आर बनाम मेट्रोपोलिस पुलिस आयुक्त मामले (1968) में, जो अवमानना से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मामला था, इंग्लैंड के तत्कालीन लॉर्ड जस्टिस डेनिंग ने टिप्पणी की थी कि “हम आलोचना से नहीं डरते, और न ही उससे नाराज़ होते हैं। क्योंकि यहाँ उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण चीज़ दाँव पर लगी है। वह है, खुद ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’।” लॉर्ड डेनिंग तमाम अन्य लोकतांत्रिक मूल्यों की सुरक्षा से पहले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे लोकतान्त्रिक मूल्य की बात करते हैं। क्योंकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक ऐसा स्पेस तैयार करने में मदद करती है जिसमें लोकतंत्र की सुंदरता निखरकर सामने आती है।

यही कारण है कि इंग्लैंड में ‘अदालत की अवमानना’ के मामले तो बहुत आए लेकिन 1931 के ‘ट्रुथ पत्रिका अवमानना’ मामले के बाद से किसी को भी अदालत की अवमानना का दोषी नहीं ठहराया गया। 1987 के स्पाइकैचर मामले में तो लॉर्ड टेम्पलमैन की न्यायिक मेच्योरिटी कमाल थी। मामला यह था कि ब्रिटिश अख़बार डेली मिरर ने तीन लॉ लॉर्ड्स की उलटी तस्वीर छापते हुए कैप्शन में लिखा था- “You Old Fools।” यह मामला जब अदालत तक पहुँचा तो लॉर्ड टेम्पलमैन ने अवमानना की कार्यवाही शुरू करने से इनकार कर दिया। उन्होंने शांत लेकिन तीखे व्यंग्य में कहा कि “मैं वास्तव में बूढ़ा हूँ। लेकिन मैं मूर्ख हूँ या नहीं यह बात जनता तय करेगी। हालाँकि, मेरा मानना है कि मैं मूर्ख नहीं हूँ।”

यह एक शानदार मिसाल थी। लॉर्ड टेम्पलमैन ने साफ़ कर दिया था कि क़ानून के विषय में फ़ैसला वो करेंगे लेकिन उनके विषय में चाहे तो जनता राय बना सकती है। यह बात तमाम अन्य स्कॉलर्स के द्वारा भी कही जा चुकी है कि न्यायाधीश को सम्राट या शासक की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए। जूडिथ रेसनिक जैसी लीगल स्कॉलर भी मानती हैं कि जज ख़ुद जनता की जाँच के दायरे में रहते हैं और इसमें कोई बुराई नहीं। लेकिन इस बात को लेकर सर्वसम्मति है कि चूँकि अदालतें न सिर्फ़ अधिकारों की संरक्षक होती हैं बल्कि क़ानून और शासन पर गहरा असर डालती हैं जो लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने में मदद करता है इसलिए अगर कभी कोई ऐसा प्रयास किया जा रहा हो जहाँ न्यायपालिका को संगठित रूप से ‘टारगेट’ करने का प्रयास हो जहाँ न्यायप्रणाली को पटरी से उतारने की मंशा हो वहाँ सर्वोच्च अदालतों को सतर्क होकर प्रयास करना चाहिए। लेकिन यह प्रयास भी मर्यादित हो तो बेहतर है क्योंकि जनता ‘न्यायप्रियता’ और ‘निष्पक्षता’ जैसे मूल्यों से नियंत्रण में रहती है न कि भय और दंड से।
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इसीलिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद-129 में प्रावधान किया गया है कि सर्वोच्च न्यायालय ‘अदालत की अवमानना’ के लिए दंड दे सकती है। अनुच्छेद कहता है कि “सर्वोच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा और उसको अपने अपमान के लिए दंड देने की शक्ति सहित ऐसे न्यायालय की सभी शक्तियाँ होंगी”। लेकिन इन्हें कैसे इस्तेमाल करना है, यह सर्वोच्च न्यायालय को तय करना होगा। अवमानना शक्ति इस्तेमाल करते समय न्यायालय की भाषा क्या होगी? उसमें कितनी कठोरता होगी और क्या संदेश होगा? यह सब कुछ संविधान निर्माताओं ने न्यायालय पर छोड़ दिया। इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि मुट्ठीभर लोगों को छोड़कर, भारत की बहुसंख्यक आबादी ने कभी भी ना संविधान पर से भरोसा कम किया और न ही देश की न्यायपालिका पर से। ऐसे में न्यायालय को हमेशा यह सोचना चाहिए कि किसी आलोचना से आहत होकर भी उसकी भाषा बेहतर बनी रहे।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अहमियत

सोशल मीडिया आज के दौर की हक़ीक़त है, तमाम अच्छाइयों के बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यहाँ राजनीति से प्रेरित कुछ संख्या में गुंडों का समूह है जो महिलाओं को अपमानित करते हैं, जनप्रतिनिधियों को अपमानित करते हैं और कभी-कभी अपमान की यह धारा न्यायपालिका तक भी पहुँच जाती है। आलोचना के फ्रेमवर्क के बाहर जाकर ये लोग खुलेआम भद्दी-भद्दी गालियाँ दे रहे हैं और इनपर कोई लगाम लगाने वाला नहीं है। यदि आज की सरकार तकनीक के इस दौर में यह कहती है कि ऐसे लोगों को खोजना मुश्किल है तो उसे ‘विश्वगुरु’ शब्द का गला तुरंत घोंट देना चाहिए। ये चंद लोग सोशल मीडिया की सड़न का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ सड़न और बदबू से भरे तत्व ही है। ऐसे लोगों की संख्या भी गिनती से परे है जो सरकार और सरकारी संस्थाओं व संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती के लिए, उन्हें जवाबदेह बनाने के लिए, न्याय और समानता जैसे सिद्धांतों के लिए लगातार रचनात्मक आलोचना करते रहते हैं। इनमें से कई सामान्य लोग हैं, कुछ राजनैतिक कार्यकर्ता, कुछ पत्रकार, कुछ सोशल एक्टिविस्ट, जैसे महिलाओं के मुद्दे उठाने वाले एक्टिविस्ट, सूचना के अधिकार से संबंधित मुद्दे उठाने वाले आरटीआई एक्टिविस्ट, दलितों और पिछड़ों के मुद्दे उठाने वाले एक्टिविस्ट, आदि आदि। 

हो सकता है कि कभी-कभार इनकी आलोचना तीखी होकर चुभने वाली बन जाती हो लेकिन इसके बावजूद ये लोग ना ही किसी सजा के हक़दार हैं और ना ही अपमान के। जैसा कि लॉर्ड डेनिंग ने कहा था कि ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ अगर दाँव पर लगी हो तो अदालत की अवमानना को ठहर जाना चाहिए।

लेकिन दो दिन पहले भारत के मुख्य न्यायधीश जस्टिस सूर्यकांत ने सोशल मीडिया पर हुई टिपण्णियों को लेकर जिस तरह की भाषा के साथ अपना रोष प्रकट किया वो दुर्भाग्यपूर्ण है। वरिष्ठ अधिवक्ता के दर्जे के लिए एक वकील की अर्जी पर सुनवाई करते हुए माननीय सीजेआई, जस्टिस सूर्यकांत ने कहा “समाज में पहले से ही ऐसे परजीवी(पैरासाइट) मौजूद हैं जो सिस्टम पर हमला करते हैं, और क्या आप उनसे हाथ मिलाना चाहते हैं? कुछ युवा कॉकरोच की तरह हैं, जिन्हें कोई रोजगार नहीं मिलता और प्रोफेशन में कोई स्थान नहीं मिलता। उनमें से कुछ मीडिया में चले जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया में, कुछ RTI कार्यकर्ता बन जाते हैं, कुछ अन्य प्रकार के कार्यकर्ता बन जाते हैं, और फिर वे हर किसी पर हमला करना शुरू कर देते हैं…”।

पूरे सम्मान और आदर के साथ मैं कह रही हूँ कि सर्वोच्च न्यायालय में न्यायधीश का पद और न्यायालय किसी व्यक्ति का ड्राइंग रूम नहीं है जहाँ जैसी चाहे वैसी बातें की जा सकें। भारत के मुख्य न्यायधीश की ऐसी भाषा, जिसमें यहाँ के युवाओं को सिर्फ़ इसलिए ‘परजीवी’ और ‘कॉकरोच’ कहा जाना क्योंकि वो न्यायालय की आलोचना करते हैं या कभी कभी ऐसी आलोचना कर देते हैं जो असहनीय हो, अस्वीकार्य है। यह भाषा पूरी दुनिया में गई होगी, दुनिया भारत की लोकतांत्रिक मूल्यों की विरासत के बारे में सोचेगी, क्या CJI ने यह नहीं सोचा?
विमर्श से और

पीएम मोदी से लेकर गृहमंत्री तक की भाषा

अभी तक पीएम मोदी, और गृहमंत्री अमित शाह इस किस्म की भाषा का इस्तेमाल करते रहे हैं। पीएम मोदी को भी लगता है कि भारत के सोशल एक्टिविस्ट ‘आंदोलनजीवी’ हैं यानी वो आंदोलन पर ज़िंदा हैं, गृहमंत्री पिछले कई साल से घुसपैठियों को ‘दीमक’ कह रहे हैं जबकि अभी तक वो गृहमंत्री की हैसियत से किसी घुसपैठिए को खोज भी नहीं सके। ऐसी ही ‘कॉकरोच’ ‘वर्मिन’, ‘पैरासाइट’ वाली भाषा एडॉल्फ़ हिटलर और उसके करीबी सिपहसलार और ‘रेडियो रवांडा’ द्वारा इस्तेमाल की जाती थी। इस भाषा का इस्तेमाल करने वाले हिटलर ने 2 करोड़ लोगों को मौत के घाट उतारा था। 90 के दशक में रवांडा में हुए 8 लाख लोगों के नरसंहार करने वालों की भी भाषा यही थी। यह तो घृणा की भाषा है, इसे सीजेआई, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की भाषा नहीं बनना चाहिए था।

मैं अपने देश के सुप्रीम कोर्ट की तुलना हिटलर, उसके सिपहसालार और रेडियो रवांडा जैसे तत्वों से नहीं कर सकती। यह व्यक्ति के रूप में जस्टिस सूर्यकांत का मामला नहीं भारत के लोकतांत्रिक वर्चस्व का मसला है, महात्मा गांधी, नेहरू और आंबेडकर का मसला है। यह भगत सिंह, सराभा समेत उन असंख्य लोगों का मसला है जो भारत की आज़ादी और भारत के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए फाँसी पर झूल गए। मैं नहीं कहूँगी कि सीजेआई के ख़िलाफ़ महाभियोग पर विचार करना चाहिए। मैं सिर्फ़ यह कहूँगी कि यह देश 140 करोड़ भारतीयों से मिलकर बना है, मुट्ठीभर कार्यपालिका इसे बंधक नहीं बना सकती।

सर्वोच्च न्यायालय भारत सरकार की बात सुनने, उसके लिए काम करने वाली संस्था नहीं है। अगर इसे सरकार के कहने सुनने पर चलना था तो इसे इतनी शक्ति दिए जाने की जरूरत ही नहीं है। 

भरोसा न्याय से होता है, काले कोट और बड़ी बड़ी खंडपीठों से नहीं, न्यायपालिका का सबसे बड़ा इन्फ्रास्ट्रक्चर है भारत के लोगों तक न्याय की पहुंच। ईंटें और बिल्डिंग न्याय का आधार नहीं हैं, न्याय पेड़ के नीचे भी दिया जा सकता है।

कोर्ट में ऐसी भाषा के इस्तेमाल पर क्या कहेंगे?

अगर आलोचना की भाषा से दिक्कत है तो मेरा सवाल ये है कि अगर आरटीआई एक्टिविस्ट, और अन्य एक्टिविस्ट, भारत के युवा, कॉकरोच और पैरासाइट हैं और सिस्टम पर हमला करते हैं तो क्या माननीय मुख्य न्यायधीश यह बतायेंगे कि जिस किस्म की भाषा देश भर के न्यायालयों में अलग अलग माननीय न्यायधीश लोग इस्तेमाल कर रहे हैं वो क्या है? जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने कहा कि ‘स्तन पकड़ना’ और ‘पायजामे की डोरी खोलना’ बलात्कार का प्रयास नहीं माना जा सकता (मार्च 2025); अप्रैल 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बलात्कार के एक मामले में जमानत देते हुए टिप्पणी की कि पीड़िता ने 'खुद मुसीबत को न्योता दिया' था क्योंकि वह बार में गई थी, शराब पी थी और आरोपी के साथ उसके घर गई थी; बलात्कार के बाद पीड़िता सो गई तो कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति कृष्णा एस. दीक्षित ने बलात्कार के आरोपी को जमानत देते हुए टिप्पणी की कि 'एक भारतीय महिला को शोभा नहीं देता' साथ ही यह कि 'हमारी महिलाएँ' जब उनका उत्पीड़न होता है तो ऐसे प्रतिक्रिया नहीं देतीं; मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, 2020 का एक मामला जिसमें न्यायमूर्ति रोहित आर्य ने यौन उत्पीड़न के एक आरोपी को जमानत देते समय शर्त रखी कि वह पीड़िता से राखी बँधवाए और 'जीवनभर उसकी रक्षा' का वचन दे।

इसी तरह जनवरी 2021 में नागपुर बेंच ने एक बाल यौन उत्पीड़न मामले में आरोपी को इस आधार पर बरी कर दिया, कि कपड़ों के ऊपर से एक बच्ची के स्तन दबाना, बिना सीधे 'त्वचा से त्वचा' के संपर्क के, POCSO अधिनियम के तहत 'यौन उत्पीड़न' नहीं है। इसमें से ज्यादातर मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने जरूरी क़दम उठाकर फैसले पलटे, लेकिन क्या ऐसे जजों के लिए वही भाषा इस्तेमाल की जानी चाहिए जो सीजेआई ने युवाओ और सोशल एक्टिविस्ट्स के लिए की है?
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सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत को बताना चाहिए किस आधार पर और किस सिद्धांत पर पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई ने अपने ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न की सुनवाई ख़ुद ही कर ली? जस्टिस गोगोई के बारे में किन शब्दों का इस्तेमाल किया जाना चाहिये?

असम सीएम हिमंता की भाषा

असम के मुख्यमंत्री खुलेआम मुसलमानों के उत्पीड़न का आह्वान करते हैं, खुलेआम गालियाँ देते हैं, मुसलमानों के आर्थिक शोषण करने को उकसाते हैं, मुसलमानों की तुलना आतंकवादी ओसामा बिन लादेन से करते हैं, फिर इनके ‘सफ़ाये’ की बात करते हैं, मुसलमानों को लेकर उनके दो बयान सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत को पढ़कर बताना चाहिए कि असम के सीएम हिमंता सरमा को किन शब्दों से बुलाया जाये?
सरमा कहते हैं कि "मदरसों को पूरे देश में बंद कर देना चाहिए। भारत को डॉक्टरों, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और सैनिकों की ज़रूरत है, मुल्लाओं की नहीं।" एक अन्य भाषण में सरमा कहते हैं कि "पहले लोग डरते थे; अब मैं खुद लोगों को परेशान करते रहने के लिए प्रोत्साहित कर रहा हूँ। तभी वे असम छोड़ेंगे। अगर आपने उन्हें परेशान नहीं किया, तो आपके अपने घर में 'लव जिहाद' होगा।"

यह कैसी भाषा है? जिन लोगों के नाम ऊपर लिए गए उनमें से कोई भी बेनाम सोशल मीडिया अकाउंट वाला नहीं है, सभी नामी गिरामी लोग हैं लेकिन उनके आचरण पूरी तरह संविधान विरोधी, न्याय विरोधी, क़ानून विरोधी, महिला विरोधी, एकता विरोधी, भारत की अखंडता विरोधी हैं। ऐसे लोगों के बारे में आपकी राय क्या है, आदरणीय सीजेआई? क्या नियम, कानून और मर्यादा आम जनता और लोगों के लिए लड़ने वालों के लिए ही है?

सिर्फ़ चुन लिए जाने और शपथ ले लेने से किसी को मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री का सम्मान नहीं मिल सकता। सिर्फ़ न्यायालय में पहुँच जाने और शपथ लेकर न्यायधीश बन जाने से न्यायधीश सम्मान का हक़दार नहीं हो सकता। न्यायधीश न्याय, समानता और निष्पक्षता के आधारों पर ही सम्मान प्राप्त करता है। यह पुरानी और सामंती सोच है कि जो कुछ भी न्यायधीश ने कह दिया सिर्फ़ वही सच है। यह बात तो भारतीय न्याय व्यवस्था में ही स्वीकार्य नहीं है इसलिए तो बहुस्तरीय न्याय प्रणाली लागू की गई है और अपील की गई, संभावनाओं को जीवित रखा गया जिससे किसी भी हालत में अन्याय को टाला जा सके।

यह बात कहने भर की नहीं है, न्यायालय ख़ुद जानता है कि लोग नाराज़ हैं। पूरा बंगाल चुनाव भेदभावपूर्ण तरीक़े से लड़ा गया, SIR का ग़लत इस्तेमाल किया गया, सुप्रीम कोर्ट जो ऐसे मामले में राहत देने के लिए बाध्य है, उसने राहत ही नहीं दी।

आख़िर निष्पक्ष चुनाव से और निष्पक्ष चुनाव आयोग से महत्वपूर्ण कौन सा अन्य काम हो सकता है? लोकतंत्र को बनाये रखने के लिए हर काम छोड़ा जा सकता है? फिर भी विपक्ष ने मर्यादा बरती और बहिष्कार नहीं किया।

निष्पक्ष चुनाव के लिए हस्तक्षेप क्यों नहीं?

सवाल ये है कि 27 लाख मतदाताओं को मतदान प्रक्रिया से हटाया क्यों गया? निष्पक्ष चुनाव के अभाव में न्यायालय ने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया? दल-बदल अधिनियम को मोदी सरकार बंधक बना ले और न्यायालय 3 सालों तक सुनवाई ना करे, ऐसा क्यों? कोर्ट सरकार की बात मानने वाली संस्था बनकर उभरने लगे, फिर भी लोग नाराज न हों? लोग प्रतिक्रिया ना दें, सोशल एक्टिविस्ट इस पर प्रतिक्रिया ना दें, आरटीआई एक्टिविस्ट इस पर सवाल ना पूछें, यह कौन सा देश बनाये जाने की कोशिश है? भारत ना ऐसा था और ना ही कोई इसे ऐसा बना सकता है। या तो भारत वो रहेगा जो गांधी का भारत था और जिसे संविधान सभा ने बड़े जतन से बनाया था और अगर इसे बदलने की कोशिश की गई, तो इसका हर संभव लोकतांत्रिक विरोध किया जाना चाहिए।

आदर और सम्मान सहित माननीय सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत जी मैं आपकी टिप्पणी से ना सिर्फ़ आहत हूँ बल्कि मुझे सम्मान सहित आपसे नाराज़गी है कि आपने देश के युवाओं के बारे में ऐसी टिप्पणी की।

हालाँकि, CJI ने अपने बयान पर सफ़ाई देते हुए कहा है कि उनके कथन को ग़लत तरीके से प्रस्तुत किया गया। उनके अनुसार, उन्होंने “कॉकरोच” और “परजीवी” जैसे शब्द आम और बेरोज़गार युवाओं के लिए नहीं, बल्कि “फ़र्ज़ी डिग्रीधारियों” के लिए कहे थे। किंतु जो भी हो, इस प्रकार की भाषा जो नाज़ियों और कट्टर हिंदुत्ववादियों की भाषा से मेल खाती है किसी अपराधी के लिए भी इस्तेमाल नहीं की जानी चाहिए। CJI देश का सर्वोच्च न्यायाधिकारी होता है; उसके मुख से ऐसी असभ्य भाषा का प्रयोग हर स्थिति में निंदनीय है।