बड़ी तमन्ना थी हमारी कि एक बार जागे हुए हिंदू के दर्शन हो जाएँ।
सालों से सुनते आ रहे थे—जागो हिंदू जागो। इतना सुना कि मुझे लगने लगा था कि हिंदू शायद कोई आदमी नहीं, रेलवे स्टेशन का वेटिंग रूम है, जहाँ उद्घोषक जागने की घोषणा करते रहते हैं और यात्री उठने का नाम नहीं लेता।
कभी-कभी तो संदेह होता था कि कहीं हिंदू पुरातत्व विभाग की परियोजना तो नहीं है, जिसकी खुदाई पिछले सैकड़ों साल से चल रही हो।
अक्सर शिकायत सुनाई देती थी कि हिंदू सो रहा है। कभी-कभी ये शिकायत क्रोध का रूप भी ले लेती थी। कुछ अति आशावादी लोग भी थे जो धमकाते थे—"एक बार हिंदू जाग गया न, फिर देखना!"
मैं डर भी जाता था और उत्सुक भी हो जाता था। आखिर यह कौन सा प्राणी है जो डेढ़ सौ साल से सो रहा है और फिर भी जीवित है? मैंने तो अपने आसपास के हिंदुओं को रोज़ सुबह उठकर नौकरी जाते, दुकान खोलते, बच्चों को स्कूल छोड़ते और शाम को टीवी देखते ही पाया।
बहुत सारे हिंदू तो ब्रह्म मुहूर्त में ही जाग जाते थे। कोई भी मुझे ऐसा कुंभकर्ण का वंशज नहीं मिला जो एक बार सोया तो फिर जागने का नाम न ले। और अगर कोई डेढ़ सौ साल तक सोया रहे तो उसे जगाने के लिए संगठन नहीं, डॉक्टर बुलाए जाने चाहिए।
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लेकिन हिंदू को जगाने वाले लोग हार मानने को तैयार नहीं थे। दिन-रात उसके कानों में ढोल-नगाड़े बजाए गए। सैकड़ों संगठन खड़े किए गए। यात्राएँ निकाली गईं। प्रभात फेरियाँ हुईं। चंदे जुटाए गए।
सोचिए, हिंदुओं के बारे में कैसी धारणा बनाकर रखी गई थी। उन्हें आलसी, सुलक्कड़ और निकम्मा साबित करने का काम उन्हीं लोगों ने किया जो स्वयं को उनका सबसे बड़ा शुभचिंतक बताते हैं।
दुनिया में सबसे ज़्यादा अपमान अक्सर शुभचिंतक ही करते हैं। दुश्मन तो केवल गाली देता है, शुभचिंतक आपको निकम्मा और नालायक सिद्ध कर देता है।
मेरी नज़र में अगर ऐसा कोई हिंदू था तो वह सोया हुआ नहीं हो सकता था। वह या तो कोमा में चला गया होगा या फिर दीन-दुनिया को टाटा-बाय-बाय कह चुका होगा।
किसी ने कहा है कि सोए हुए को तो जगाया जा सकता है, मगर जो जागा होकर भी न जागा हो, उसे कैसे जगाया जाएगा। यह गुत्थी मेरे जैसे अनपढ़ के लिए थोड़ी पेचीदा थी। मैंने इसका अर्थ यह लगाया कि जैसे नींद में चलने की बीमारी होती है, वैसे ही जागते हुए सोने की भी कोई बीमारी होती होगी।

हालाँकि बीच-बीच में जब कभी दंगे होते थे तो सुनाई पड़ता था कि हिंदू जाग गया है। मैं राहत की साँस लेता था। लगता था कि चलो, इतने वर्षों की मेहनत सफल हुई। भाई लोग जिस परियोजना पर काम कर रहे थे, वह पूरी हुई। हिंदू जाग गया।...मगर कुछ ही दिनों बाद वे फिर कहने लगते कि हिंदू को जगाना होगा।

मैं हैरान रह जाता था। यह कैसा हिंदू है जो बार-बार सो जाता है और जिसे जगाने के लिए दंगे-फसाद करवाने पड़ते हैं? उसके बिना वह जागने के लिए तैयार ही नहीं होता।
तभी मैंने पहली बार समझा कि कुछ लोगों की राजनीति मच्छर मारने की दवा बेचने वालों जैसी होती है। वे पहले गंदगी फैलाकर मच्छर पैदा करते हैं, फिर मच्छरों को मारने की दवा बेचते हैं। बाद में मच्छरों को राष्ट्र का सबसे बड़ा संकट घोषित कर देते हैं।
फिर एक समय आया जब हिंदू को जगाने में जुटे लोग आश्वस्त होने लगे। उन्हें लगा कि अब हिंदू स्थायी रूप से जाग गया है और उसे नींद नहीं आएगी।
इसके लिए नए-नए अलार्म बजाए गए। मंदिर निर्माण, मस्जिद गिराना, ऐतिहासिक बदला, धार्मिक गौरव—इतने अलार्म एक साथ बजाए गए कि हिंदू की नींद ही उड़ गई। वह राष्ट्रीय अनिद्रा का रोगी हो गया। दिन-रात, बारहों महीने जागने लगा।

हिंदुओं को जगाने का नया मंत्र यह था कि उन्हें छोटे-बड़े दंगे-फसाद जैसे रचनात्मक कार्यों में इतना उलझाए रखो कि उन्हें नींद ही न आए। यह मंत्र काम कर गया।

जागा हुआ हिंदू अब बड़े काम की चीज़ साबित होने लगा। उससे जो चाहो करवाया जा सकता था। बस यह देखना होता था कि रचनात्मक कार्यक्रम चलते रहें।
और यह उनके लिए कोई कठिन काम नहीं था। वे इसका अभ्यास सदियों से करते आए थे। पहले निचली जातियों को सुधारने के लिए, फिर विधर्मियों को सुधारने के लिए। इसके लिए उन्होंने ऐसे अनेक संगठन बना रखे थे जो निरंतर रचनात्मक कार्यक्रम चलाते रहते थे ताकि हिंदू जागता रहे।
हमारे यहाँ रचनात्मकता का अर्थ हमेशा कुछ बनाना नहीं रहा है। कई लोग सदियों से सिर्फ़ रिश्ते बिगाड़कर, समाज बाँटकर और दिमाग़ों में ज़हर भरकर भी रचनात्मक कहलाते रहे हैं।
मनु महाराज से लेकर तुलसीदास तक इसकी लंबी एवं समृद्ध परंपरा इसका जीता जागता प्रमाण हैं।
तो रचनात्मक अभियान के तहत नागपुरिया लैब में तरह-तरह की जागरण-पुड़ियाँ तैयार की गईं। इनमें गौरक्षा, लव जिहाद, थूक जिहाद, झूठ जिहाद, जनसंख्या विस्फोट, ऐतिहासिक अन्याय और नफ़रत की आग जैसी सामग्रियाँ मिलाई गईं। पुड़ियों में अनेक प्रकार के विटामिन डाले गए।
उन पर निर्देश लिखा रहता था—"आवश्यकतानुसार सेवन करें। नींद आने लगे तो खुराक बढ़ा दें।"
पुड़िया बनाने वालों की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने बीमारी को ही स्वास्थ्य घोषित कर दिया।
मज़े की बात यह है कि आर्यावर्त में ही नहीं, जंबूद्वीप में ही नहीं बल्कि पूरे पृथ्वीलोक में जगाओ-जगाओ की मार मची हुई है। कहीं मुसलमानों को जगाया जा रहा है, कहीं ईसाइयों को, कहीं यहूदियों को, कहीं बौद्धों को। सबकी समस्या एक ही है—जिन्हें वे जगाना चाहते हैं, वे जाग नहीं रहे।

और इससे भी दिलचस्प बात यह थी कि सब लगभग एक ही मंत्र का उपयोग कर रहे हैं—पहले डर पैदा करो, फिर दुश्मन पैदा करो, फिर झगड़े करवा दो।

इस फार्मूले की उत्पत्ति को लेकर मतभेद हैं। कुछ लोगों का दावा है कि भारत के कुछ सयाने लोग इसे जर्मनी और इटली से स्मगल करके लाए थे। कुछ का कहना है कि नहीं ये ज्ञान भारत से ही पूरी दुनिया में फैला।
जर्मनी को यह कहाँ से मिला, यह शोध का विषय है। हमारे यहाँ कई लोग दावा करते हैं कि सारा ज्ञान भारत से गया है। वे यह भी कहते हैं कि हिटलर भी आर्य था और हम भी आर्य हैं। यानी दोनों का डीएनए एक है इसलिए इस मंत्र पर हमारा भी बराबरी का अधिकार है।
हमारे यहाँ वंशावली का बड़ा महत्व है। आदमी अपने पुरखे चुन नहीं सकता, मगर राजनीतिक ज़रूरत के अनुसार उन्हें खोज अवश्य सकता है।
लेकिन सवाल फार्मूला-चोरी का नहीं है। सभी चोरी कर रहे हैं तो उन्होंने भी कर लिया तो इसमें कौन-सा अपराध हो गया? असली सवाल यह है कि फार्मूला काम कर रहा है। और आप देख सकते हैं कि हिंदू जाग गया है।
2014 के बाद तो वह ऐसा जागा कि सोना क्या होता है, यही भूल गया। न्यूज़ चैनलों में, अख़बारों में, सोशल मीडिया में, आईटी सेल में, ट्रेनों में, सड़कों पर, विज्ञापनों में—हर जगह जागा हुआ हिंदू दिखाई देने लगा।
वह इतना जाग चुका था कि अब सोने जैसी नींद उसे नहीं आती है।
अब वह कभी किसी मुसलमान को मारता दिखाई देता है, कभी उसे जय श्रीराम बोलने के लिए मजबूर करता दिखाई देता है।
प्रेमी युगलों पर उसे विशेष क्रोध आता है। शायद उसे लगता है कि देश की सारी समस्याओं की जड़ प्रेम ही है। बेरोज़गारी, महँगाई, भ्रष्टाचार—ये सब बाद की बातें हैं। पहले पार्क में बैठे लड़का-लड़की को ठोंको।

बहरहाल, हिंदू अब इतना जाग गया है कि उसे महँगाई दिखाई नहीं देती। बेरोज़गारी दिखाई नहीं देती। शिक्षा और स्वास्थ्य की दुर्दशा दिखाई नहीं देती। उसे केवल वही दिखाई देता है जो जागरण-पुड़िया बनाने वाले दिखाना चाहते हैं।

आँखें खुली हुई हैं, इसलिए सबको लगा वह जाग रहा है। दिमाग़ बंद है, इसलिए किसी को उसके जागने पर संदेह नहीं हो रहा।
यह हिंदू जगाओ अभियान बड़ा चमत्कारी निकला। कुछ लोगों ने देश की संपत्ति पर कब्ज़ा कर लिया और जागा हुआ हिंदू ताली बजाता रहा। अस्सी करोड़ लोग मुफ़्त राशन पर आ गए और जागा हुआ हिंदू इसे विश्वगुरु बनने का प्रमाण मानता रहा।
जागे हुए हिंदू की हालत किसी सेठ की निकम्मी औलाद की बारात में लुटाए गए सिक्के बटोरने वाले भिखमंगों जैसी है, मगर वे इसी में खुश हैं। वे इतने लंबे समय से सोए हुए हैं कि उन्हें यही जागरण लग रहा है।

दलितों को बताया गया कि उनका सम्मान लौट आया है। आदिवासियों को बताया गया कि उनका गौरव लौट आया है। ग़रीबों को बताया गया कि उनका स्वर्णिम युग आ गया है। और सबने विश्वास कर लिया, क्योंकि जागे हुए आदमी को सपने अधिक स्पष्ट दिखाई देते हैं।

हिंदू को जगाने वाले अक्सर चेतावनी देते थे—"एक बार हिंदू जाग गया न, फिर देखना।"
वे ग़ज़ब के आत्मविश्वासी और दूरदर्शी लोग थे। उन्हें पता था कि हिंदू जागेगा तो क्या-क्या होगा। और आज वही हो रहा है।
मंदिर का चढ़ावा उनके घर में आने लगा।
चंदों से वे मालामाल होने लगे।
उनके आलीशान दफ़्तर-महल बनने लगे।
वे बड़ी गाड़ियों में चलने लगे।
कानून और पूरा तंत्र उनकी मुट्ठी में आ गया। वे बड़े से बड़ा अपराध डंके की चोट पर करते हैं और बच भी जाते हैं।
हिंदू जाग गया हैं और उसे जगाने वाले सफल हो गए हैं। ऐसा जान पड़ता है कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी उपलब्धि से संतुष्ट हैं।
हर युग में जनता को जगाने वाले लोग पैदा हुए हैं। मगर इतिहास गवाह है कि उन्हें जनता के जागने से नहीं, जनता के सोचना शुरू कर देने से डर लगता है। इसलिए वे हिंदू को उतना ही जगाए रख रहे हैं जितने से वह सोचने न लगे।
हालाँकि कुछ छिद्रान्वेषी कहते रहते हैं कि इस जागने से तो अच्छा था कि हिंदू सोता ही रहता।
बहरहाल, यह तो आप मान ही लीजिए कि हिंदू को जगा दिया गया है। अब बस एक छोटी-सी चिंता है।
इतने वर्षों से जो लोग उसे जगा रहे थे, वे उसे सोने नहीं देंगे या पूरी तरह से जागने भी नहीं देंगे। क्योंकि जिस दिन वह सचमुच जाग गया, उस दिन शायद सबसे पहले वह उन्हीं लोगों को पहचान लेगा जो इतने वर्षों से उसके कान में अलार्म बजा रहे थे।