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हाई कोर्ट ने पूछा, असहमति को कुचलने का प्रयास कर रही है सरकार?

विश्वविद्यालयों में प्रोफ़ेसरों का माओवाद से संबंध बताकर गिरफ़्तार क्यों किया जा रहा है? तेलंगाना हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस से इस पर सवाल पूछा और एक तरह से अपने सवाल का जवाब भी दे दिया। हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश राघवेंद्र सिंह चौहान ने कहा, 'आजकल पुलिस माओवाद से सहानुभूति रखने के नाम पर लोगों को गिरफ़्तार कर रही है। अब तो प्रोफ़ेसरों को भी बख्शा नहीं जा रहा है। क्या राज्य अपने अधीन आने वाली ताक़त का इस्तेमाल कर इस तरह असहमति को कुचलना चाहती है?'

दरअसल, कोर्ट की यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई में आई है जिसमें उसमानिया विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफ़ेसर चिंताकिंदी कसीम को माओवादियों से संपर्क रखने के मामले में पुलिस ने गिरफ़्तार किया है। इस टिप्पणी के साथ ही हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस को निर्देश दिया कि वे चार दिन के अंदर उन सबूतों को पेश करें जिनके आधार पर वे माओवादियों से संबंध बता रहे हैं। बता दें कि पुलिस ने कसीम को कोर्ट में तब पेश किया जब तेलंगाना सिविल लिबर्टीज़ कमिटी ने याचिका दायर की। शनिवार को पुलिस ने कसीम को विश्वविद्यालय कैंपस में उनके आधिकारिक आवास से गिरफ़्तार किया था। तब कोर्ट ने पुलिस को चेतावनी दी थी कि यदि कसीम को कोर्ट में पेश करने में विफल होते हैं तो उनके ख़िलाफ़ सीबीआई की जाँच बिठा देंगे। पुलिस ने रविवार को मुख्य न्यायाधीश के आवास पर कसीम को पेश किया। कसीम ने कहा कि वह अनुसूचित जाति से ज़रूर आते हैं लेकिन वह कभी माओवादी गतिविधि से जुड़े नहीं रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनकी लेखनी सरकार की आलोचना वाली रही है।

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इसके बाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने असहमति को दबाने को लेकर राज्य सरकार और पुलिस पर सख्त टिप्पणी की। उनकी टिप्पणी में साफ़-साफ़ कहा गया है कि आजकल माओवाद के नाम पर ऐसी गिरफ़्तारियाँ आम हो गई हैं। यह सिर्फ़ तेलंगाना में ही नहीं हो रहा है, बल्कि दूसरे राज्यों में भी हो रहा है।

ग़रीबों-आदिवासियों से सहानुभूति रखने वाले, उनके लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं और सरकार से सवाल करने वाले लोगों के मामलों में अक्सर देखा गया है कि सरकार ऐसी कार्रवाई करती रही है। ऐसी ही कार्रवाई के बीच 'अर्बन नक्सल' शब्द को गढ़ा गया। अब इसे किसने और क्यों गढ़ा, यदि इन सवालों का जवाब ढूँढना चाहते हैं तो तेलंगाना हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी में ही इसका जवाब मिल जाएगा।

असहमति लोकतंत्र के लिए सेफ़्टी वॉल्व है: सुप्रीम कोर्ट

असहमति की आवाज़ को दबाने पर सुप्रीम कोर्ट भी जब तब टिप्पणी करता रहा है। यह टिप्पणी तब भी आई थी जब भीमा-कोरेगाँव हिंसा में गिरफ़्तार पाँच सामाजिक कार्यकर्ताओं के मामले में 2018 में सुनवाई हुई थी। तब तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की बेंच में शामिल जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि विरोध की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता। इससे पहले भी जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा था, ‘असहमति लोकतंत्र के लिए सेफ़्टी वॉल्व है। अगर आप इस सेफ़्टी वॉल्व को नहीं रहने देंगे तो प्रेशर कुकर फट जाएगा।'

असहमति पर बहस भीमा-कोरेगाँव हिंसा मामले में पाँच सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी के बाद तेज़ हो गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने पाँचों कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी पर पहले सवाल उठाए थे।
हालाँकि बाद में इसने दख़ल देने से इनकार कर दिया और पाँचों को घर में नज़रबंद रखने का आदेश दे दिया था। पाँचों आरोपी कवि वरवर राव, मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुण परेरा व वेरनोन गोन्जाल्विस, मजदूर संघ कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज और सिविल लिबर्टीज कार्यकर्ता गौतम नवलखा को नज़रबंद कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने आख़िरकार निचली अदालत पर ही मामले को छोड़ दिया।
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इसमें पहले तो सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हिंसा में शामिल होने के आरोप लगाए गए और बाद में प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश रचने, माओवादियों से संबंध होने और फिर कुछ कार्यकर्ताओं के आतंकवादियों से संबंध होने के आरोप लगाए गए। मामला कोर्ट में है। 12 जून 2019 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि नागरिक स्वतंत्रता के हिमायती कार्यकर्ता गौतम नवलखा के ख़िलाफ़ प्रथम दृष्टया कोर्ट ने कुछ नहीं पाया है। हालाँकि इसके बाद 24 जुलाई 2019 को पुणे पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने यह दावा किया था कि गौतम नवलखा हिज़्बुल मुजाहिदीन और दूसरे कई कश्मीरी अलगाववादियों के संपर्क में थे। तब पुलिस की माँग को ख़ारिज़ करते हुए हाई कोर्ट ने नवलखा की गिरफ़्तारी पर लगी रोक अगले आदेश तक बढ़ा दी थी और उन्हें सुरक्षा देने को कहा था। दिल्ली के रहने वाले 65 साल के गौतम नवलखा पेशे से पत्रकार रहे हैं। मानवाधिकार के मुद्दों पर नवलखा काफ़ी बेबाकी से अपने विचार रखते रहे हैं। पिछले दो दशकों में वह कई बार कश्मीर का दौरा कर चुके हैं।

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इन पाँच कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई के बीच ही ‘अर्बन नक्सल’ का शिगूफ़ा छोड़ा गया था जिसे गाहे-बगाहे दक्षिणपंथी विचारधारा वाले लोग वाद-विवाद में भी प्रयोग करते रहे हैं।

अभी तक इन पाँचों के ख़िलाफ़ कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया जा सका है। और इसी बीच महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी और कांग्रेस की सरकार उन पर से केस वापस लेने की बात कह रही है। यानी माओवादियों से संबंध रखने की बात अभी तक साबित नहीं हो पाई है और हो सकता है कि जल्द ही ये केस वापस ले लिए जाएँ।

तो क्या तेलंगाना होई कोर्ट की टिप्पणी बिल्कुल सटीक नहीं है कि क्या सरकार असहमति को कुचलना चाहती है?

दरअसल, दुनिया भर में सरकारें निरंकुश आज़ादी चाहती हैं। वे अपने से अलग या विरोधी सोच रखने वालों का दमन करने के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं का सहारा लेती हैं। वे मुश्क़िल से ही असहमति को बर्दाश्त कर पाती हैं। ऐसे ही हालात में असहमति को देशद्रोही, राष्ट्रविरोधी और 'अर्बन नक्सल' क़रार देने की प्रवृत्ति बढ़ी है।

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