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गहलोत की चाल में फँसे सचिन, लड़ना होगा विधानसभा चुनाव

राजस्थान में सीएम पद को लेकर चल रहे घमासान में फ़िलहाल अशोक गहलोत आगे निकलते दिख रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ख़ुद चुनाव मैदान में नहीं उतरना चाहते थे लेकिन गहलोत के दाँव के कारण अब उन्हें चुनाव लड़ना पड़ेगा। राजस्थान में विधानसभा की 200 सीटें हैं और राज्य में 7 दिसंबर को एक चरण में मतदान होगा।

हर हाल में चुनाव लड़ना चाहते थे गहलोत

अशोक गहलोत के कांग्रेस महासचिव बनने के बाद यह माना जा रहा था कि अब वे राज्य की राजनीति नहीं करेंगे और सचिन पायलट के सामने कोई चुनौती नहीं है। लेकिन गहलोत राज्य की राजनीति से बाहर नहीं जाना चाहते और कांग्रेस की पहली सूची में वे अपना नाम चाहते थे। इसी कारण उन्होंने अपने बेटे वैभव गहलोत तक को अपनी सीट से उम्मीदवार नहीं बनाया। दूसरी ओर पायलट इसके लिए तैयार नहीं थे। गहलोत के मैदान में उतरने की ज़िद के कारण ही उन्हें चुनाव लड़ने के लिए तैयार होना पड़ा। ऐसा इसलिए कि विधायक न होने पर पायलट के सीएम की रेस से बाहर होने की संभावना ज़्यादा होती।
सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच चुनाव लड़ने या न लड़ने को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि पार्टी हाईकमान को इसमें दख़ल देना पड़ा। गहलोत हाईकमान को यह समझाने में कामयाब रहे कि अगर पायलट और उन्हें चुनाव लड़ने से रोका जाता है तो कार्यकर्ताओं के बीच अच्छा संदेश नहीं जाएगा। इसके बजाय सभी दावेदारों को चुनाव लड़ाया जाए। हाईकमान ने उनकी बात मान ली और गहलोत को तो टिकट मिला ही, पायलट को भी मैदान में उतरना पड़ा।

पायलट को चाहिए आसान सीट

सचिन पायलट ने कभी भी विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा है। ऐसे में उन्हें अपने लिए एक ऐसी सीट की तलाश करनी होगी जहाँ से वे आसानी से जीत हासिल कर सकें। ऐसी सीट न मिलने पर उन्हें अपने समर्थकों के लिए प्रचार करने का मौक़ा नहीं मिल पाएगा।यह संभावना है कि पायलट दौसा या अजमेर लोकसभा की किसी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। वैसे दौसा से भाजपा सांसद हरीश मीणा के कांग्रेस में शामिल होने से सचिन की राह आसान हो गई है। यहाँ याद दिला दें कि 2008 में सी.पी. जोशी सिर्फ़ एक वोट से चुनाव हार कर सीएम बनने की दौड़ से बाहर हो गए थे। अब पायलट गुट को भी यही डर सता रहा है कि उन्हें भी कहीं ऐसी स्थिति का सामना न करना पड़े।

गहलोत को नहीं होगी मुश्किल

अगर पायलट कम अंतर से चुनाव जीतते हैं तो उन्हें पार्टी नेतृत्व को इस बात का जवाब देना मुश्किल होगा कि अपनी सीट पर ही फँस जाने वाला शख़्स क्या मुख्यमंत्री बनने की योग्यता रखता है? दूसरी ओर, गहलोत के लिए ऐसी कोई मुश्किल नहीं है। जोधपुर से पाँच बार सांसद रह चुके गहलोत सरदारपुरा से लगातार चार चुनाव जीत चुके हैं और वर्तमान में इसी सीट से विधायक हैं। सरदारपुरा से चुनाव जीतना उनके लिए बहुत आसान माना जा रहा है।
अगर दोनों नेता चुनाव जीत जाते हैं तो भी गहलोत का दावा मजबूत है। ऐसा इसलिए कि उनकी उम्र 70 साल के करीब है और पांच साल सीएम रहने के बाद वह सक्रिय राजनीति से संन्यास ले सकते हैं। दूसरी ओर 41 साल के पायलट उनसे काफ़ी छोटे हैं और उनके पास काफ़ी समय है। पार्टी हाईकमान इस बात को ध्यान में रखकर गहलोत के पक्ष में फ़ैसला ले सकता है।

गहलोत जताते रहे हैं दावेदारी

गहलोत ख़ुद सीएम पद को लेकर अपनी दावेदारी जताते रहे हैं। कुछ समय पहले जोधपुर में उन्होंने कहा था, ‘सीएम बनने जैसी बात अब इतनी बड़ी नहीं रह गई है क्योंकि मैं जिस पद पर पहुंच गया हूं, वह मुख्यमंत्री बनता नहीं बल्कि बनाता है।' इससे पायलट पर दबाव बढ़ गया है।इसी साल जुलाई में उदयपुर में पार्टी की एक बैठक में गहलोत ने ख़ुद को मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में पेश कर दिया था। गहलोत ने कहा था, ‘राजस्थान के लोग एक चेहरे से परिचित हैं, जो 10 वर्षों तक मुख्यमंत्री रह चुका है। मुख्यमंत्री के चेहरे पर इससे अधिक और क्या स्पष्टीकरण क्या हो सकता है?’
गहलोत कहते हैं कि बीजेपी यह भ्रम फैला रही है कि कांग्रेस में फूट है, कलह है जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। कांग्रेस पूरी तरह एकजुट है।
यहाँ यह भी याद रखना ज़रूरी है कि गहलोत के इस बयान से पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता लालचंद कटारिया ने भी कहा था कि गहलोत का नाम मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया जाना चाहिए। बीजेपी लगातार गहलोत और पायलट की इस दूरी को मुद्दा बनाती रही है। इस पर गहलोत कहते हैं कि बीजेपी यह भ्रम फैला रही है कि कांग्रेस में फूट है, कलह है जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। उनके मुताबिक़ कांग्रेस पूरी तरह एकजुट है।
सीएम पद को लेकर हो रही बयानबाज़ी पर पार्टी को आगे आना पड़ा था। पार्टी महासचिव और राज्य के प्रभारी अविनाश पांडेय ने इस कलह को रोकने के लिए कहा था कि चुनाव पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। पांडेय ने पार्टी नेताओं को चेताया था कि वे विधानसभा चुनाव से पहले गैरज़रूरी बयान ना दें। राष्ट्रीय नेतृत्व इस तरह की किसी भी टिप्पणी को गंभीरता से लेगा।
गहलोत पुराने और मँझे हुए नेता हैं और राज्य की पिछड़ी जातियों में उनका अच्छा प्रभाव है। इसके अलावा वह अपनी तैयार की हुई राजनीतिक ज़मीन को किसी हाल में छोड़ना नहीं चाहते। पायलट को चुनाव मैदान में उतरने को मजबूर कर गहलोत ने सीएम की लड़ाई में मनोवैज्ञानिक बढ़त तो बना ही ली है।
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