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‘महाराष्ट्र, हरियाणा के चुनाव में पहले ही हार मान चुकी थी कांग्रेस’

लोकसभा चुनाव 2019 के चुनाव परिणाम के बाद क्या कांग्रेस निराश हो चुकी थी और उसके नेताओं को यह लगने लगा था कि अब पार्टी का बीजेपी को चुनौती देना मुश्किल है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के जमाने से कांग्रेस पार्टी में काम कर रहे राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बयानों से ऐसा ही लगता है। गहलोत ने अंग्रेजी अख़बार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के कार्यक्रम ‘आइडिया एक्सचेंज’ में शुक्रवार को कहा कि हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव से पहले इन राज्यों में कांग्रेस के नेता अपनी हार मान चुके थे। हालाँकि गहलोत ने कहा कि अब पार्टी को पूरी ताक़त के साथ चुनाव लड़ना चाहिए ना कि हारने वाली मानसिकता के साथ। 
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‘आर्थिक कुप्रबंधन से नाराज़ हैं लोग’

गहलोत ने बातचीत में इस बात पर जोर दिया कि लोग बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन से बेहद नाराज़ और परेशान हैं और कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों के लिये यह सही समय है कि वे सड़कों पर उतरें। गहलोत ने कहा कि जब यह प्रदर्शन बड़े पैमाने पर होगा तो जो संस्थाएँ सीबीआई के दबाव में काम कर रही हैं, जैसे - न्यायपालिका, आयकर विभाग, ईडी और सीबीआई, ये सभी अपना रास्ता बदल लेंगे। गहलोत ने कहा, जैसे ही तसवीर बदलेगी तो जनता का, अधिकारियों और एजेंसियों का मूड भी बदलेगा और वे समझेंगे कि किसी भी समय में हालात बदल सकते हैं। 

गहलोत ने न्यायपालिका को लेकर चिंता जाहिर करते हुए कहा, ‘अब देश एक ही दिशा में जा रहा है। आप न्यायपालिका को देखिये, हमने कभी यह उम्मीद नहीं की थी कि न्यायपालिका इस तरह का व्यवहार करेगी।’
गहलोत ने बातचीत के दौरान चुनाव आयोग के झारखंड में विधानसभा चुनाव 5 चरणों में कराने को लेकर भी सवाल उठाया। मुख्यमंत्री ने कहा कि झारखंड जैसे छोटे राज्य में 5 चरणों में चुनाव कराने की क्या ज़रूरत है और यहाँ हरियाणा और महाराष्ट्र के साथ चुनाव क्यों नहीं कराये गये। 

गहलोत ने कहा, ‘चुनाव आयोग बिना किसी योजना के काम कर रहा है और उससे सवाल करने वाला कोई नहीं है। सभी संस्थानों को बर्बाद किया जा रहा है, आप योजना आयोग को ही देख लीजिये।’ मोदी सरकार ने योजना आयोग का नाम बदलकर नीति आयोग रख दिया था। 

आर्थिक हालात पर जताई चिंता 

गहलोत ने देश की ख़राब आर्थिक स्थिति पर भी चिंता ज़ाहिर की। उन्होंने कहा कि आज हर आदमी परेशान है, व्यवसाय और उद्योग ख़राब हालत में हैं, ऑटोमोबाइल सेक्टर से लेकर रियल एस्टेट और छोटे व्यापार में लोगों की नौकरियां जा रही हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि लोगों में बहुत ज़्यादा ग़ुस्सा है और डर का भी माहौल है, जो लोकतंत्र में नहीं होना चाहिए। गहलोत ने मीडिया पर भी बात की और कहा कि यह बहुत दबाव में है और इस पर भी एजेंसियों की छापेमारी का डर है। 

‘पूरी ताक़त के साथ नहीं लड़े चुनाव’

गहलोत ने बातचीत के दौरान स्वीकार किया कि कांग्रेस के नेताओं ने हरियाणा और महाराष्ट्र में उस तरह प्रचार नहीं किया, जिस तरह उन्हें करना चाहिए था। उनके मुताबिक़, अगर पार्टी के नेताओं ने प्रचार किया होता तो चुनाव नतीजे दूसरे होते। गहलोत ने कहा, ‘स्थानीय कांग्रेस नेताओं को हिम्मत दिखाते हुए आगे आना चाहिए और कहना चाहिए कि वे चुनाव में पूरी जिम्मेदारी के साथ काम करेंगे। हमारे पास मुख्यमंत्री हैं, मंत्री हैं और हमें पूरी ताक़त के साथ लड़ना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ।’ 

गहलोत ने कहा कि ऐसे माहौल में केंद्रीय नेतृत्व के लिये भी चुनाव प्रचार में जाना मुश्किल हो जाता है। उन्होंने कहा, ‘यह ऐसा माहौल होता है कि जब आप यह मान चुके होते हैं कि हम हार ही जायेंगे और जब आप ऐसा सोचते हैं तो यह बहुत बड़ी ग़लती होती है।’
गहलोत ने कहा, ‘पार्टी को पूरी ताक़त के साथ चुनाव के मैदान में जाना चाहिए क्योंकि आप नहीं जानते कि जनता का मूड कब बदल जाये। जैसे जनता का मूड इंदिरा गाँधी के लिये बदल सकता है, उसी तरह यह नरेंद्र मोदी के लिये भी बदल सकता है। हर कांग्रेसी कार्यकर्ता को हिम्मत दिखानी चाहिए, जीत और हार तो लोकतंत्र के हिस्से हैं।’ 
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आरएसएस पर उठाये सवाल 

गहलोत ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर आरोप लगाया कि ऐसा लगता है कि वह इस तरह काम कर रहा है कि उसे ज़्यादा संवैधानिक अधिकार मिले हुए हैं। गहलोत ने कहा, ‘इमरजेंसी के दौरान यह कहा जाता था कि संजय गाँधी को ज़्यादा संवैधानिक अधिकार मिले हुए हैं, लेकिन अब आरएसएस क्या कर रहा है। क्या मीडिया इस बारे में लिख रहा है?’ 

 

गहलोत ने कहा कि मुख्यमंत्री या मंत्री चुनने से पहले आएसएस से पूछा जाता है, हर मंत्री के साथ ओएसडी के रूप में काम करने वाला एक व्यक्ति संघ का कार्यकर्ता है, लेकिन मीडिया इस बारे में नहीं लिखता।
गहलोत ने इस ओर साफ़ इशारा किया है कि कांग्रेस नेताओं को हार मानकर नहीं बैठ जाना चाहिए बल्कि पूरी ताक़त के साथ चुनाव लड़ना चाहिए। उन्होंने बातचीत में साफ़ कहा कि अगर पार्टी ने हरियाणा और महाराष्ट्र में बेहतर ढंग से चुनाव लड़ा होता तो स्थिति दूसरी होती। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व को इन दो राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद आगे जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, वहाँ ग़लतियों को न दोहराते हुए जनहित के मुद्दों पर संघर्ष करना चाहिए, जिससे वह बीजेपी का विकल्प बन सके।

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