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क्या कोहली भारत के महानतम टेस्ट कप्तान हैं?

कोहली की टीम का जीत का जश्न ज़रूर मनायें, इस बात पर भी फख्र महसूस करें कि इससे बेहतर तेज़ गेंदबाज़ी आक्रमण भारत के इतिहास में कभी नहीं रहा है और यह टीम विदेशी ज़मीं पर एकदम से जाकर ढेर नहीं हो जाती है लेकिन महानता की असली कसौटी को न भूलें। 
विमल कुमार

इंग्लैंड के ख़िलाफ़ विराट कोहली ने टेस्ट सीरीज़ 3-1 से जीत ली और यह उम्दा उपलब्धि है क्योंकि शुरुआती टेस्ट मैच वह हार गये थे। इसके साथ ही कोहली अब तक भारत में एक भी टेस्ट सीरीज़ नहीं हारने के रिकॉर्ड को भी बरकरार रखने में कामयाब हुए हैं। इतना ही नहीं, घरेलू ज़मीन पर उनकी कप्तानी के नाम 23 टेस्ट जीत हैं जो किसी कप्तान के पास नहीं। महेंद्र सिंह धोनी के पास भी नहीं जिन्होंने 60 मैचों में कप्तानी की। अब कोहली भी इतने मैचों में भारत की कप्तानी कर चुके हैं और जब जून महीने में इंग्लैंड में वह वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के फ़ाइनल में न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ उतरेंगे तो अपने मुल्क के लिए 61 यानी कि सबसे ज़्यादा मैचों में कप्तानी का रिकॉर्ड भी बना डालेंगे। 

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सिर्फ़ आँकड़ों के बूते महानता कैसे?

लेकिन, कोहली की टेस्ट क्रिकेट में आँकड़ों के बूते महानता अब सिर्फ़ पूर्व भारतीय कप्तानों से तुलना तक सीमित नहीं रह गयी है। अहमदाबाद में जब इंग्लैंड के ख़िलाफ़ कोहली की टीम जीती तो उनके नाम टेस्ट क्रिकेट में 36वीं जीत हासिल हुई। 36 का यह आँकड़ा बेहद अहम और दिलचस्प है क्योंकि क्रिकेट इतिहास के संभवत: महानतम कप्तान क्लाइव लॉयड के नाम ही इतनी जीतें दर्ज थीं।

कोहली ने अब कप्तान के तौर पर आँकड़ों के ज़रिए ही सही उनकी बराबरी कर ली है। यह बात अलग है कि आँकड़ों के लिहाज से महानतम बनने के लिए अब भी उनको पहले रिकी पोंटिंग (48 जीत) और फिर साउथ अफ्रीका के पूर्व कप्तान ग्रेम स्मिथ (53 जीत) को पछाड़ना होगा। खैर, उसके लिए तो दिल्ली फ़िलहाल वाक़ई दूर है।

वैसे, यह बात तो माननी ही होगी कि जिस 36 जीत के लिए लॉयड को 74 मैचों में कप्तानी करनी पड़ी वहीं कोहली ने उनसे 14 मैच कम खेलकर यह मुकाम हासिल किया। लेकिन, सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि आधुनिक कप्तानों में एक साथ लगातार 7 साल कप्तानी की उतनी और किसी और ने नहीं की, न सौरव गांगुली ने और न ही धोनी ने। गांगुली ने 5 साल में 49 मैचों में कप्तानी की जो सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ के कप्तानी मैचों को जोड़ दिया जाए तो उससे सिर्फ़ 1 कम। तेंदुलकर-द्रविड़ ने 25-25 मैचों में भारत की कप्तानी की लेकिन वो दोनों दिग्गज बल्लेबाज़ भी असहनीय दबाव को मिलकर भी 5 साल तक नहीं झेल पाये। धोनी जैसे ‘कैपटन कूल’ के लिए भी आख़िरी कुछ सालों में टेस्ट कप्तानी बोझिल हो गयी थी क्योंकि वो विदेशों में जीत के लिए संघर्ष करते दिख रहे थे। इसलिए धोनी ने भी क़रीब 6 साल तक टेस्ट कप्तानी के बाद यह ज़िम्मेदारी कोहली को सौंप दी। 
virat kohli test cricket captaincy as india beats england in test series  - Satya Hindi

असली सवाल वही...

लेकिन, असली सवाल तो वहीं का वहीं बना हुआ है। क्या कोहली के दौर में टीम इंडिया विदेशी ज़मीं पर नियमित तौर पर कामयाबी हासिल करने लगी है? आँकड़े तो विदेशी ज़मीं पर धोनी के 6 जीत के मुक़ाबले कोहली के 13 जीत को महान बताने के लिए शायद काफ़ी हों लेकिन अगर हक़ीक़त में आकलन किया जाए तो दोनों के नाम South Africa, England, New Zealand और Australia यानी कि SENA में 4-4 (बिलकुल बराबर) जीत ही मिली है। ऐसे में कोहली किस लिहाज से धोनी से बेहतर हो गये? 

आख़िरकार, कोहली की विरासत तो यही होनी थी कि SENA में उनकी सेना ने क्या हासिल किया क्योंकि वेस्टइंडीज़ और श्रीलंका को सही मायनों में विदेशी जीत में गिनना शायद उचित नहीं है।

हाँ, एक कामयाबी जो कोहली को धोनी से सीधे ऊपर ले जाती है वो है 2018 में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ 2-1 से सीरीज़ में जीत। वह ऐतिहासिक कामयाबी थी जो भारतीय क्रिकेट में किसी कप्तान को नसीब नहीं हुई थी। लेकिन, उस सीरीज़ में कोहली तुलनात्मक तौर पर एक कमज़ोर ऑस्ट्रेलियाई टीम से टकराये थे जिसमें स्टीव स्मिथ और डेविड वार्नर नहीं थे।

बहरहाल, अंजिक्य रहाणे ने एक बेहद नई–नवेली और अनुभवहीन टीम के साथ इतिहास रचते हुए 2021 में एक मज़बूत ऑस्ट्रेलियाई टीम के ख़िलाफ़ उससे बेहतर जीत हासिल कर ली। वह भी तब जब पहले टेस्ट में 36 पर ऑल आउट और शर्मनाम हार मिली थी। यानी, एक तरह से कोहली की उस जीत को अहमियत के लिहाज़ से शायद थोड़ा फीका कर दिया।

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महानतम बल्लेबाज़ मुमकिन लेकिन...

निस्सन्देह, कोहली टेस्ट क्रिकेट या फिर क्रिकेट के हर फ़ॉर्मेट को देखें तो शायद महानतम बल्लेबाज़ों में से एक होंगे। लेकिन, क्या यही बात उनकी कप्तानी के बारे में उतने ही ठोस तरीक़े से कही जा सकती है। मुझे लगता है नहीं, क्योंकि सफेद गेंद की क्रिकेट में धोनी की तरह मल्टीपल ग्लोबल ट्रॉफ़ी तो छोड़ दें, एक भी ग्लोबल ट्रॉफी नहीं जीत पाये हैं। 

और इसलिए पहली बार टेस्ट क्रिकेट की ग्लोबल ट्रॉफ़ी जीतना शायद कोहली की कप्तानी की महानता को साबित करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो।

SENA में फतह बाक़ी

इसके अलावा कोहली को अब भी इंग्लैंड, साउथ अफ्रीका और न्यूज़ीलैंड में टेस्ट जीतना बाक़ी है क्योंकि इन तीनों मुल्कों में वो हार का सामना कर चुके हैं। अगर धोनी साउथ अफ्रीका में टेस्ट सीरीज़ ड्रॉ करके लौट चुके हैं तो न्यूज़ीलैंड में वह जीते भी हैं। द्रविड़ ने इंग्लैंड में जीत हासिल की थी। अगर कोहली को भारतीय क्रिकेट का महानतम टेस्ट कप्तान बनना है तो उन्हें SENA मुल्कों में से 4 में 4 अंक हासिल करने ही होंगे जो कि फ़िलहाल उनके खाते में ऑस्ट्रेलिया में जीत के चलते सिर्फ़ 1 है।

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इंतज़ार है संभावनाओं का 

इसलिए, कोहली की टीम का जीत का जश्न ज़रूर मनायें, इस बात पर भी फख्र महसूस करें कि इससे बेहतर तेज़ गेंदबाज़ी आक्रमण भारत के इतिहास में कभी नहीं रहा है और यह टीम विदेशी ज़मीं पर एकदम से जाकर ढेर नहीं हो जाती है लेकिन महानता की असली कसौटी को न भूलें। तमाम कामयाबी के बावजूद गेंद चाहे सफेद हो या लाल, कप्तानी में कोहली को अब तक वो वाहवाही नहीं मिली है जैसा उनके फैंस चाहते हैं। यह सिर्फ़ इत्तेफाक ही तो नहीं हो सकता कि सबसे ज़्यादा साल आईपीएल में कप्तानी करने के बावजूद उनकी टीम एक बार भी चैंपियन नहीं बनी है और सफेद गेंद में भी टीम इंडिया को कोई वर्ल्ड कप हासिल नहीं हुआ है।

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अंतरराष्ट्रीय मैचों में जीत का प्रतिशत कोहली को निश्चित तौर पर भारत ही नहीं दुनिया के सर्वकालिक महान कप्तानों में शुमार करने के लिए काफ़ी होगा लेकिन अपनी सही विरासत स्थापित करने के लिए कोहली को आँकड़ों के बजाए कप्तानी में उन क़िलों को फतह करना बाक़ी है जहाँ पर जाने के बारे में कोई भी पूर्व भारतीय कप्तान सोच भी नहीं सकता था। कोहली के पास काबिलियत भी है और टीम भी, बस इंतज़ार है संभावनाओं को नतीजे में तब्दील होते देखने की।

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