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तीन तलाक़ बिल को मुसलमान मानते हैं मज़हब में दख़लंदाज़ी 

तीन तलाक़ विधेयक लोकसभा में पास हो गया है। राज्यसभा में पास होगा या नहीं, इस पर संशय बना हुआ है। विधेयक क़ानून का रूप ले पाएगा या नहीं, यह इस पर निर्भर करेगा कि राज्यसभा में इस विधेयक का क्या होता है। लेकिन देश का मुसलमान इस विधेयक को मजहबी मामलों में सरकार की ग़ैरज़रूरी दख़लअंदाज़ी मानता है। यही वजह है कि तीन तलाक़ का विरोध करने वाले तमाम संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता भी इस विधेयक का समर्थन नहीं कर रहे हैं। सबका मानना है कि अगर यह विधेयक इसी रूप में लागू होता है तो इससे मुस्लिम समाज पर बुरा असर पड़ेगा। इससे कहीं ना कहीं संवैधानिक रूप से मिली उनकी धार्मिक आज़ादी कमज़ोर होगी।

तीन तलाक विधेयक का पुरज़ोर विरोध करने वाला ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड लोकसभा में इसके पास किए जाने को सरकार की हठधर्मिता क़रार देता है। पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य कमाल फ़ारुक़ी ने 'सत्य हिंदी' से  कहा कि मुसलमानों के मजहबी मामलों में यह सरकार की खुली दख़लअंदाज़ी और दादागिरी है। कमाल फ़ारुक़ी पूछते हैं कि जब दुनिया के किसी देश में तलाक़ को अपराध नहीं माना गया है और भारत में भी किसी भी समुदाय में इसे अपराध नहीं माना गया है तो सिर्फ मुसलमानों के मामले में इसे अपराध मारकर तीन साल की सज़ा का प्रावधान क्यों थोपा जा रहा है ? 

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य कमाल फ़ारुक़ी का साफ़ मत है की सरकार इस विधेयक से प्रभावित होने वाले मुस्लिम समाज के अलग-अलग मसलकों के धर्मगुरुओं और अन्य बुद्धिजीवियों से सलाह मशवरा करके ज़रूरी संशोधन करके ही इसे संसद में पास करे।

कमाल़ फ़ारुक़ी के मुताबिक़, कांग्रेस ने लोकसभा में इस बिल को लेकर स्टैंड लिया है उसका वह पूरी तरह समर्थन करता है।

'मुसलमानों की सलाह ज़रूरी'

उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को तीन तलाक़ रोकने के लिए क़ानून बनाने का आदेश नहीं दिया है। अगर सरकार कानून बनाती है तो सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा है कि इससे संबंधित समुदाय के लोगों से सलाह मशवरा के बाद बनाया जाना चाहिए।

इस विधेयक से मुस्लिम समाज पर क्या असर पड़ेगा, इस बारे में पूछे जाने पर फ़ारुक़ी कहते हैं कि मुसलिम समाज में अब तीन तलाक़ को लेकर काफ़ी जागरुकता आ रही है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस मामले में कई क़दम उठाए हैं और आगे भी कई क़दम उठाने की तैयारी में है। मसलन बोर्ड अब इस बात पर ज़ोर दे रहा है कि निकाह के वक़्त ही निकाहनामे में यह शर्त डाली जाए कि शौहर अपनी पत्नी को एक साथ तीन तलाक़ नहीं देगा।अगर वह तलाक़ देता है तो उसके बदले में उसे मेहर की कई गुनी रकम देनी होगी।

पिछले करीब 2 साल से देश में तीन तलाक़ को लेकर चल रही बहस से मुसलिम समाज में काफ़ी जागरूकता आ रही है। लोग अपने अपने स्तर से इस बुराई को ख़त्म करने की पहल कर रहे हैं। इस तरह की बुराई सामाजिक जागरूकता से दूर हो सकती है क़ानून बनाकर नहीं। क़ानून भी अगर बने तो वह समाज की जन भावना के अनुरूप होना चाहिए। हिंदू समाज से संबंधित जितने भी क़ानून बने हैं उनके बनते समय मुस्लिम समाज ने अपनी तरफ से कोई राय नहीं दी थी। लिहाजा तमाम हिंदू संगठनों को तलाक़ से संबंधित कानून पर राय बंद कर देनी चाहिए और मुसलिम समाज से जुड़े इस मसले का समाधान समाज के भीतर से ही किया जाना चाहिए।

'क़ुरान की रोशनी में हो'

ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर भी इस विधेयक के मौजूदा स्वरूप के खिलाफ़ हैं। वह भी पहले साफ़ कर चुकी हैं की तीन तलाक़ से संबंधित विधायक क़ुरान की रोशनी में होना चाहिए उनका कहना है कि तीन तलाक़ क़ुरान के मुताबिक़ नहीं है। इसी लिए वो इसकी मुखालफ़त करती रहीं हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि सरकार कोई भी क़ानून बना के मुसलमानों में थोप देगी। उनका कहना है कि यह विधायक अगर क़ानून का रूप लेता है तो इससे मुसलम समाज पर निहायत ही बुरा असर पड़ेगा। तीन तलाक़ के ज़्यादतर मामले ग़रीब तबके में होते हैं। ऐसी सूरत में अगर तलाक़ देने वाले को जेल में डाल दिया जाएगा तो तलाक़ पाई औरत और उसके बच्चों का भरण पोषण वो जेल में रहकर कैसे दे पाएगा। यह सबसे अहम सवाल है और इस पर सरकार को दोबारा खुले दिल से ग़ौर करना चाहिए। वे सरकार की हठधर्मिता से खफ़ा हैं। उनका कहना है कि सरकार ने यह विधेयक बग़ैर मुस्लिम संगठनों के राय मशवरा से तैयार किया है। 

ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर का कहना हे कि सरकार को इस मामले में कम से कम उन मुसलिम महिला संगठनों से बात करनी चाहिए थी जो तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर लड़ाई लड़ रही हैं और जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

'ज़बरदस्ती ठीक नहीं'

वहीं जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने भी कहा है कि सरकार मुसलमानों पर ज़बरदस्ती थोपना चाहती है। अगर सरकार को क़ानून लाना ही है तो मुस्लिम संगठनों से सलाह मशवरा करना चाहिए था। साथ उन्होंने यह भी कहा कि मुसलमान ऐसी  किसी बात को मानने के लिए बाध्य नहीं है जो उनकी धार्मिक आज़ादी के ख़िलाफ़ हो। जो मुसलमान इसे मानना चाहेंगे वह मानेंगे और जो नहीं माना चाहेंगे जो पहले से चले आ रही परंपरा को मानता है उन्हें कोई असर नहीं पड़ेगा। दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम अब्दुल्ला ने तीन तलाक़ विधेयक को मोदी सरकार का राजनीतिक और चुनावी एजेंडा क़रार दिया है। उन्होंने बाकायदा एक बयान जारी करके कहा है कि तीन तलाक़ विधेयक को सरकार अपने राजनीतिक एजेंडे को पूरा करने का हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है। सच्चाई तो यह है कि सरकार को मुसलिम महिलाओं की समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं है। बीजेपी और संघ परिवार इस विधेयक के बहाने अपने सियासी और चुनावी मक़सद हासिल करना चाहते हैं।

सरकार ने उन मुसलिम महिला संगठनों की भी राय नहीं ली जो तीन तलाक़ के पक्ष में हैं।

सुझाव खारिज

लोकसभा में तीन तलाक विधेयक पर बहस के दौरान सीपीएम के मोहम्मद सलीम और ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन के असदुद्दीन ओवैसी ने विधायक के खिलाफ़ मजबूती से अपने तर्क रखे थे। मुसलिम समाज इन तर्कों से प्रभावित है। असदुद्दीन ओवैसी ने 3 संशोधन की सुझाए थे जो बहुमत से गिर गए। मुसलिम समाज में एक आम राय यह बनती दिख रही है तीन तलाक़ तो ख़त्म होनी चाहिए। इसके लिए क़ानून भी बने। लेकिन 3 साल की सज़ा का प्रावधान ग़लत है। अगर सरकार को यह प्रावधान लाना ही है तो फिर हिंदू मैरिज एक्ट, ईसाई और पारसी मैरिज एक्ट में भी संशोधन करके बगैर तलाक़ दिए अपनी पत्नी को छोड़ने वालों के खिलाफ भी इसी तरह 3 साल की सज़ा का प्रावधान बनाना चाहिए। 

लोकसभा में विधेयक पर असदउद्दीन ओवैसी और रविशंकर प्रसाद के बीच तीखी नोंकझोंक हुई, पर उनके संशोधनों को सरकार ने खारिज कर दिया।

'नीयत बुरी नहीं'

कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद शुरू से यह बात कहते रहे हैं कि तीन तलाक पर कानून के पीछे सरकार की कोई दुर्भावना नहीं है। न ही यह किसी धार्मिक समुदाय के खिलाफ है। बल्कि सरकार लैंगिक समानता के आधार पर यह विधेयक ला रही है। तीन तलाक विधेयक पर रविशंकर प्रसाद का यही तर्क अब मोदी सरकार पर उल्टा पड़ रहा है। मुस्लिम बुद्धिजीवी पूछ रहे हैं कि अगर सरकार लैंगिक समानता के आधार पर विधायक ला रही है तो फिर तत्काल तलाक देकर अपनी पत्नी को खुद से अलग करने पर से मुस्लिम समुदाय के लोगों को ही तीन साल की सजा क्यों मिले बाकी समुदाय के लोगों को यह सजा क्यों नहीं मिलनी चाहिए ? ग़ौरतलब है कि देश में क़रीब 50 लाख ऐसी हिंदू महिलाएं हैं जिनके पतियों ने उन्हें बगैर तलाक दिए छोड़ रखा है। असदुद्दीन ओवैसी कई बार इस मामले को लोकसभा में उठाकर सरकार को घर चुके हैं। उनका कहना है कि अगर सरकार को मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने की चिंता है तो सरकार को हिंदू महिलाओं को न्याय दिलाने की भी चिंता होनी चाहिए।

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