उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के नौझील कस्बे में सरकारी प्राथमिक स्कूल (नौझील फर्स्ट) के 53 वर्षीय प्रधानाचार्य जान मोहम्मद (जिन्हें मोहम्मद के नाम से भी जाना जाता है) को अब बहाल कर दिया गया है। अधिकारियों ने पुष्टि की है कि जांच पूरी होने के बाद आरोप निराधार साबित हुए हैं। उन्हें हाल ही में निलंबित किया गया था।
बजरंग दल से जुड़े स्थानीय पदाधिकारी दुर्गेश प्रधान ने शिकायत दर्ज कराई थी कि हेड मास्टर जान मोहम्मद छात्रों को इस्लाम अपनाने के लिए ब्रेनवॉश कर रहे थे। छात्रों को नमाज अदा करने के लिए मजबूर कर रहे थे। उनसे कलमा पढ़वा रहे थे। हिंदू देवी-देवताओं का अपमान कर रहे थे और स्कूल में राष्ट्रगान गाने की अनुमति नहीं दे रहे थे। इस शिकायत के आधार पर ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) रतन कीर्ति ने 30 जनवरी 2026 को जान मोहम्मद को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया था।

गांव वालों का प्रदर्शन, अभिभावकों की नाराज़गी सामने आई

निलंबन के बाद नौझील के सैकड़ों हिन्दुओं और छात्रों के अभिभावकों ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने आरोपों को राजनीतिक साजिश करार दिया और हेडमास्टर को मेहनती व समर्पित बताया। प्रदर्शनकारियों ने जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) से मिलकर तत्काल बहाली की मांग की। एक अभिभावक दयाराम पाठक समेत अनगिनत पैरंट्स ने कहा कि इलाके में हिंदू-मुस्लिम सद्भाव है और आरोपों का कोई सबूत नहीं है। स्कूल की छात्रा प्रियांशी समेत ढेरों छात्र-छात्राओं ने भी पुष्टि की कि स्कूल में रोजाना राष्ट्रगान और प्रार्थना होती है। बजरंग दल वालों के आरोप फर्जी हैं। वे गांव का माहौल बिगाड़ना चाहते हैं। टीचरों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इस सरकारी स्कूल में जान मोहम्मद ही अकेले मुस्लिम हैं, बाकी सारे टीचर और स्टाफ हिन्दू हैं। यह बहुत शर्मनाक बात है कि अकेले एक समुदाय के टीचर पर इस तरह का आरोप लगाया गया, जबकि इसकी दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है।


जांच से असलियत सामने आई

गांव वालों के प्रदर्शन के बाद शिक्षा विभाग जागा। शिक्षा विभाग ने जांच के लिए एक पैनल गठित किया था, जिसमें छटा और मांत ब्लॉक के शिक्षा अधिकारियों को शामिल किया गया। जांच में छात्रों, शिक्षकों और अन्य गवाहों के बयानों के आधार पर पाया गया कि स्कूल में नमाज कराने या राष्ट्रगान रोकने जैसी कोई घटना नहीं हुई। आरोप पूरी तरह से झूठे थे और कोई सबूत नहीं मिला।

अधिकारियों ने पुष्टि की है कि जांच रिपोर्ट के बाद जान मोहम्मद को उनके पद पर बहाल कर दिया गया है। वे अब स्कूल में सामान्य ड्यूटी पर हैं। यह फैसला शिक्षा विभाग की निष्पक्ष जांच का परिणाम है, जिसने सामुदायिक सद्भाव को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्कूल में कुल 235 छात्र पढ़ते हैं और स्टाफ में अधिकांश हिंदू शिक्षक हैं, जबकि जान मोहम्मद 2007 से यहां कार्यरत थे। इस घटना ने स्थानीय स्तर पर चर्चा बटोरी, लेकिन जांच के बाद मामला शांत हो गया है।

नहीं टिक पा रही है नफरत की आंधी

हिन्दी प्रदेशों में जिस तरह से हिन्दू-मुसलमानों के बीच नफरत फैलाने वाली घटनाएं बढ़ी हैं, ठीक उसी तरह उनका मुकाबला करने वाले लोग भी सामने आ रहे हैं। हाल ही में उत्तराखंड के कोटद्वार में ऐसी ही घटना घटी, जब बजरंग दल के उपद्रवियों ने एक मुस्लिम दुकानदार की दुकान में बाबा शब्द दुकान के नाम से हटाने को कहा। इस घटना को देख रहे जिम ट्रेनर दीपक कुमार दुकान में पहुंचे और बजरंग दल के उपद्रवियों को चुनौती दी। उपद्रवियों ने जब दीपक से उनका नाम पूछा तो दीपक ने कहा कि उनका नाम मोहम्मद दीपक है।
उत्तराखंड में बीजेपी की सरकार है। कोटद्वार की घटना ने राजनीतिक रंग ले लिया। पुलिस ने दीपक के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली। लेकिन जनता दीपक के साथ खड़ी हो गई। सोशल मीडिया पर जब वीडियो वायरल हुआ तो देशभर में दीपक के लिए समर्थन उमड़ आया। बीबीसी ने भी दीपक का इंटरव्यू किया। दीपक की घटना और एफआईआर से उत्तराखंड सरकार की खूब छीछालेदर हुई।
मथुरा में भी यही हुआ। लेकिन गांव वालों, जान मोहम्मद के साथ टीचरों और छात्र-छात्राओं ने बजरंग दल की योजना को नाकाम कर दिया। खास बात ये है कि मथुरा महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र है लेकिन मथुरा के लोगों ने इस घटना को राजनीतिक या धार्मिक रंग देने में कोई दिलचस्पी नहीं ली। शिक्षा विभाग ने भी सूझबूझ से काम लिया और जांच के बाद हेडमास्टर को बहाल करने में भलाई समझी।