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क्यों है कोटा के अस्पताल में 38 में से 32 ऑक्सीमीटर ख़राब?

राजस्थान में कोटा के सरकारी जे.के. लोन हॉस्पिटल में इस महीने में कम से कम 104 लोगों की मौत हो गई है, लेकिन इसके लिए ज़िम्मेदारी किसकी है, यह तक तय नहीं हो पायी है। हॉस्पिटल में कई लापरवाहियाँ सामने आई हैं। कई ऐसी रिपोर्टें आ रही हैं जिसमें साफ़-साफ़ पता चलता है कि इन मौतों के लिए ये बड़े कारण हैं।

बाल अधिकारों की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग यानी एनसीपीसीआर की टीम ने हाल ही में हॉस्पिटल का दौरा किया था। टीम ने पाया था कि खिड़कियाँ और दरवाज़े टूटे हुए थे। और ऐसे में हाड़ कँपा देने वाली ठंड में भी बीमार बच्चे भर्ती थे। परिसर में इधर-उधर सूअर घूम रहे थे। 

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एक अन्य जाँच में सामने आया कि जान बचाने में काफ़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मेडिकल उपकरण ही ख़राब पड़े थे। एक रिपोर्ट के अनुसार, जाँच रिपोर्ट में कहा गया है कि पैडियट्रिक डिपार्टमेंट में मेडिकल स्टाफ़ की काफ़ी कमी थी। बेड की संख्या भी काफ़ी कम थी। 

मेडिकल उपकरण की स्थिति

  1. 19 में से 13 वेंटिलेटर ख़राब 
  2. 111 में से 81 इनफ़्यूज़न पंप ख़राब 
  3. 71 में से 44 वार्मर ख़राब
  4. 38 में से 32 ऑक्सीमीटर ख़राब
  5. 28 में से 22 नेबुलाइज़र ख़राब

यह स्थिति साफ़ तौर पर दिखाती है कि ज़िम्मेदार लोगों ने बेहद लापरवाही बरती है। और यह सिर्फ़ दिसंबर महीने में नहीं थी। नवंबर महीने में भी 101 बच्चों की मौत हो गई थी। 2019 में कुल क़रीब 950 बच्चों की मौत हो गई है। ताज्जुब की बात तो यह है कि जब तक यह राष्ट्रीय स्तर पर ख़बर नहीं बनी तब तक इस मामले में सतर्कता बरतने में तेज़ी भी नहीं लाई गई।

बता दें कि अब तक इस मामले में किसी भी स्तर पर अधिकारियों की ओर से सफ़ाई नहीं आई है कि इन लापरवाहियों के लिए किसकी ज़िम्मेदारी बनती है।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अब सफ़ाई भी दे रहे हैं तो यह कि पहले किसी साल 1500, कभी 1400 और कभी 1300 मौतें होती थीं, लेकिन इस बार क़रीब 900 मौतें हुई हैं। लेकिन सवाल है कि ये 900 मौतें भी क्यों हुईं?

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गहलोत ने तो यह भी सफ़ाई दी है और कहा है कि 'राजस्थान में सर्वप्रथम बच्चों के आईसीयू की स्थापना हमारी सरकार ने 2003 में की थी। कोटा में भी बच्चों के आईसीयू की स्थापना हमने 2011 में की थी।' अब उनके यह कहने से बच्चों की ज़िंदगी कैसे बचेगी?

हालाँकि राजनीतिक तौर पर बयानबाज़ी भी शुरू हो गई है। बीजेपी ने जब इसको लेकर हमला बोला तो गहलोत ने कहा कि इसको राजनीति का मुद्दा न बनाया जाए। बिल्कुल ठीक। राजनीति का मुद्दा तो नहीं बनाया जाना चाहिए लेकिन मौतें तो रुकनी चाहिए और अस्पताल की व्यवस्था तो दुरुस्त होनी चाहिए। सिर्फ़ बयानबाज़ी से यह कैसे होगा जब तक ज़िम्मेदारी तय नहीं होगी?

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