिस 16 दिन बाद कहती है कि लड़की को सकुशल बरामद करके परिवार को सौंप दिया गया है। मेरा सवाल है कि अगर यूपी की पुलिस इतनी मजबूत है और सीएम योगी का प्रशासन इतना सख़्त है कि ‘दूसरे तरीके’ अपनाने में माहिर है तो ये गुंडे यूपी की बेटियों की इज्जत कैसे लूट रहे हैं? आप कब ‘दूसरा तरीका’ अपनायेंगे? या यह दूसरा तरीका सिर्फ़ नमाज़ पढ़ने वालों के लिए आरक्षित रखा हुआ है?

बलात्कार के आरोपी के लिए सड़क पर जुलूस क्यों?

सीएम योगी, आपको ख़ुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि सड़क पर नमाज़ ना पढ़ने देने को आप अपना गौरव समझते हैं उसे कानून और व्यवस्था से जोड़ते हैं लेकिन जब बलात्कार का एक आरोपी, जो हिंदू युवा वाहिनी का सदस्य भी है, उसी सड़क में अपनी ज़मानत का जुलूस निकालता है, बलात्कार पीड़िता को चिढ़ाता है तो आपको कुछ नहीं कहना होता, क्यों? आख़िर इस जुलूस वाले बलात्कारी को उस ‘दूसरे तरीके’ का भय क्यों नहीं है?

असलियत यह कि सीएम योगी के नेतृत्व में यूपी एक ऐसा प्रदेश बन गया है जहाँ एनकाउंटर तो हजारों हुए हैं लेकिन महिलाओं के साथ बलात्कार करने वालों, दलितों को खुलेआम पीटने वालों को कोई भय नहीं है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो(NCRB) की मई 2026 की रिपोर्ट में यूपी में महिलाओं क्र ख़िलाफ़ अपराधों के सर्वाधिक मामले सामने आए हैं, दहेज़ हत्याओं के मामले में यूपी पहले स्थान पर है, महिलाओं के बलात्कार के मामले में यूपी राजस्थान एक बाद दूसर स्थान पर है। दलितों के ख़िलाफ़ अपराधों को रोकने में भी योगी सरकार नाकाम रही है। कानपुर में 16 साल के एक दलित किशोर को सिर्फ़ इसलिए पीटा गया, उसके कपड़े उतारे गए और जूते चाटने पर मजबूर किया गया क्योंकि उसने हैंडपंप में रखी बाल्टी को छू लिया था क्योंकि उसे प्यास लगी थी। ऐसा नहीं है यह एक मात्र मामला हो जिसे अतिरंजित करके बताया जा रहा है। 

असल में यूपी दलितों के ख़िलाफ़ अपराध के मामले में भारत में पहले स्थान पर है। देशभर में दलितों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों का एक चौथाई अकेले यूपी में दर्ज किया गया है। मेरे समझ से बाहर है कि सीएम योगी की ‘सख्ती’ का भय इन अपराधियों को क्यों नहीं है?

NCRB के आंकड़े क्या कहते हैं?

NCRB के आंकड़े बता रहे हैं कि यूपी हर साल होने वाली हत्याओं के मामले में भी पहले स्थान पर है। यूपी में हर दिन लगभग 9 हत्याएं हो रही हैं(NCRB)। जो प्रदेश अपराध की राजधानी बन रहा हो वहाँ निवेश सिर्फ़ एक वादा ही हो सकता है कोई हक़ीक़त नहीं। अपनी नाकामियों के लिए अल्पसंख्यकों को टारगेट करना हमेशा आसान रहा है।
 
सड़क पर नमाज़ रोकने के पहले सड़क पर महिलाओं को सुरक्षित किए जाने पर विचार करना चाहिए, दलितों के ख़िलाफ़ अपराध करने की मानसिकता वालों को सख़्त संदेश देना जरूरी है। हत्याओं और बलात्कारों का सिलसिला थामना जरूरी है। अगर प्रदेश की 50% आबादी(महिलाएं) असुरक्षित ही बनी रहीं, 85% वंचित वर्ग के लोग असुरक्षित ही बने रहे तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि वर्तमान उत्तर प्रदेश किसके लिए है? यहाँ विकास कैसे होगा? ‘सख्ती’ की बात करने वाले योगी जी को यह बताना चाहिए कि आखिर क्यों प्रदेश की राजधानी लखनऊ महिलाओं के लिए (20 लाख से अधिक आबादी वाले देश के शहरों में) देश का दूसरा सबसे खतरनाक शहर है?

मुसलमान जनसंख्या पर योगी के विचार

मुसलमानों की बढ़ती जनसंख्या को लेकर सीएम योगी आज भी उसी अवैज्ञानिक और अशुद्ध विचार को अपनाये हुए हैं जिसे दशकों से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ फैलाता रहा है। अपने इसी भाषण में सीएम योगी ने कहा कि “(मुसलमान) लोगों ने मुझसे कहा साहब कैसे होगा? हमारी संख्या ज्यादा है। हमने कहा शिफ्ट में कर लो। तुम्हारे घर में रहने की जगह नहीं है तो भाई संख्या नियंत्रित कर लो”। योगी यह बताना चाह रहे थे कि मुसलमानों की जनसंख्या ज़्यादा है उसे नियंत्रित करना चाहिए। यह एक झूठ है जिसे भय फैलाने और चुनावी लाभ लेने के लिए RSS द्वारा दशकों से फैलाया जा रहा है। जबकि तथ्य कुछ और कहते हैं। जनसंख्या के आंकड़े और संबंधित विशेषज्ञ यह बात स्पष्ट रूप से बता रहे हैं कि मुसलमानों की जनसंख्या लगातार स्थिर हो रही है। और यह कोई आज की घटना नहीं है यह सिलसिला लगातार 1991 से चल रहा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार, मुसलमानों की कुल प्रजनन दर(TFR) 1992 के 1992 के 4.41 से गिरकर 2019-20 में 2.36 पहुँच गई है। यह किसी भी धर्म की जनसंख्या में होने वाली सबसे बड़ी गिरावट है। यह जल्द ही 2.1 TFR का आंकड़ा छू लेगी जिसे जनसंख्या स्थायित्व का आँकड़ा माना जाता है।
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भारत में ‘राज्य’ को धर्मनिरपेक्ष माना गया है। इसी तरह कानून और व्यवस्था, यहाँ का शासन और जनप्रतिनिधियों को भी संवैधनिक रूप से धर्मनिरपेक्ष चरित्र प्रदान किया गया है। इसलिए अवसर कोई भी हो, सख्ती कैसी भी हो उसे अपने धर्मनिरपेक्ष चरित्र के बाहर नहीं जाना चाहिए। धर्मनिरपेक्ष चरित्र से बाहर जाते ही राज्य का चरित्र भारतीय नहीं रहेगा। और जो भारतीय नहीं उसे शासन में रहने और उसे संभालने का कोई हक नहीं।

एक संवैधानिक पद को धारण करने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को वही भाषा इस्तेमाल करनी चाहिए जैसी संविधान एक राज्य के राजनैतिक प्रमुख से अपेक्षा रखता है। अन्य लोगों की तरह मैं बात को कहने से बचूँगा कि योगी आदित्यनाथ सिर्फ़ हिंदुओं के नेता हैं। मैं ऐसा कहने से तब तक बचूँगा जब तक सीएम ख़ुद यह नहीं स्वीकार करते कि उनका कानून और व्यवस्था का मॉडल एक धर्म के समर्थन और दूसरे के विरोध के लिए है। हालांकि वो कई बार ऐसी ही भाषा इस्तेमाल करते हैं लेकिन जब तक स्पष्ट ना हो मैं नहीं कहूँगा।