कुछ जाने बिना किताब के नाम पर ही दक्षिणपंथी भोपाल में भड़क उठे
भोपाल के साहित्य और कला उत्सव में बाबर पर एक किताब पर चर्चा रद्द कर दी गई। किताब के लेखक का अफ़सोस यह है कि यह चर्चा रद्द उन लोगों ने करवाई जिनके लिए और जिनकी तरफ़ से उन्होंने यह किताब लिखी थी। हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के प्रचार प्रसार के उद्देश्य से लिखी गई किताब, ‘बाबर: द क्वेस्ट फॉर हिंदुस्तान’ का नाम सुनकर ही बाबर विरोधी राष्ट्रवादियों का क्रोध फूट पड़ा और उससे डरकर पुलिस ने आयोजक को कहा कि अगर यह सत्र हुआ तो दक्षिणपंथी उपद्रवियों के आक्रमण का ख़तरा है।इस वजह से सत्र रद्द करना पड़ा।
लेखक को मालूम था कि बाबर के नाम पर विरोध हो रहा है लेकिन उन्होंने सोचा था कि जो एतराज कर रहे हैं वे उन्हीं के अपने लोग हैं और बातचीत करके ग़लतफ़हमी दूर कर ली जाएगी। लेकिन तब तक फ़ैसला हो चुका था। पुलिस की सलाह पर हंगामे या हिंसा से बचने के लिए आयोजकों ने बाबर पर किताबवाला सत्र रद्द कर दिया।
अब दुखी लेखक के पास हिंदुत्ववादियों के सर्वोच्च अभिभावक, यानी नरेंद्र मोदी के पास शिकायती पत्र लिखने के अलावा और कोई न बचा था।उन्होंने अपना लंबा पत्र एक्स (ट्विटर)पर जारी किया है। पत्र में उन्होंने प्रधानमंत्री से शिकायत की है कि उनकी किताब के बारे में एक अख़बार ने झूठी खबर छाप कर उसके ख़िलाफ़ भ्रम फैलाया और उसके चलते कुछ स्वनामधन्य हिंदू हित रक्षक संगठनों ने हिंसा की धमकी दी।सबसे दुख की बात तो यह है कि मध्य प्रदेश के संस्कृति मंत्री ने भी बिना किताब का एक भी पृष्ठ पढ़े किताब के ख़िलाफ़ बयान दे डाला। लेखक के मुताबिक़ इस घटना से सत्ताधारियों की बौद्धिक दरिद्रता उजागर हुई है।
इस प्रसंग में जो महत्त्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य है, वह यह कि एक शहर में स्थानीय हिंसक समूहों और अख़बार के ख़िलाफ़ शिकायत करने के लिए प्रधानमंत्री के अलावा और किसी का नाम लेखक को नहीं सूझा। इसका मतलब क्या यह है कि वह यह मानते हैं कि इन सबका नियंत्रण सिर्फ़ वही कर सकते हैं। न तो स्थानीय पुलिस, न राज्य सरकार,मात्र प्रधानमंत्री! तो क्या यह अप्रत्यक्ष स्वीकृति नहीं कि इस घृणा और हिंसा का स्रोत भी वही हैं। वे समझ जाएँगे तो सब समझ जाएँगे!
लेखक का दुख यह है कि उनकी किताब के बारे में मिथ्या प्रचार किया गया कि यह बाबर का गुणगान करती है। उनके मुताबिक़ असलियत यह है कि बाबर के काले कारनामों का पर्दाफाश करने के लिए यह किताब लिखी गई है।लेखक चुनौती देते हैं कि विरोधियों में कोई किताब से एक भी हर्फ़ निकाल कर दिखला दे जो बाबर को गौरवान्वित करता हो।असल में यहाँ किताब यह साबित करती है कि जिन्हें मुग़ल कहा जाता है उन्होंने कभी भारत को अपना घर नहीं समझा और समरकंद को ही अपना केंद्र माना।
लेखक को जितना दुख अपनी किताब के कार्यक्रम के रद्द होने का नहीं उतना इस बात का है कि संवैधानिक पदों पर बैठे मंत्रियों और अधिकारियों की बौद्धिक क्षमता शून्य है। वे हैरान हैं कि बिना पढ़े उनकी किताब के बारे में राय बना ली गई। यह भी कि हिंदू संगठन यह भी नहीं समझ पाते कि उनकी मुसलमान विरोधी घृणा और हिंसा को वैध साबित करने के लिए बेचारे लेखक जैसे लोग कितनी मेहनत करके तर्क जुटाते हैं। उनकी कोई कद्र ही नहीं है।
इस घटना के बारे में पढ़कर मुझे कुछ वर्ष पहले की इससे लगभग मिलती जुलती घटना याद आ गई। राजस्थान के एक विश्वविद्यालय दिल्ली विश्वविद्यालय में दर्शन शास्त्र विभाग के अध्यापक प्रोफ़ेसर अशोक वोहरा का व्याख्यान आयोजित किया गया।उसके बाद आयोजक और वोहरा साहब के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुआ और उनके विरूद्ध एफ़ आई आर दर्ज करवा दी गई। आरोप था कि प्रोफ़ेसर वोहरा ने हिंदू देवी देवताओं का अपमान करनेवाली बातें कहीं। बेचारे प्रोफ़ेसर वोहरा को भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखना पड़ा। अपने पत्र में उन्होंने वही शिकायत की जो बाबरवाली किताब के लेखक ने की है। वोहरा साहब ने लिखा कि विरोध करनेवालों ने उनका पर्चा पढ़ा ही नहीं। वे तो वेंडी डॉनिगर जैसे भारतविदों की आलोचना कर रहे थे। ये वही वेंडी डॉनिगर हैं जिनकी किताब हिंदू संगठनों के हंगामे के बाद लुगदी बना दी गई थी। वोहरा साहब ने तत्कालीन मुख्यमंत्री को पत्र लिखा कि उन्होंने अपने पर्चे में वेंडी के शब्दों को उद्धृत किया था ताकि वे उनका विरोध कर सकें।वे उनके शब्द नहीं हैं। चाहें तो जाँच करवा लें। अगर उनकी गलती हुई तो वे माफ़ी माँगने को तैयार हैं।
वोहरा साहब ने वही कहा था जो बाबरवाली किताब के लेखक ने कहा, विरोध करने के पहले पढ़ तो लेते। हम तो आपकी ही बात कर रहे थे, आपने हम पर ही हमला कर दिया!
जिस अख़बार पर लेखक ने भ्रम फैलाने का आरोप लगाया है, वह अपने स्टैंड से पीछे नहीं हटा है। उसका कहना है कि राम मंदिर बन चुका, उस पर धर्म ध्वजा भी फहराई जा चुकी। अब देश विकास के रास्ते पर चल पड़ा है।इतने उत्साहपूर्ण वातावरण में बाबर जैसों का ज़िक्र करके नकारात्मकता क्यों फैलाना?
अख़बार की बात में दम है।यह वक्त सिर्फ़ जयकारे का है, आलोचना-प्रत्यालोचना का नहीं।लेखक महोदय को यह भ्रम है कि बाबर विरोधियों को तर्क और सबूत चाहिए। उन्हें एक नारा दे दिया गया था, वह काफ़ी है: ‘तेल लगाकर डाबर का, नाम मिटा दो बाबर का।’ बाबरी मस्जिद मिटा दी गई। बाबर को मिटा देने के बाद बाबर की औलादों का सफ़ाया कर देने का काम चल रहा है। इस अभियान में किताब का क्या काम!
कुछ कुछ ऐसी ही बात दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति ने कही। उन्होंने आदेश जारी किया कि राष्ट्रवाद की विजय के इस गौरवशाली क्षण में ‘आक्रांता बाबर’ से संबंधित कुछ भी नहीं पढ़ाया जाएगा। तो इस बाबरवाली किताब की भी ख़रीद दिल्ली विश्वविद्यालय में नहीं होगी,अगर यह आदेश माना जाए।
2014 में बाबर को परास्त करके नरेंद्र मोदी के सिंहासनारूढ़ होने के बाद वेंडी डॉनिगर की किताब, “हिंदूज़:ऐन अल्टरनेटिव हिस्ट्री’ के ख़िलाफ़ अभियान एक मुक़ाम पर पहुँचा। प्रकाशक पेंगुइन में किताब बाज़ार से वापस ले ली। दीनानाथ बत्रा( वे अवश्य स्वर्ग में होंगे) किताबों और लेखकों के ख़िलाफ़ अभियान चलाते रहते थे। वे ऐसे ‘राष्ट्रवाद विरोधियों’ के ख़िलाफ़ लिखते थे, अदालत जाते थे। पूरी तरह क़ानूनी रास्ते से चलते थे। इसके साथ ही उनके सहयोगी संगठन, जैसे विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल या अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद बाक़ी काम सँभालते थे: लेखक पर हमला करना, किताब की दुकान में तोड़ फोड़ करना।
जब प्रकाशक को वेंडी डॉनिगर की किताब की लुगदी बना देने पर मजबूर कर दिया गया उसी समय एक टी वी चैनल पर इसे लेकर एक चर्चा हुई। उसमें मैंने ए बी वी पी के प्रवक्ता से पूछा कि अगर वे उस किताब से असहमत है तो उसकी आलोचना में किताब या कम से कम एक लेख ही क्यों नहीं लिखते! उन्होंने जवाब दिया कि इसमें बहुत वक्त लगता है:इसके लिए किताब पढ़नी पड़ेगी और उसके ख़िलाफ़ लिखने के लिए और बहुत कुछ पढ़ना पड़ेगा।इतना वक्त कहाँ है? माचिस लगाने में सेकंड भी नहीं लगता।
तो लोगों के हाथ में अब माचिस है और लट्ठ है। आग लगाने और लट्ठ चलाने के लिए जोश भरने को नारे, जयकारे चाहिए।टेबल कुर्सी पर बैठकर किताब लिखने और पढ़ने का यह समय नहीं है। यह समय बाबर पर किताब लिखने का नहीं, जहाँ-जहाँ बाबर नाम है या उस तरह के नाम हैं, उनपर पर कालिख पोतने का है।
लेकिन यह भी एक विडंबना ही है कि घृणा और हिंसा को भी बौद्धिक आधार चाहिए।हिटलर ने भी किताब लिखी और गोलवलकर और सावरकर ने भी।पिछले 11 वर्षों में हिंदुत्व के कई बौद्धिक सामने आ गए हैं।वे अंग्रेज़ी में भी लिखने लगे हैं, जिस भाषा ने उनके मुताबिक़ भारत को मानसिक दासता में डाला।इनकी किताबों की सरकारी ख़रीद भी होती है, वे सम्मानित भी होते हैं।किताब लिखने के कारण वे बौद्धिक गिने भी जाते हैं।
पीड़ित लेखक ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि यह बर्ताव सिर्फ़ उनकी किताब के साथ नहीं किया जाना चाहिए बल्कि किसी भी किताब के साथ नहीं किया जाना चाहिए। क्या बाबर पर उनकी जैसी किताबें लिखी जाएँ और बिकें और जो उनसे भिन्न मत रखती हों, उन्हें जला दिया जाए? लेखक क्या बौद्धिक विचार विमर्श के पक्षधर हैं या उनका कहना है कि बाक़ी किताबों को फाड़ो या जलाओ, बस, अपने लोगों की किताब की पूजा करो?
वक़्त-बेवक़्त से और खबरें
बाबरवाली किताब के दुखी और क्षुब्ध लेखक का कष्ट यह है कि उनकी किताब बाबर का पर्दाफाश करने के लिए लिखी गई है लेकिन उसके महत्त्व को नहीं समझा जा रहा।लेकिन उन्हें मालूम होना चाहिए व्यक्तियों का इतिहास उनके गुणगान के लिए नहीं लिखा जाता, न उन्हें ध्वस्त करने के लिए। किताब उस व्यक्ति के महत्त्व के कारण, उसमें दिलचस्पी की वजह से लिखी जाती है। उसमें उसे, उसके समय और निर्णयों को समझने का प्रयास किया जाता है। बाक़ी जो कुछ है,वह विरुदावली है या घृणा अभियान! शक्ल उसकी भले किताब की हो!