ये उस रात की बात है जब वे प्रधानमंत्री बुरी तरह से डरे हुए थे, तनाव से भरे हुए थे। जंतर मंतर का आंदोलन देश भर में फैल चुका था और युवा पीढ़ी उनकी धज्जियाँ उड़ा रही थी।
प्रधानमंत्री बहुत दुखी थे। जनता भी दुखी होती है मगर शासकों का दुख अलग होता है। वे जनता के दुख से दुखी नहीं होते, जनता के विचारों से दुखी होते हैं।
दरअसल, उस रात प्रधानमंत्री को पहली बार संदेह हुआ था कि देश का नौजवान वर्ग उनसे प्रेम नहीं करता। यह संदेह किसी भी लोकतांत्रिक शासक के लिए सामान्य बात है, लेकिन अवतारों के लिए बहुत बड़ा संकट होता है।
संकट बहुत बड़ा था और बड़े संकट के समय प्रधानमंत्री को पहला खयाल आता है मीडिया का। वे मीडिया मैनेजमेंट को वर्तमान राजनीति का राम बाण मानते हैं। लिहाज़ा आधी रात को उन्होंने मीडिया मैनेजमेंट सेल के एक अफ़सर को बुलाकर कहा- इंस्ट्राग्राम के लिए वीडियो बनाना है।
अफ़सर थोड़ा चौंका, थोड़ा परेशान हुआ। इंस्ट्राग्राम 20-30 साल के लड़के-लड़कियों का माध्यम है। वहाँ 75 साल के बुजुर्ग का क्या काम। उसने ये सोचा कि जिस आदमी को अपने भाषण के लिए दस-दस कैमरे, बीस-बीस एंगल और पचास-पचास संपादक चाहिए हों, वह इंस्टाग्राम पर क्या करेगा?
मगर सरकारी अधिकारी का धर्म प्रश्न पूछना नहीं, आदेश को दूरदर्शी निर्णय बताना होता है। उसने झुककर कहा— "बहुत अच्छा विचार है सर।"
अफसर को ये भी पता नहीं था कि वीडियो बनाना कैसे है। उसने तुरंत किसी को फोन किया और वीडियो बनवाने में जुट गया। प्रधानमंत्री सज-धजकर आए और थोड़ी ही देर में वीडियो बनकर अपलोड हो गया।
इंस्ट्राग्राम पर पहला वीडियो पोस्ट करने के बाद प्रधानमंत्री बेहद खुश और उत्साह से भरे हुए थे। उनकी खुशी तब और भी बढ़ गई जब अफसर बार-बार आकर बताने लगे कि इतने व्यूज़ हो गए, उतने व्यूज़ हो गए।

लोकतंत्र में जनता का समर्थन जितना सुख नहीं देता, आँकड़ों का समर्थन उससे ज़्यादा सुख देता है। आँकड़े आदमी को वह भ्रम दे देते हैं जो वास्तविकता कभी नहीं देती।

प्रधानमंत्री को अपनी लोकप्रियता पर एक बार फिर से नाज़ होने लगा। उन्होंने आदमकद शीशे के सामने खड़े होकर नई दृष्टि से ख़ुद को निहारा और सोचा कि नई पीढ़ी भी मुझे जवान मानती है। ऐसा सोचते वक़्त उन्हें मेलोडी चॉकलेट की याद आई और उनका मुँह मिठास से भर गया। वे हल्के से मुस्करा दिए।
कुछ समय बाद उन्हें लगा कि पल-पल की रिपोर्ट देने वाले काफी देर से आए नहीं हैं। पहले उन्होंने सोचा कि हो सकता है कि व्यूज़ और सब्स्क्राइबर इतनी तेज़ी से बढ़ रहे होंगे कि उन्होंने तुरंत बताना ज़रूरी न समझा हो। लेकिन मन में जब उत्कंठा बढ़ने लगी तो उन्होंने ख़ुद ही फोन निकाला और देखने लगे।
व्यूज़ मिलियनंस में पहुँच गए थे और सब्स्क्राइबर भी उसी तेज़ी से कई गुना बढ़ चुके थे। उनकी छाती फूलकर 66 इंच की हो गई। फिर उन्होंने स्क्रोल करके कमेंट पढ़ने शुरू कर दिए और यहीं वह दुर्घटना घटी जिससे प्रधानमंत्री का दुख बढ़ता चला गया।
पहली टिप्पणी पढ़ी चेहरा थोड़ा उतरा। दूसरी पढ़ी माथे पर बल आ गए। तीसरी पढ़ी रक्तचाप बढ़ने लगा। चौथी पढ़ी चेहरा लाल हो गया। कोई उन्हें "अंकल" कह रहा था। कोई "फ्रेंड्स" का मज़ाक उड़ा रहा था। कोई मीम बना रहा था। कोई वीडियो की नकल कर रहा था। और कुछ ऐसे शब्द लिख रहे थे जिनके बारे में प्रधानमंत्री को विश्वास था कि वे उनके लिए नहीं बने हैं।
प्रधानमंत्री चिढ़ गए। उन्हें ये बर्दाश्त नहीं होता कि कोई उन्हें आईना दिखाए। वे वही आईना देखना पसंद करते हैं जिसमें उनकी पसंद की तस्वीर नज़र आती हो। इसीलिए वे दूसरी छवि दिखाने वाले आईनों को तुड़वाने में निरंतर लगे रहते हैं।
कुछ और वीडियो देखने के बाद गुस्से से उनके चेहरे का रंग लाल हो गया। उन्हें समझ नहीं आया कि यह वही देश है या कोई दूसरा देश। बारह वर्षों से मीडिया उनकी प्रशंसा कर रहा था। हर दूसरे दिन कोई संत उन्हें अवतार बता रहा था। कोई नेता उन्हें विश्वगुरु बना रहा था। कोई भक्त उन्हें युगपुरुष घोषित कर रहा था। फिर ये अनजान, अबोध बच्चे कौन हैं?
सत्ता का सबसे बड़ा संकट यही होता है। वह जनता को तभी तक जनता मानती है जब तक वह जयकार कर रही हो। सवाल पूछते ही वह षड्यंत्रकारी हो जाती है। प्रधानमंत्री को लगा कि इसके पीछे कोई बड़ी साज़िश है।
उलटबांसी से कोट
मुकेश कुमार का व्यंग्य
साज़िश सत्ता का प्रिय खिलौना होती है। जिस बात का उत्तर न मिले, उसे साज़िश घोषित कर दो। ऐसे मौक़ों पर उनकी छठी इंद्रिय साज़िश की ओर इशारा करने लगती है। उनका एंटीना साज़िश के सिग्नल को सबसे पहले पकड़ता है। ये प्रधानमंत्री के स्वभाव का भी हिस्सा है। उनको बचपन से कांसपिरसी थ्योरी के कैप्सूल खिलाए गए थे।
उन्हें सबसे पहले सोरोस याद आया। फिर पाकिस्तान। फिर चीन। फिर अमेरिका। फिर विपक्ष। कुछ देर बाद तो उन्हें यह भी लगा कि शायद मंगल ग्रह से कोई डिजिटल हमला चल रहा हो।
लेकिन अचानक उनके मन में सवाल उठा कि अगर ये कोई साज़िश न हुई तो....अगर सचमुच में युवा पीढ़ी उनको लेकर यही सब सोचती हो तो...अगर सचमुच में उसके मन में उनके प्रति ऐसी ही घृणा और ऐसी ही हिंसा छिपी हुई हो तो.....
उनकी राजनीतिक बुद्धि ने इस संभावना को खारिज़ नहीं किया, लेकिन उनका संस्कारी मन अब दूसरे निष्कर्ष निकालने लगा। मन ही मन वह रणनीति बनाने में भी जुट गया।
उनके संस्कारी मन ने कहा कि ये पूरी जेनरेशन भ्रष्ट हो चुकी है। इनके माता-पिता भी कुसंस्कारी रहे होंगे, जिसकी वज़ह से वे अपने बच्चों को संस्कारित नहीं कर सके। उन्हें आरएसएस की लापरवाही और सुस्ती पर कोफ्त आई। सरसंघचालक दिन रात बयानबाज़ी करते रहते हैं और यहाँ नई पीढ़ी का चरित्र निर्माण का काम ठप पड़ा हुआ है।
सवाल उठा कि फिर किया क्या जाए। रणनीति पर विचार करना शुरू किया। रणनीति बन जाने के बाद प्रधानमंत्री का चेहरा कुछ शांत हुआ।
राजनीति में रणनीति का वही महत्व है जो साधु के लिए माला का। माला फेरने से मोक्ष मिले न मिले, मन को तसल्ली मिल जाती है। रणनीति बनाने से समस्या हल हो न हो, शासक को यह भरोसा हो जाता है कि उसने इतिहास को फिर से अपनी मुट्ठी में कैद कर लिया है।
प्रधानमंत्री अब पूरी रफ़्तार में थे। उन्हें लगा कि समस्या का मूल कारण यह नहीं है कि नौजवान उन्हें पसंद नहीं करते। समस्या यह है कि नौजवानों को पर्याप्त मात्रा में उनकी महानता दिखाई नहीं गई है।
यह वही तर्क है जिससे हर तानाशाह प्रेम करता है। अगर जनता खुश नहीं है तो प्रचार कम हुआ है। अगर जनता सवाल पूछ रही है तो प्रचार और बढ़ाया जाए। अगर जनता हँस रही है तो प्रचार दोगुना कर दिया जाए।

सच्चाई बदलने की अपेक्षा उसके बारे में विज्ञापन बनाना हमेशा आसान होता है।

फिर उन्होंने दूसरा आदेश दिया, "इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब...सबको समझाओ।"
"क्या समझाएँ, सर?"
"यही कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन मेरी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सबसे सर्वोपरि है।"
अधिकारी ने सिर झुका लिया। उसे समझ में नहीं आया कि यह लोकतंत्र का सिद्धांत है या राज-दरबार का। लेकिन उसने फिर "जी" कह दिया। सरकारी तंत्र में "जी" सबसे शक्तिशाली शब्द है। यह संविधान से भी पुराना और कई बार संविधान से भी ज़्यादा प्रभावी सिद्ध होता है।
अब तीसरे मोर्चे की बारी थी। प्रधानमंत्री का चेहरा अचानक कठोर हो गया। उन्होंने पूछा—"जिन लोगों ने ये सब लिखा है, उनकी सूची बन सकती है?"
अधिकारी मुस्कुराया। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन सूची बनाने वाले अधिकारी अमर होते हैं।
उसने कहा—"बन सकती है, सर।"
प्रधानमंत्री संतुष्ट हुए। "फिर बनाओ।"
लोकतंत्र में नागरिक की सबसे बड़ी सुरक्षा ऐसी सूची में न होना है। जिस दिन उसका नाम सूची में आ गया, उसके अधिकारों का भविष्य ईश्वर के भरोसे हो जाता है।
प्रधानमंत्री ने निर्देश दिए कि जिन लड़के-लड़कियों ने मीम बनाए हैं, उन्हें बुलाकर समझाया जाए। यदि समझ जाएँ तो संस्कार। न समझें तो कानून।
कानून आधुनिक राज्य का वह डंडा है जिसे न्याय के लिए कम और अनुशासन के लिए ज़्यादा इस्तेमाल किया जाता है।
उन्होंने क्षमादान देने का फ़ैसला किया। उन्होंने तय किया कि वे एक और वीडियो बनाकर अपनी माँ की दुहाई देते हुए शैतान बच्चों को क्षमा करेंगे।
राजनीति में क्षमादान भी एक शस्त्र होता है, जो ख़ुद को संवेदनहीन और विराट ह्रदय वाला दिखाने के लिए चला जाता है।
कुछ देर बाद अधिकारी चला गया। कमरे में फिर सन्नाटा था। प्रधानमंत्री कुर्सी पर बैठे सोचने लगे। तात्कालिक उपाय तो हो चुके थे। अब दीर्घकालिक उपायों की बारी थी।

यहीं राजनीति और धर्म का विवाह होता है। राजनीति वर्तमान को संभालती है और विचारधारा भविष्य की खेती करती है।

उन्होंने अपने मातृ संगठन के बारे में सोचा। उनके मन में हल्की नाराज़गी भी थी। इतने वर्षों से शाखाएँ लग रही हैं। इतने वर्षों से चरित्र निर्माण चल रहा है। इतने वर्षों से इतिहास सुधारा जा रहा है। फिर भी नई पीढ़ी इंस्टाग्राम पर अपशब्दों का उपयोग कर रही है, वह भी प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़।
यह बात उन्हें व्यक्तिगत अपमान जैसी लगी। उन्होंने मन ही मन कहा— "कहीं न कहीं काम में ढिलाई हुई है।
जब कोई आंदोलन उठता है तो सत्ता कारण नहीं खोजती, दोषी खोजती है। कारण खोजने से सुधार करना पड़ता है। दोषी खोजने से केवल भाषण देना पड़ता है। उन्होंने आदेश दिया कि संगठन के लोग बैठकर नई योजना बनाएंगे और युवाओं को संस्कारित किया जाएगा, इतिहास को और सरल बनाया जाएगा।
सरल इतिहास वह होता है जिसमें सारे अच्छे लोग हमारे और सारे बुरे लोग उनके होते हैं। जटिल इतिहास लोकतंत्र के लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन राजनीति के लिए नहीं।
फिर उन्हें लगा कि नैरेटिव बदलना होगा। नैरेटिव राजनीति का वह जादुई शब्द है जिसके भीतर वास्तविकता को गायब करने की शक्ति होती है। बेरोज़गारी की चर्चा हो रही हो तो धर्म की बात शुरू कर दो। शिक्षा की चर्चा हो रही हो तो इतिहास की लड़ाई छेड़ दो। युवा भविष्य पूछ रहे हों तो उन्हें अतीत में भेज दो।
जब वर्तमान असुविधाजनक हो जाए तो अतीत सबसे सुरक्षित शरणस्थली बन जाता है।
अब प्रधानमंत्री का आत्मविश्वास लौटने लगा था। उन्हें लगा कि संकट टल गया है। सोशल मीडिया संभाल लिया जाएगा। मीडिया तो ख़ैर संभला हुआ है ही। विरोधियों को संभाल लिया जाएगा। युवाओं को संभाल लिया जाएगा। देश को संभाल लिया जाएगा। इतिहास को संभाल लिया जाएगा।
इतना करने के बाद उन्होंने राहत की साँस ली। अब वे पूरी तरह मुतमईन थे कि उन्होंने जेन ज़ी क्रांति की भ्रूण हत्या करने का पूरा इंतज़ाम कर दिया है। उन्होंने रिमोट उठाकर टीवी खोला। देखा नेता प्रतिपक्ष अंधभक्तों और इडियट के बारे में कुछ कह रहे हैं। उनका बीपी फिर बढ़ गया, मुखमुद्रा बदल गई और गुस्से से तन-बदन काँपने लगा।
उन्होंने रिमोट को हथियार की तरह पकड़ा। कुछ क्षण तक टीवी को घूरते रहे। फिर पूरी ताक़त से रिमोट स्क्रीन पर दे मारा। एक तेज़ धमाका हुआ। स्क्रीन चकनाचूर हो गई।
कमरे में सन्नाटा फैल गया। बाहर खड़े सुरक्षाकर्मी और कर्मचारी एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। वे अनुभवी लोग थे। उन्हें समझने में देर नहीं लगी। साहब ने एक और टीवी तोड़ दिया था।
लोकतंत्र बचा हुआ था।
संविधान भी अपनी जगह था।
संसद भी खड़ी थी।
केवल एक टीवी शहीद हुआ था।
लेकिन कर्मचारियों को यह भी मालूम था कि प्रधानमंत्री जब टीवी तोड़ते हैं तो उसका असली निशाना टीवी नहीं होता। वे उस दुनिया को तोड़ना चाहते हैं जो उनकी बनाई हुई दुनिया से अलग दिखाई देती है क्योंकि हर शासक अंततः दो देशों में रहता है। एक वह देश जिसमें जनता रहती है। दूसरा वह देश जिसमें उसकी छवि रहती है। संकट तब पैदा होता है जब दोनों देशों की छवियाँ मेल नहीं खातीं।
उस रात प्रधानमंत्री को पहली बार पता चला था कि इंस्टाग्राम पर रहने वाला भारत और उनके भाषणों में रहने वाला भारत एक ही देश नहीं हैं।