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अभियान के तहत सोमवार को सीआईएसआर-आईएचबीटी कैंपस की ली हुई फोटो सीएसआईआर इंडिया के फेसबुक पेज से

सीएसआईआर ने अपने कर्मचारियों से कहा,सोमवार को इस्त्री किए हुए कपड़े न पहने 

अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट कहती है कि कॉउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च या सीएसआईआर ने अपने कर्मचारियों को कहा है कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे से लड़ने के लिए सोमवार को इस्त्री किए हुए कपड़े नहीं पहने। 

रिपोर्ट के मुताबिक सूत्रों ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया है कि सीएसआईआर मुख्यालय द्वारा हाल ही में इस संबंध में अपनी सभी प्रयोगशालाओं को एक सर्कुलर भेजा गया है। इसमें कहा गया है कि इसको लेकर 15 मई के बाद आगे का फैसला लिया जायेगा। 

रिपोर्ट कहती है कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को रोकने की दिशा में एक और अवैज्ञानिक और विचित्र कदम उठाते हुए सीएसआईआर ने एक पखवाड़े का 'रिंकल्स अच्छे हैं' अभियान शुरू किया है। 

सीएसआईआर ने भारत भर में अपनी 37 प्रयोगशालाओं में अपने सभी कर्मचारियों, छात्रों और सभी कर्मचारियों को 15 मई तक सभी सोमवार को बिना इस्त्री किए हुए कपड़े पहनने के लिए प्रोत्साहित किया है। 

इसको लेकर कई सवाल उठ रहे हैं कि इस तरह के कदमों का औचित्य ही क्या है। जब एक जोड़ी कपड़े इस्त्री करने से मात्र 100-200 ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन होता है।

रिपोर्ट कहती है कि सीएसआईआर और सेंट्रल लेदर रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीएलआरआई), चेन्नई द्वारा जारी 3 मई, 2024 के सर्कुलर में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती को देखते हुए सप्ताह में कम से कम एक दिन इस्त्री किए हुए कपड़े पहनने से बचना होगा। 

इसका मतलब है कि उर्जी की खपत को कम करने के लिए कपड़ों पर मौजूद झुर्रियों को अपनाने और पर्यावरण स्थिरता के प्रति हमें सामूहिक प्रतिबद्धता दिखाने की जरूरत है।

इस सर्कुलर में बताया गया कि कैसे कपड़े इस्त्री करने से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन बढ़ रहा है। कपड़े पर इस्त्री करने वाले आयरन का इस्तेमाल करने के लिए लगभग 800 - 1200 वाट बिजली लगती है, जो एक बल्ब द्वारा ली गई बिजली से 20-30 गुना अधिक है। 
भारत में 74 प्रतिशत बिजली का उत्पादन कोयले से होता है। पांच लोगों के परिवार के लिए एक जोड़ी कपड़े इस्त्री करने (30-60 मिनट के लिए इस्त्री का उपयोग करने) से एक किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हो सकता है। 
रिपोर्ट कहती है कि विडंबना यह है कि सीएलआरआई चमड़ा उद्योग के साथ काम करता है, जो उद्योगों में सबसे बड़े प्रदूषकों में से एक है। इसके अलावा, सीएसआईआर की कई प्रयोगशालाएं नियमित रूप से बड़ी मात्रा में रसायनों का उपयोग करती हैं जो हानिकारक और प्रदूषणकारी दोनों हैं। 
इससे पहले आईआईटी-बॉम्बे के ऊर्जा विज्ञान और इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर और उद्यमी चेतन सिंह सोलंकी द्वारा स्थापित मुंबई स्थित एनर्जी स्वराज फाउंडेशन ने इस महीने की शुरुआत में 'रिंकल्स अच्छे है' अभियान लॉन्च किया था।
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क़मर वहीद नक़वी
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