बक़रीद क़रीब आ गई है।इसका पता कैसे चला? भारतीय जनता पार्टी के नेताओं, उसकी सरकारों के मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों के बयान आने लगे जिनमें मुसलमानों को धमकी और चेतावनी दी जा रही है।
अब ईद,बक़रीद का इंतज़ार जितना मुसलमान नहीं करते, हिंदुत्ववादी करते हैं। उनकी उत्तेजना इन त्योहारों के क़रीब आते ही बढ़ जाती है।आपको किसी मौलवी से पूछने की ज़रूरत नहीं, हिंदुत्ववादियों के बयानों को सुनकर, पढ़कर आप अनुमान कर सकते हैं कि मुसलमानों का कोई पर्व क़रीब आ रहा है। वे कोई बधाई, शुभेच्छा वाले बयान नहीं होते, यह कहने की ज़रूरत नहीं।
पश्चिम बंगाल के मंत्री दिलीप घोष ने हिंदी में चेतावनी दी कि सब कुछ क़ानून के मुताबिक़ होना चाहिए,किसी को भी क़ानून तोड़ने की इजाज़त नहीं दी जाएगी। यह वे किसी संदर्भ में और किसके लिए कह रहे थे? क्या उन लोगों के लिए जो ऑटो रिक्शा रोककर ड्राइवर पर हमला कर रहे है और उसे जय श्री राम का नारा लगाने को मजबूर कर रहे हैं? या उन अधिकारियों के लिए जो भारतीय जनता पार्टी की विधान सभा चुनाव में जीत के बाद तुरंत मुसलमानों के घरों पर बुलडोज़र लेकर पहुँच गए? या ख़ुद अपने और दूसरे भाजपा नेताओं के बारे में जो खुलेआम कह रहे हैं कि चूँकि मुसलमानों ने उन्हें वोट नहीं दिया है, उन्हें किसी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिलेगा? क्या वे उनकी निंदा कर रहे हैं जिन्होंने संविधान विरोधी बयान दिया कि अब सरकार सिर्फ़ उनके लिए काम करेगी जो उसके साथ हैं?
सबको मालूम है कि वे ईद के पहले मुसलमानों को चेतावनी दे रहे थे।उसके पहले मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी धमकी दे चुके हैं कि किसी को सड़क पर नमाज़ पढ़ने नहीं दी जाएगी। गाय की क़ुर्बानी न करने का हुक्म भी जारी किया गया।बक़रीद के पहले ऐलान किया गया कि दो दिन की छुट्टी अब सिर्फ़ एक दिन की होगी।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने मुसलमानों को चेतावनी दी कि वे सड़क पर नमाज़ नहीं पढ़ने देंगे।अगर वे बात से नहीं माने तो दूसरे तरीक़े से उनको समझाया जाएगा। दूसरा तरीक़ा क्या है, हम सब जानते हैं।
असम के मुख्यमंत्री ने क़ुर्बानी क़ायदे से करने की सलाह दी। उन्होंने मुसलमानों के उन बयानों की सराहना की जिनमें उन्होंने गाय की क़ुर्बानी न करने की अपील की है। सरमा ने कहा कि बक़रीद को पूरी तरह क़ुर्बानी से मुक्त करना चाहिए। मुसलमान सनातन भावना का सम्मान कर रहे हैं, इससे समाज में शांति रहेगी।दिल्ली के भाजपा के नेताओं ने भी क़ुर्बानी और नमाज़ क़ायदे से करने की चेतावनी दी है।
ऐसे वीडियो दिखलाई दे रहे हैं जिनमें गाड़ियों को रोक कर उनपर हमला किया जा रहा है।आरोप है कि उनमें ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से गाएँ क़ुर्बानी के लिए ले जाई जा रही हैं। बात अब गायों तक सीमित नहीं है। बकरों को भी ज़ब्त किया जा रहा है। दिल्ली में बक़रीद के पहले नेहरू हिल पार्क में सार्वजनिक गतिविधि पर रोक लगा दी गई क्योंकि अंदेशा था कि वहाँ इस बहाने बकरों की ख़रीद-बिक्री होगी।
एक टी वी चैनल ने मक्का जाकर पता किया कि वहाँ गया और ऊँट की क़ुर्बानी नहीं दी जा रही है। ये चैनल ग़ाज़ा नहीं गए जब वहाँ बच्चे क़त्ल किए जा रहे थे या सूडान जहाँ क़त्लेआम चल रहा है। लेकिन बक़रीद के पहले इतनी महत्त्वपूर्ण जानकारी इकट्ठा करने मक्का जाने की ज़हमत उन्होंने उठाई।
जानवरों को लेकर फ़िक्रमंद संस्था ‘पेटा’ ने एक अभियान शुरू किया जिसमें एक बकरा लोगों से अपील कर रहा है कि उसकी क़ुर्बानी न की जाए। इसमें बच्चे रुक रुक कर उसे दुलार कर रहे हैं। क्या कोई इतना बेरहम होगा कि ऐसे बेज़ुबान की क़ुर्बानी दे?यह अभियान बक़रीद के ठीक पहले चलाया गया है।
क्या ‘पेटा’ कामरूप कामख्या में कभी इस तरह का अभियान चला सकता है? मेरे मातृ-पितृ नगर देवघर में क्या वह यह अभियान चला सकता है जहाँ यज्ञोपवीत, विवाह, आदि में एक घर में एकाधिक बलियाँ होती हैं? आज तक उसने यह नहीं किया है। ‘पेटा’ के इस अभियान में जितनी बकरों के प्रति करुणा नहीं है, उतनी मुसलमानों के प्रति घृणा है। वह अप्रत्यक्ष है लेकिन उसे महसूस करना क़तई कठिन नहीं है।
यों तो अब साल भर मुसलमानों पर हमले होते रहते हैं। सड़क पर, रेस्तराँ में, ट्रेन या बस में: कहीं भी, किसी भी वक्त किसी न किसी बहाने उनपर हमला किया जा सकता है। लेकिन बक़रीद के पहले मुसलमान विरोधी घृणा अभियान में ख़ास उत्साह आ जाता है।
तकलीफ़ इस बात की है कि भले हिंदू भी इस मुसलमान विरोधी नफ़रत को देख या महसूस नहीं कर पाते।हिंदुओं में बहुतेरे हैं जो मासूमियत से पूछते हैं कि भला सड़क पर नमाज़ क्यों पढ़ी जानी चाहिए। वे इस पर पाबंदी को यातायात सुगम बनाए जाने के लिए वाजिब मानते हैं।वे यह नहीं पूछते कि हर मंगलवार को प्रायः हनुमान मंदिरों के सामने की सड़कें घंटों तक क्यों जाम हो जाती हैं।
हिंदुओं के हर त्योहार में सड़क घेर कर मूर्तियाँ बिठाई जाती हैं। गणेश चतुर्थी हो, रथयात्रा हो, राम नवमी हो, दुर्गा पूजा हो, सरस्वती पूजा, महावीरी अखाड़ा, हनुमान जयंती, आदि, आदि: हर मौक़े पर एक दिन नहीं कई दिनों तक सड़कों को घेर लिया जाता है और जुलूस निकाले जाते हैं। महीने भर चलनेवाली कांवड़ यात्रा को तो भूल ही जाइए जिसमें पूरी की पूरी सड़क घेर ली जाती है, और वह भी आधिकारिक तौर पर?
क्या आपने कभी हिंदू मुख्यमंत्रियों को हिंदू त्योहारों के वक्त इस तरह की अपील करते सुना है कि पूजा मंदिरों में ही होनी चाहिए जो हर कुछ कदम पर बने हुए हैं? क्या कभी इस तरह की चेतावानी हिंदू त्योहारों पर दी गई है कि हिंदू अपने पर्व ऐसे मनाएँ कि दूसरों को असुविधा न हो ?
वक़्त-बेवक़्त से और खबरें
मुसलमान अपने त्योहार में कोई शोर शराबा नहीं करते। ईसाई भी नहीं। वे कभी मंदिरों के सामने जाकर क़ुर्बानी नहीं करते। मुहर्रम में भी वे मंदिरों के आगे जाकर मातम नहीं करते। हिंदू ज़रूर मस्जिदों के सामने बाजा बजाना चाहते हैं, मस्जिदों में घुसना चाहते हैं, उनके धार्मिक प्रतीकों को अपवित्र करना चाहते हैं।ऐसा किए बिना अब अब उन्हें पूरा धार्मिक आंनद नहीं मिलता।
मुसलमान त्योहारों में मुसलमानों का संयम देखा जाता है,लेकिन दुर्भाग्य से इन अवसरों पर हिंदू समाज की भीतरी विकृति गटर की गंदगी की तरह बहने लगती है।
मुसलमानों को चैन से अपना त्योहार नहीं मनाने देने में कौन सी ख़ुशी मिलती है,और क्यों?क्या हिंदू समाज अपनी इस ग्रंथि पर कभी बात करेगा?