मीडिया, एक ऐसा पहरेदार है जो वैतनिक भी हो सकता है और अवैतनिक भी, आम भी हो सकता है और खास भी। उसके कपड़े सामान्य कॉटन के भी बने हो सकते हैं और बहुत महंगे सुविन कॉटन के भी बने हो सकते हैं। लेकिन इन सभी में एक खास बात होगी, वो ये कि वे सरकार और सिर्फ़ सरकार से सवाल ज़रूर पूछते होंगे। हो सकता है इनके कपड़े बेहद मामूली हों और लाइफस्टाइल बहुत सस्ती हो लेकिन इनके द्वारा पूछे जाने वाले सवाल, सरकारों को बहुत ‘महंगे’ पड़ते हैं। दुर्भाग्य से मैं लोकतंत्र की जिस मजबूत ‘प्रजाति’ के बारे में चर्चा कर रही हूँ वो लगातार विलुप्त होने के ख़तरे से जूझ रही है।

जिस मीडिया को प्रहरी की भूमिका दी गई थी वो ‘सरकारिता’ करने में व्यस्त है। आज भारत जिस भी किस्म की समस्याओं से जूझ रहा है उसका बहुत बड़ा हिस्सा सरकारिता की वजह से ही है और इसी वजह से नरेंद्र मोदी सरकार बेलगाम होकर भारत में अधिनायकवादी शासन करने में लगी है। आज़ाद भारत के इतिहास में यह एक ऐसी सरकार है जो अपनी नीतिगत नाकामियों को राष्ट्रहित कहती है और जिम्मेदारियों का बोझ करोड़ों बेरोजगार, असहाय और परेशान भारतीयों पर डालने का अपराध कर रही है। मोदी सरकार अपनी पॉलिसी पैरालिसिस के कारण टूटते चरमराते, धराशायी हो रहे भारत को इन जरूरतमंद नागरिकों से ‘मिलकर संभालने के आह्वान’ को राष्ट्रभक्ति मानती है। नाकामियों का दस्तावेज बन चुकी नरेंद्र मोदी सरकार यह सब खुलकर इसलिए कर पा रही है क्योंकि जिन्हें लोकतंत्र का पहरेदार बनाया गया था वो अपने बच्चों को विदेशों में पढ़ाने और फ़ार्म हाउस बनाने के लिए पैसे ‘बनाने’ में लगे हैं।

प्रेस की स्वतंत्रता का हाल

भारत का ‘वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’ में क्या स्थान है, इसके बारे में ‘फ्रीडम हाउस’ क्या कहता है या फिर ‘वी-डेम’ जैसी प्रतिष्ठित रिपोर्ट्स क्या सोचती हैं, यह मामला उससे बहुत आगे निकल चुका है। आंकड़ों के आईने उन्हें दिखाए जाते हैं जिनमें शर्म बची हो, उस बेशर्म मीडिया को नहीं दिखाया जा सकता जो महंगाई, बेरोजगारी, ग़रीबी, आर्थिक संकट, विदेश नीति का संकट, आतंकी हमला, विपक्ष के सवाल, सुरक्षा में चूक, हर एक मुद्दे पर सरकार का बचाव करने के लिए उतर आता है। अब यह पहचानना भी मुश्किल हो गया है कि न्यूज़ चैनल हैं या सरकार का अपना मुखपत्र, पत्रकार हैं या सरकार के आधिकारिक प्रवक्ता!
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मीडिया की धोखेबाजी ने करोड़ों भारतीयों का जीवन संकट में डाल दिया है। सरकार लगभग तानाशाही रवैया अपनाने में लगी है, वह भाषण के मंच पर खड़ी सरकार (प्रधानमंत्री) हो या अदालत में खड़ी सरकार (सॉलिसिटर जनरल) हो, वो खुलकर ऐसी बातें करने में लगे हैं जिनका लोकतांत्रिक परंपराओं और मूल्यों से बिल्कुल सीधा विरोध है। चुनाव आयोग हो या न्यायधीश वो कुछ भी कहकर आगे बढ़ सकते हैं, तथाकथित मुख्यधारा का मीडिया, मुख्यरूप से टीवी मीडिया उनसे अप्रत्यक्ष ही सही, कोई ज़रूरी सवाल पूछने की हिम्मत नहीं करता है।

धीरे-धीरे सारी हदें पार की जा रही हैं और लोकतंत्र की लक्ष्मण रेखा को मिटाया जा रहा है। इसकी शुरुआत भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ही की थी, जब उन्होंने अपनी ‘कम लोकतांत्रिक समझ’ का परिचय देते हुए कहा था कि भारत को ‘कांग्रेस मुक्त’ बनाना है। मोदी इतनी कम समझ वाले हैं कि वे लोकतांत्रिक विरोधियों और दुश्मनों में अन्तर करना नहीं जानते क्योंकि वो जिस आरएसएस के बैकग्राउंड से आते हैं वहाँ विचारों में विविधता को नीचा समझा जाता है, वैचारिक विविधता को वहां पर श्रेष्ठ नहीं माना जाता है। 

NEET पेपर लीक पर मीडिया का रवैया

मोदी सरकार के शिक्षा मंत्री, धर्मेंद्र प्रधान जिन्हें अगर सार्वकालिक सर्वाधिक नाकाम शिक्षा मंत्री कहा जाये तो ग़लत नहीं होगा, उन्होंने 2026 में लीक हुए NEET-UG के पेपर के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी जिसमें वो नेशनल टेस्टिंग एजेंसी(NTA) द्वारा लिए गए निर्णयों के बारे में बता रहे थे। तभी एक पत्रकार ने उनसे संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट के बारे में पूछा। धर्मेंद्र प्रधान ने जो जवाब दिया वो किसी भी सभ्य लोकतांत्रिक देश का शिक्षा मंत्री नहीं दे सकता। उन्होंने कहा “मैं संसदीय समिति के निष्कर्ष पर नहीं जाना चाहता हूँ। मैं राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों पर ध्यान दूँगा। संसदीय समिति में विपक्षी दलों के सदस्य हैं और आप मुझसे बेहतर जानते हैं कि वो कैसे रिपोर्ट तैयार करते हैं।” शिक्षा मंत्री का बयान यह बता रहा है कि बीजेपी के भीतर विपक्ष को लेकर प्रतियोगिता नहीं, प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि घृणा का माहौल है। विरोध करने वालों को घृणा की नजर से देखना, उन्हें तुच्छ समझना यह बीजेपी की राजनीति का हिस्सा बन चुका है।

संसदीय लोकतंत्र में कोई इतना नीचे कैसे गिर सकता है? ख़ासकर तब जबकि यह सरकार अपनी नाकामियों (पेपरलीक) की वजह से करोड़ों छात्रों को मजबूर और लाचार कर चुकी है। कई छात्र तो इस पेपरलीक की वजह से आत्महत्या तक कर चुके हैं।

पंगु बना दिया

मोदी सरकार और उनके मंत्री इतना नीचे इसलिए गिर पा रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि उनके इन अलोकतांत्रिक कृत्यों के बारे में चर्चा करने के लिए जो मीडिया था उसे उन्होंने पंगु बनाकर या तो मोदी-मोदी रटने वाला तोता बना दिया है या फिर एक ऐसा श्वान जो हर उस व्यक्ति को काटने को दौड़ता है जो सरकार की नाकामियों पर सवाल उठाता है। जिन लोगों ने इनमें से कुछ बनने या होने से इंकार किया उनका साजिश के तहत ‘एनडीटीवीकरण’ कर दिया गया।

कमजोर और कायर बनावटें (गैर ज़िम्मेदार) जब लोकतंत्र में सत्ता हासिल कर लेती हैं तो हर उस संस्थान को, जो स्वतंत्र होकर खड़ा रह सकता है, उसे अपनी तरह बनाने की कोशिश में लग जाती हैं। उनके लिए राज्यपाल, राष्ट्रपति, न्यायाधीश, ब्यूरोक्रेट, मीडिया आदि आदि सभी बस एक टूल(औजार) की तरह होते हैं, वे इन सबका ग़लत तरीक़े से इस्तेमाल करते हैं जिससे वो सत्ता में ज़्यादा से ज़्यादा समय तक बने रह सकें।
 
लेकिन वहीं पर मजबूत और सशक्त लीडरशिप, निडर और सशक्त मीडिया के लिए माहौल बनाता है, न्यायपालिका हमेशा मजबूत बनी रहे उसके लिए प्रयास करता है। देश की अखंडता अक्षुण्ण रहे, इस तरह से केंद्र-राज्य संबंधों को सजाया जाता है। संघर्ष कैसा भी हो उसको लोकतांत्रिक तरीके से ही निपटाया जाता है, जनता और सिविल सोसाइटी के साथ लगातार संवाद स्थापित किया जाता है। सिविल सोसाइटी की चिंताओं को नोट किया जाता है, उनके विरोध को ‘ऐब्ज़ोर्ब’ किया जाता है जिससे आने वाली बड़ी समस्याओं से बचा जा सके।
विमर्श से और
यह सबकुछ बिना स्वतंत्र मीडिया के संभव नहीं। स्वतंत्र मीडिया के अभाव में प्रधानमंत्री की भाषा कितने नीचे गिर जाएगी इसका अनुमान लगाना लगभग मुश्किल है। जिस देश में मीडिया अपने प्रधानमंत्री को संसद में खड़े होकर सिविल सोसाइटी के सदस्यों को ‘आंदोलनजीवी’ और परजीवी बोलने देता है और इस पर सवाल तक नहीं करता, उल्टे उसका बचाव करने में लग जाता है उस देश में बातचीत का स्तर हर जगह नीचे आने लगता है धर्मेंद्र प्रधान तो बस एक मंत्री ही हैं।

NCERT की किताबों से कार्टून्स को हटाने की माँग

भारत का सॉलिसिटर जनरल इतना साहस कैसे जुटा लेता है कि वो ‘जनहित याचिका’ को बंद करने के बारे में भारत की सर्वोच्च अदालत में खड़ा होकर बोल दे? पूरी दुनिया में जहाँ ‘कार्टून्स’ को लोकतांत्रिक चेतना के लिए महत्वपूर्ण साधन के रूप में लिया जाता है, जिन व्यंग्यात्मक कार्टून्स का इतिहास 200 सालों से भी अधिक का है उन कार्टून्स को स्कूल की NCERT की किताबों से हटाने की माँग भारत की सर्वोच्च अदालत के सामने भारत का सॉलिसिटर जनरल कैसे कर सकता है? कार्टून्स महात्मा गांधी पर भी बने, जवाहरलाल नेहरू और आंबेडकर पर भी, कार्टून्स सभी पर बनते रहे हैं और ये बच्चों के मानसिक स्तर पर कभी ग़लत प्रभाव नहीं डालते, कभी भी यह विचार किसी ने नहीं किया कि उन्हें किताबों से हटाया जाये, इस तरीक़े का विचार दिमाग़ के भीतर आना असल में लोकतंत्र को किश्तों में समाप्त करने की गहरी साजिश का एक हिस्सा है।

लेकिन फिर से प्रश्न यही है कि ऐसे मुद्दे को लेकर सरकार पर सवाल कौन उठाएगा? भारत के लोकतंत्र पर हो रहे अतिक्रमण को कैसे रोका जाएगा? भारतीय लोकतंत्र को बचाने के तीन डाइमेंशन्स हैं। पहला- मीडिया, जोकि 2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद से नतमस्तक है। दूसरा, न्यायपालिका और तीसरा भारत की जनता जिससे संविधान ने सर्वाधिक उम्मीद लगाई है। भारत के मीडिया ने भारत के लोकतंत्र को सबसे सस्ते में बेचने में मदद की है।

सबसे आसान तरीके से कुछ करोड़ और हज़ार करोड़ रुपए खर्च करके मीडिया के एक एक शब्द पर लगाम लगा दी गई है। कभी कभार जो सवाल इस मीडिया के मुँह से बाहर आते भी हैं वो भी इसी लगाम के रेग्यूलेशन का हिस्सा ही है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मीडिया

असल में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मीडिया का हिस्सा नहीं है बल्कि यह ख़ुद मीडिया है इसलिए कभी कभार आने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दौरे छद्म और छलावा भर ही हैं। सरकार जानती है कि कब मीडिया को बोलने दिया जाये और कितनी छूट दी जाये। ऐसे में मीडिया से सीधे तौर पर कोई उम्मीद दिखाई नहीं देती। न्यायपालिका, के बारे में संविधान निर्माताओं ने सोचा होगा कि बहुत बुरे समय में, एक ख़राब और अलोकतांत्रिक सरकार के समय में न्यायपालिका अड़कर खड़ी रहेगी और इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को बचा लेगी। लेकिन यह उम्मीद भी अब फेल हो रही है। जिस देश के माननीय मुख्य न्यायधीश युवाओं को ‘कॉकरोच’ और ‘पैरासाइट’ बोलने लगें, जिस देश के मुख्य न्यायाधीश पर्यावरण कार्यकर्ताओं(एक्टिविस्ट) को विकास में बाधा समझें, विकास विरोधी समझें, वो भी तब जबकि CJI उसी शहर में रहते हों जो दुनिया की सबसे प्रदूषित और बीमार करने वाली राजधानी हो, जबकि CJI को पता है कि किस तरह भूकंप के लिए सर्वाधिक संवेदनशील उत्तराखंड में पहाड़ों को तोड़-तोड़कर रास्ते बनाये गए, तमाम कमेटियों और एक्सपर्ट्स की राय को अनदेखा करके हिमालय और उसके नदी तंत्र को बेकार किया जा रहा है। केदारनाथ आपदा(2013), चमोली आपदा(2021, 200 मौतें), जोशीमठ की ज़मीन का धँसना(2023), हिमाचल में बादल फटना(2023, 440 मौतें), उत्तर काशी में बादल फटना(2025, 140 मौतें) आदि जैसी आपदाएं इसी पर्यावरण की अनदेखी का परिणाम हैं। सीजेआई जानते हैं कि अनुच्छेद-21 के अनुकरण में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल जैसी संस्थाएं बनायी गईं जिससे विकास की होड़ में पर्यावरण को बर्बाद होने से रोका जा सके।
 
ऐसा नहीं लगता कि सीजेआई को इन घटनाओं के बारे में नहीं पता होगा या उन्हें यह नहीं पता होगा कि भारत में प्रदूषण और पर्यावरण की स्थिति क्या है। उसके बाद भी ऐसी विचारधारा? आखिर क्यों? इस सोच के पीछे का असली कारण क्या है?

 'बेरोजगार युवा कॉकरोच' विवाद

संस्थाओं की ऐसी असमय मौत के बाद अंतिम बागडोर जनता के हाथ में आती है। और ये वही जनता है जिससे संविधान निर्माताओं ने प्रस्तावना के माध्यम से ‘आचमन’ करवाया था। जनता ही असली ‘जजमान’ है। लेकिन ये इतनी असंगठित होती है कि उसका हर प्रयास कमतर रह जाता है। यह सकारात्मक भी है और नकारात्मक भी। सकारात्मक इसलिए कि भारत को किसी भी हालत में नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसी जनता नहीं चाहिए। यहाँ ऐसा कोई जनसमूह नहीं चाहिए जो उन्माद में मूर्तियाँ तोड़े और नेताओं को घेरकर उनके साथ हिंसात्मक व्यवहार करे। भले ही सीजेआई ने बेरोजगार युवाओं को कॉकरोच बोल दिया हो लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि युवा कॉकरोच के अवतार में इकट्ठा होने लगे। जिस तरह बेलगाम सरकार, न्यायपालिका और ब्यूरोक्रेसी खतरनाक है वैसे ही बेलगाम जनता भी बहुत ख़तरनाक़ है। जो जनमानस हाथ में संविधान लेकर उसके मूल्यों को समझकर धीरज और संतुलन के साथ सत्ता का प्रतिरोध करे, उसे जनतांत्रिक मुद्दों के आधार पर घेरे और जवाब मांगे, जागरूकता फैलाए, बस वैसे ही लोगों की ज़रूरत है। ऐसे लोगों की नहीं जो मौके का लाभ उठाकर ऑनलाइन आंदोलन चलायें और ‘एक भी वोट कट जाने पर’ ‘UAPA के तहत चुनाव आयोग को बंद कराने का आह्वान करें। यह भय भी अनायास नहीं कि फिर कोई ‘अन्ना’ पैदा हो जाये जो फिर एक ‘आप’ लेकर आ जाए और देश फिर ठगा रह जाये। यदि किसी को आंदोलन चलाना है, सरकार का विरोध करना है तो राहुल गांधी के पीछे जाकर खड़े हो जाएँ, जो संविधान अपन हाथ में लेकर नरेंद्र मोदी सरकार को चुनौती दे रहे हैं। उन्हें जल्दबाजी नहीं है और वो नरेंद्र मोदी को आश्वस्त होकर खड़े नहीं रहने देंगे। यही लोकतांत्रिक तरीका है।
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मीडिया, न्यायपालिका और जनता में अभी कोई पूरी तरह तैयार नहीं है। इन तीनो में से कुछ-कुछ लोगों को अपने ही क्षेत्र में संविधान सम्मत कार्य करते हुए प्रतिरोध बुलंद करना होगा, सवाल करने होंगे, नागरिकों के साथ खड़ा होना होगा, विपक्ष के साथ खड़ा होना होगा तभी भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत किया जा सकेगा।

मीडिया की मदद से नरेंद्र मोदी सरकार ने भारत को इस स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया है जिसमें ‘आम लोग’, ‘जनता’ और ‘विपक्ष’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल तो खूब है लेकिन संप्रभु देश भारत के ‘नागरिक’ के रूप में पहचान और अधिकार धुँधले कर दिए गए हैं। जिस तरह सरकार के नुमाइंदों से लेकर पार्टी के कार्यकर्ता और न्यायपालिका ने व्यवहार किया है और कर रही हैं ‘भारत का नागरिक’ एक आउटडेटेड एंटिटी बना दिया गया है जिसकी गरिमा और अधिकार लगभग छीन लिए गए हैं। इस पर ध्यान देने की जरूरत है और इसे ठीक करने की ज़रूरत है।