राजस्थान के शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन नतीजों का विस्तृत विश्लेषण बताता है कि यह जीत कांग्रेस पर निर्णायक बढ़त की कहानी नहीं है। करीब 10 हजार से ज्यादा वार्डों के नतीजों में बीजेपी और कांग्रेस के बीच वोट प्रतिशत का अंतर महज 0.94 प्रतिशत रहा। वहीं बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवारों की सफलता ने दोनों प्रमुख दलों के सामने स्थानीय स्तर पर असंतोष और बगावत की चुनौती को उजागर किया है।

10,235 वार्डों में BJP 4,179, कांग्रेस 3,613

राजस्थान के 309 शहरी स्थानीय निकायों के लिए 9 और 11 सितंबर को मतदान हुआ था। अब तक घोषित 10,235 वार्डों के परिणामों में बीजेपी ने 4,179 वार्ड जीते, जबकि कांग्रेस के खाते में 3,613 वार्ड आए। निर्दलीय उम्मीदवारों ने 2,273 वार्डों में जीत हासिल की। नौ वार्डों के परिणाम EVM संबंधी गड़बड़ियों के कारण रोके गए हैं।
बीजेपी की घोषित वार्डों में हिस्सेदारी करीब 40.8 प्रतिशत रही, जबकि कांग्रेस की हिस्सेदारी 35.3 प्रतिशत रही। 2019-21 के पिछले निकाय चुनाव चक्र में बीजेपी ने 7,474 वार्डों में से 2,666 यानी करीब 35.7 प्रतिशत वार्ड जीते थे। इस लिहाज से बीजेपी की वार्ड हिस्सेदारी में लगभग पांच प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई है। इसके विपरीत कांग्रेस की हिस्सेदारी 40.7 प्रतिशत से घटकर 35.3 प्रतिशत रह गई।
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लेकिन कुल पड़े वोटों के लिहाज से दोनों पार्टियों के बीच अंतर बहुत कम रहा। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक बीजेपी को 35.19 प्रतिशत और कांग्रेस को 34.25 प्रतिशत वोट मिले। निर्दलीयों का वोट प्रतिशत 27.38 प्रतिशत रहा। यानी वार्ड जीतने में बीजेपी की बढ़त काफी बड़ी रही, लेकिन कुल वोटों में दोनों प्रमुख दलों के बीच अंतर एक प्रतिशत से भी कम था।

10 नगर निगमों में बीजेपी सिर्फ चार में बहुमत तक पहुंची

नतीजों का एक महत्वपूर्ण पहलू नगर निगमों का प्रदर्शन है। राजस्थान के 10 नगर निगमों में बीजेपी सिर्फ चार में बहुमत हासिल कर सकी, जबकि कांग्रेस एक नगर निगम में बहुमत तक पहुंची। बाकी निगमों में बोर्ड बनाने के लिए निर्दलीयों या छोटे दलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई।
  • 47 नगर परिषदों में बीजेपी ने 12 में स्पष्ट बहुमत हासिल किया, जबकि कांग्रेस छह में बहुमत तक पहुंची और आम आदमी पार्टी ने एक नगर परिषद में बहुमत हासिल किया।
  • 252 नगरपालिकाओं में बीजेपी ने 70 पर कब्जा किया, जबकि कांग्रेस 39 नगरपालिकाओं में सबसे आगे रही। बाकी जगहों पर बोर्ड गठन के लिए निर्दलीय और छोटे दल निर्णायक हो सकते हैं।
  • बीजेपी ने जयपुर, कोटा, उदयपुर और भीलवाड़ा जैसे शहरी निकायों में स्पष्ट बहुमत हासिल किया। लेकिन राज्य के कई राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण शहरों में तस्वीर अलग रही।

भरतपुर में मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र में निर्दलीयों का दबदबा

सबसे ज्यादा चर्चा भरतपुर के नतीजों की है। यह मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का गृह क्षेत्र है। 65 सदस्यीय नगर निगम में निर्दलीयों ने 36 वार्ड जीते। बीजेपी को 20 और कांग्रेस को सिर्फ सात वार्ड मिले। इस तरह निर्दलीयों ने अकेले बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया। भरतपुर में निर्दलीयों का मजबूत प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां स्थानीय राजनीति में उम्मीदवारों का पार्टी चिन्ह के बजाय व्यक्तिगत प्रभाव महत्वपूर्ण रहा है। इंडिया टुडे से बातचीत में राजस्थान ब्यूरो से जुड़े शरत कुमार ने भी कहा कि भरतपुर को केवल बीजेपी बनाम कांग्रेस के चश्मे से देखना उचित नहीं होगा।
हालांकि, दोनों प्रमुख दलों में टिकट वितरण को लेकर असंतोष और टिकट से वंचित नेताओं के निर्दलीय चुनाव लड़ने की खबरें चुनाव से पहले सामने आई थीं। इसका असर कई निकायों के नतीजों में दिखाई दिया।

BJP प्रदेश अध्यक्ष के गढ़ पाली में कांग्रेस आगे

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ से जुड़े राजनीतिक क्षेत्र पाली में भी पार्टी को झटका लगा। 65 वार्डों में कांग्रेस ने 29, बीजेपी ने 21 और निर्दलीयों ने 15 वार्ड जीते।
  • इसी तरह पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रभाव वाले झालावाड़ में कांग्रेस ने 45 में से 29 वार्ड जीते, जबकि बीजेपी सिर्फ 13 वार्डों तक सीमित रही। हालांकि बीजेपी ने अलग से झालरापाटन नगरपालिका में जीत हासिल की।
  • इन नतीजों को स्थानीय नेतृत्व, टिकट वितरण और उम्मीदवारों के चयन से जुड़े समीकरणों के संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि उपलब्ध नतीजे अपने आप में यह साबित नहीं करते कि किसी एक जाति या पारंपरिक बीजेपी समर्थक समूह ने राज्यव्यापी रूप से पार्टी से दूरी बना ली है। इंडिया टुडे ने भी इस बात पर जोर दिया है कि 2026 के लिए कोई जातिवार पोस्ट-पोल सर्वे उपलब्ध नहीं है।

अजमेर, जोधपुर और अलवर में भी बीजेपी को बहुमत नहीं

अजमेर में कांग्रेस 80 में से 37 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। बीजेपी को 32 और निर्दलीयों को 11 वार्ड मिले। अजमेर को लंबे समय से बीजेपी और RSS के मजबूत प्रभाव वाले क्षेत्रों में गिना जाता रहा है।
  • जोधपुर में बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने 44-44 वार्ड जीते। ऐसे में बोर्ड गठन के लिए निर्दलीय निर्णायक हो गए हैं।
  • अलवर में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी रही, लेकिन बहुमत हासिल नहीं कर सकी। इन दोनों शहरों का राजनीतिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि वे केंद्रीय मंत्रियों गजेंद्र सिंह शेखावत और भूपेंद्र यादव से जुड़े लोकसभा क्षेत्रों में आते हैं।

बीकानेर में कांग्रेस की जीत और करणी सेना की भूमिका

बीकानेर में कांग्रेस ने 80 में से 42 वार्ड जीतकर बहुमत हासिल किया। बीजेपी काफी पीछे रही। बीकानेर केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के राजनीतिक क्षेत्र से जुड़ा है और यहां पहले बीजेपी का प्रभाव रहा है।
चुनाव से पहले श्री राजपूत करणी सेना ने UGC के 2026 के जातीय-समानता संबंधी नियमों के विरोध में अभियान चलाया था। संगठन ने बीजेपी के खिलाफ मतदान की अपील भी की थी। चुनाव के बाद करणी सेना के नेता महिपाल सिंह मकराना ने दावा किया कि उसके स्वर्ण न्याय मंच ने 1,500 से अधिक निर्दलीय उम्मीदवारों को समर्थन दिया और इससे बीकानेर में बीजेपी को नुकसान हुआ।
हालांकि बीजेपी ने इस दावे की व्याख्या को खारिज किया और कहा कि राजस्थान के स्थानीय चुनावों में निर्दलीयों का मजबूत प्रदर्शन पहले से होता रहा है। इसलिए केवल करणी सेना के अभियान को नतीजे का कारण मानना उचित नहीं होगा।

सड़क, नालियां, जलभराव और कूड़ा भी बने चुनावी मुद्दे: शहरी निकाय चुनावों में स्थानीय नागरिक समस्याओं का भी असर दिखाई दिया। टूटी सड़कें, जलभराव, नालियों का ओवरफ्लो होना, कचरा और नगर सेवाओं की शिकायतें चुनाव के दौरान महत्वपूर्ण मुद्दे बने। चुनाव मानसून के दौरान हुए। ऐसे में सड़क और ड्रेनेज से जुड़ी समस्याएं ज्यादा प्रत्यक्ष रूप से सामने आईं। विधानसभा या लोकसभा चुनावों के मुकाबले स्थानीय निकाय चुनावों में मतदाता अपने वार्ड, सड़क, नाली और स्थानीय पार्षद के कामकाज को सीधे आधार बना सकता है।

इंडियन एक्सप्रेस ने भी इसे भजनलाल शर्मा सरकार के खिलाफ संभावित स्थानीय असंतोष के संकेतों के संदर्भ में देखा है। उसके विश्लेषण के मुताबिक सरकार पर कई मामलों में फैसले लेने में देरी और बाद में प्रतिक्रिया देने का आरोप लगा है। हालांकि ये राजनीतिक विश्लेषण हैं, न कि चुनाव आयोग द्वारा प्रमाणित चुनावी कारण।

CJP और शिक्षा के मुद्दे की भी चर्चा

राजस्थान में Cockroach Janta Party (CJP) ने सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर "School Theek Karo" अभियान चलाया था। अभियान में स्कूलों की खराब आधारभूत सुविधाओं और शिक्षा से जुड़े सवाल उठाए गए। जयपुर के बगरू में CJP के प्रतिनिधिमंडल पर हमले की घटना के बाद सरकार की ओर से स्कूलों के लिए आधारभूत सुविधाओं से जुड़े कदमों की जानकारी दी गई और मुख्यमंत्री कार्यालय ने संबंधित स्कूल के लिए 18 लाख रुपये की घोषणा की। इन घटनाओं को भी चुनावी माहौल में शिक्षा और स्थानीय प्रशासन के मुद्दों के संदर्भ में देखा गया।

OBC प्रतिनिधित्व और जातीय समीकरण

इंडिया टुडे के विश्लेषण में OBC समुदायों के भीतर राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर असंतोष की भी चर्चा की गई है। खास तौर पर कुमावत-कुम्हार-प्रजापत समूहों से जुड़े कुछ उम्मीदवारों के निर्दलीय चुनाव लड़ने और जीतने का उल्लेख किया गया है। राजस्थान OBC आयोग के सर्वे को लेकर भी चुनाव से पहले जाट और गुर्जर संगठनों ने आपत्ति जताई थी। इन संगठनों ने आरोप लगाया था कि सरकार ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व से संबंधित पूरा डेटा सार्वजनिक नहीं किया। सरकार और विभिन्न संगठनों के दावों के बीच यह मुद्दा राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा।

कांग्रेस को फायदा क्यों नहीं मिला?

इन चुनावों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जहां बीजेपी के कई गढ़ों में असंतोष दिखाई दिया, वहां उसका सीधा फायदा कांग्रेस को नहीं मिला। 
  • आम आदमी पार्टी ने 42 वार्ड जीते। इनमें बारां नगरपालिका परिषद के 60 में से 31 वार्ड शामिल हैं। इसके साथ ही कांग्रेस का करीब 15 साल पुराना नियंत्रण वहां समाप्त हुआ।
  • CPI(M) ने नोखा के 45 में से 29 वार्ड जीत लिए।
  • वहीं नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) ने 2019-21 के 14 वार्डों की तुलना में इस बार 63 वार्ड जीते। पार्टी का प्रदर्शन खास तौर पर मध्य-पश्चिमी राजस्थान में रहा, जहां जाट राजनीति में बेनीवाल का प्रभाव है।
  • इस तरह बीजेपी से असंतोष का एक हिस्सा कांग्रेस के बजाय निर्दलीयों और छोटे दलों की ओर गया।

कांग्रेस ने बीजेपी के खिलाफ लगाए परिसीमन के आरोप

कांग्रेस ने चुनाव में वार्ड परिसीमन को लेकर भी सवाल उठाए। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने आरोप लगाया कि वार्डों का पुनर्गठन बीजेपी के पक्ष में किया गया। उनका दावा था कि यदि यह कथित "एकतरफा" परिसीमन नहीं हुआ होता तो कांग्रेस बीजेपी से 1,500 अधिक वार्ड जीत सकती थी।

SC-ST आरक्षित सीटों में कांग्रेस का प्रदर्शन

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक कांग्रेस ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में बीजेपी से अधिक सीटें जीतीं। अखबार ने इसे कांग्रेस द्वारा बीजेपी पर लगाए जा रहे दलित-विरोधी राजनीतिक नैरेटिव और हाल की कुछ घटनाओं के संदर्भ में रखा है। हालांकि इसे पूरे राजस्थान के दलित मतदाताओं के राज्यव्यापी रुख का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता, क्योंकि स्थानीय निकाय चुनावों में उम्मीदवार, वार्ड परिसीमन और स्थानीय समीकरणों का प्रभाव काफी बड़ा होता है।

क्या ये बीजेपी के लिए बड़ा राजनीतिक संकेत है?

इन चुनावों से फिलहाल तीन बातें स्पष्ट होती हैं।
  • पहली, बीजेपी राजस्थान के शहरी निकायों में सबसे बड़ी पार्टी बनी हुई है और कांग्रेस से वार्डों की संख्या में काफी आगे है। दूसरी, बीजेपी और कांग्रेस के कुल वोट प्रतिशत में अंतर बहुत कम है, जबकि निर्दलीयों ने करीब 27 प्रतिशत वोट हासिल किए। तीसरी, बीजेपी के कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक गढ़ों में पार्टी को बहुमत नहीं मिला और कई जगह निर्दलीय या छोटे दल निर्णायक बन गए।
  • इंडियन एक्सप्रेस ने इन नतीजों को भजनलाल शर्मा सरकार के कार्यकाल के बीच उभरती संभावित एंटी-इनकंबेंसी के संकेतों के रूप में देखा है। वहीं इंडिया टुडे का विश्लेषण इसे बीजेपी के पारंपरिक शहरी समर्थन आधार में स्थानीय स्तर पर आई दरारों से जोड़ता है। दोनों ही विश्लेषण यह भी रेखांकित करते हैं कि इन चुनावों से अभी राज्य में मतदाताओं के स्थायी राजनीतिक पुनर्संरेखन का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा।
  • राजस्थान की राजनीति में अगले चरण में पंचायती राज चुनाव महत्वपूर्ण होंगे। शहरी निकाय चुनावों के मुकाबले वहां ग्रामीण मतदाताओं, जातीय समीकरणों और स्थानीय नेतृत्व की भूमिका अलग होगी। इसलिए इन नतीजों से बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए अगले चुनावी चरण की रणनीति के बारे में संकेत जरूर मिलते हैं, लेकिन इन्हें पूरे राज्य के राजनीतिक रुझान का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।
  • राजस्थान की राजनीति में अगले चरण में पंचायती राज चुनाव महत्वपूर्ण होंगे। शहरी निकाय चुनावों के मुकाबले वहां ग्रामीण मतदाताओं, जातीय समीकरणों और स्थानीय नेतृत्व की भूमिका अलग होगी। इसलिए इन नतीजों से बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए अगले चुनावी चरण की रणनीति के बारे में संकेत जरूर मिलते हैं, लेकिन इन्हें पूरे राज्य के राजनीतिक रुझान का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।