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दक्षिण की राजनीति में भी परिवारवाद, पर दिल्ली जैसा शोर नहीं

प्रियंका गाँधी के राजनीति में आ जाने के बाद एक बार फिर राजनीति में वंशवाद, परिवारवाद, भाई-भतीजावाद को लेकर बहस छिड़ गई है। दक्षिण भारत की राजनीति में भी परिवारवाद ही हावी है। सभी असरदार क्षेत्रीय पार्टियों में परिवारवाद है, एक परिवार के इर्द-गिर्द ही राजनीति घूमती-फिरती है। और तो और, आने वाले दिनों में स्थिति-परिस्थिति के बदलने के आसार भी नहीं हैं, क्योंकि बड़े नेताओं के राजनीतिक वारिस उन्हीं के परिवार से हैं। हालाँकि इनके बीच ही केरल एक ऐसा राज्य है जहाँ परिवारवाद मोटे तौर पर नहीं के बराबर है।

तेलंगाना 

तेलंगाना में सत्तारूढ़ पार्टी- तेलंगाना राष्ट्र समिति एक परिवार की पार्टी माने जाने लगी है। मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) के परिवार के पाँच लोग बड़े पदों पर हैं। केसीआर ने अपने विधायक बेटे के. तारक रामा राव (केटीआर) को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना कर परोक्ष रूप से उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया है। उनकी बेटी कविता सांसद हैं। बहन के बेटे हरीश राव विधायक तो एक और क़रीबी रिश्तेदार संतोष राज्यसभा सदस्य हैं। पार्टी में इन्हीं पाँचों का वर्चस्व है। 

आंध्र प्रदेश

आंध्र प्रदेश में सत्ताधारी तेलुगु देशम पार्टी का भी यही हाल है। पार्टी अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू अपने इकलौते बेटे लोकेश को परोक्ष रूप से अपना राजनीतिक उत्तराधारी घोषित कर चुके हैं। लोकेश चंद्रबाबू मंत्रिमंडल में मंत्री भी हैं और पार्टी में भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। ग़ौरतलब है कि तेलुगु देशम को तेलुगु फ़िल्मों के सुपरस्टार एन. टी. रामा राव (एनटीआर) ने स्थापित किया था। उन्हीं के दामाद चंद्रबाबू नायडू ने उनके ख़िलाफ़ बग़ावत कर सत्ता छीन ली थी। लेकिन बड़ी बात यह है कि स्थापना से लेकर अब तक यानी पूरे 35 साल पार्टी की कमान एक परिवार के हाथ में ही रही। एन. टी. रामा राव के परिवार के अन्य लोग भी राजनीति में हैं। उनके बेटे बालकृष्णा जो चंद्रबाबू के समधी भी हैं, वह विधायक भी हैं। एन. टी. रामाराव की बेटी पुरंदेश्वरी बीजेपी में हैं और उनके पति वेंकटेश्वर राव और बेटे ने हाल ही में जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस जॉइन की है। 

  • बात वाईएसआर कांग्रेस की करें तो यहाँ भी वंशवाद ही है। जगन कांग्रेस के दिग्गज नेता दिवंगत वाई.एस. राजशेखर रेड्डी (वाईएसआर) के बेटे हैं। पिता की मृत्यु के बाद जगन ने कांग्रेस से बग़ावत कर अपने पिता के नाम से अपनी ख़ुद की पार्टी बना ली। उनकी राजनीति अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ने की है।

कर्नाटक

कर्नाटक की सबसे असरदार क्षेत्रीय पार्टी जनता दल सेक्युलर यानी जेडीएस है। यह भी एक ही परिवार के वर्चस्व वाली पार्टी है। इस पार्टी के मुखिया पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा का परिवार ही इस पार्टी को चलाता है। देवेगौड़ा के छोटे बेटे कुमारवामी कर्नाटक के मुख्यमंत्री हैं। उनके बड़े बेटे रेवन्ना मंत्री हैं। कुमारस्वामी की पत्नी विधायक हैं। कुमारस्वामी और रेवन्ना के बेटों ने भी राजनीति में अपने कदम जमा लिए हैं और आने वाले सालों में पार्टी की कमान इन्हीं के हाथों में रहेगी। कुमारस्वामी के बेटे निखिल को जेडीएस के भावी मुखिया बनने की कोशिशें शुरू हो गई हैं।

तमिलनाडु

तमिलनाडु में भी हाल कुछ ऐसा ही है। डीएमके में भाई-बहन यानी स्टालिन और कनिमोडी का ही वर्चस्व है। ये दोनों करुणानिधि की संतान हैं और करुणानिधि क़रीब  50 साल तक डीएमके के अध्यक्ष रहे हैं। उन्होंने अपने जीतेजी ही अपने बेटे स्टालिन को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। वह करुणानिधि सरकार में उपमुख्यमंत्री बनाये गए और उन्हें पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष भर बनाया गया था। करुणानिधि के एक और बेटे अलगिरी भी राजनीति में हैं लेकिन उन्होंने अपने छोटे भाई स्टालिन के नेतृत्व को चुनौती दी थी, इस वजह से उन्हें पार्टी से दूर कर दिया गया। स्टालिन के बेटे उदयनिधि को स्टालिन के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा है। तमिलनाडु की दूसरी पार्टियों में या तो 'वन मैन शो' है या परिवारवाद हावी है। 

  • डीडीएमके के सर्वेसर्वा फ़िल्मस्टार विजयकांत हैं, पीएमके पिता रामदास और बेटे अंबुमणि रामदास की पार्टी है। वाइको एमडीएमके के सर्वेसर्वा हैं। रजनीकांत और कमल हासन की पार्टी में भी वे ही सब कुछ हैं। सत्ताधारी एआईएडीएमके में 'अम्मा' जयललिता की विरासत को अपना बनाने की नेताओं में होड़ मची हुई है। 

दक्षिण में केरल ही एक ऐसा राज्य है जहाँ पार्टियों में वंशवाद और भाई-भतीजावाद न के बराबर है और यह शायद वामपंथ आंदोलन की वजह से है।

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अरविंद यादव
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