ब्रह्मकोप के सबसे नए शिकार हैं राजकुमार भाटी। ब्रह्मकोप यानी ब्राह्मणों का कोप। मेरे संस्कृतज्ञ मित्र ने बतलाया कि ये उपनिषद वाले ब्रह्मा नहीं हैं। एक बरहम बाबा हुआ करते हैं, हमारे गाँवों में जिन्हें पूजा जाता है। ब्रह्मकोप में वे भी नहीं हैं। संभवतः दुर्वासा या परशुराम के काल-प्रसिद्ध कोप से इस शब्द का संबंध है। हम फिर इसकी चर्चा करने लगे कि ये जो ब्रह्मांड-प्रसिद्ध ब्राह्मण देवता हैं,वे इतने क्रोधी क्यों हुआ करते हैं। गौतम, शृंगी की बात तो जाने दीजिए, नरम मिज़ाज वशिष्ठ भी शाप दे डालते हैं।
ब्राह्मण श्रेष्ठता का दावा करता है अपनी विद्या और बुद्धि के बल पर।विद्या विनय देती है और बुद्धि धीरज और संयम सिखलाती है। लेकिन हमारी कथाओं के श्रेष्ठतम ब्राह्मण बात बात में तुनक जाते हैं। उनका सबसे बड़ा बल उनकी बुद्धि नहीं है, शाप देने की उनकी ताक़त है। जितना उनका आदर नहीं, उतना उनका भय है। इसका कोई सबूत नहीं मिलता कि वशिष्ठ या परशुराम या गौतम की बुद्धि से दुनिया का क्या भला हुआ लेकिन हमें यह ज़रूर मालूम है कि इनके शाप ने क्या किया।सारे ब्राह्मण देवता अपने शाप के लिए कुख्यात हैं।
राजकुमार भाटी अकेले होते तो शायद ब्राह्मणों के कोप का सामना अपनी बुद्धि के बल पर कर लेते। संकट यह है कि वे समाजवादी पार्टी के मुख्य प्रवक्ताओं में एक हैं। और समाजवादी पार्टी को अभी तुरत उत्तर प्रदेश की विधान सभा का चुनाव लड़ना है।इस परिस्थिति में उनकी पार्टी प्रदेश के ब्राह्मणों को नाराज़ करने का ख़तरा मोल नहीं ले सकती। ब्राह्मण भी एक वोट बैंक हैं।इस वोट बैंक को अपनी तरफ़ करने की कोशिश दलितों की कही जाने वाली पार्टी या मायावती जी भी कर रही हैं। कांग्रेस को भी सलाह दी जा रही है कि वह ब्राह्मणों को अपनी तरफ़ करने की जुगत करे। सपा कैसे उन्हें ख़ुद से अलग कर सकती है? ख़ासकर तब जब ऐसा सुना जा रहा है कि ब्राह्मण मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की सरकार से ख़फा हैं क्योंकि यह ब्राह्मण विरोधी सरकार है।
शायद इसी वजह से समाजवादी पार्टी की सहयोगी कांग्रेस पार्टी के नेता अजय राय ने सपा से माँग की है कि वह भाटी साहब को पार्टी से निकाल बाहर करे। वे सोच रहे हैं कि ऐसा करके वे ब्राह्मणों को फुसला सकेंगे।लेकिन वे भूल रहे हैं कि ज़माने बाद ब्राह्मणों को अपनी वैचारिक पार्टी मिल गई है: भाजपा।वह उनको कितना ही अपमानित करे, लेकिन वे उसका साथ नहीं छोड़ेंगे। यह कलियुग है, सो उनके शाप की मारक शक्ति भी जाती रही है।
उत्तर प्रदेश में लगता है परशुराम का बदला लिया जा रहा है। 21 बार पृथ्वी को क्षत्रियों से ख़ाली किया गया।2017 के बाद उत्तर प्रदेश में  एक क्षत्रिय संत के हाथ सत्ता आने के बाद से उस पौराणिक अन्याय का प्रतिशोध ब्राह्मणों से लिया जा रहा है। आज कम से कम उत्तर प्रदेश में ब्रह्मकोप का भय इस क्षत्रिय राजा को नहीं है। संभवतः इसलिए कि उन्हें मालूम है कि ब्राह्मण की सत्ता राजसत्ता से नाभिनालबद्ध है: जो सत्ता को वैधता देते हैं और उसी से वैधता हासिल करते हैं।
भाटी साहब पर ब्राह्मण क्यों कुपित हैं? पिछले दिनों दिल्ली में एक किताब पर चर्चा के दौरान उनकी एक टिप्पणी को बहाना बना कर उनपर हमला किया जा रहा है। किताब  हमारे समाज में लोकोक्तियों और मुहावरों में जातिवादी और सांप्रदायिक तत्वों पर आधारित है। हम सब जानते हैं कि हर भाषा में ऐसी कहावतें और मुहावरे हैं जिनमें जातिवादी वैमनस्य,पूर्वग्रह भरे हुए हैं। हम बड़े होते हैं उनको सुनते और बोलते हुए और इस तरह हमारे अवचेतन का निर्माण होता है। जाति और धर्म ही नहीं, जेंडर, रंग, प्रदेश, आदि सबके बारे में उपहास, व्यंग्य या अपमान इन मुहावरों में मिलेगा। मुहावरों और कहावतों का क्यों, गालियों का अध्ययन कीजिए तो हमारे भाषाई स्वभाव में धँसे हुए नारी विरोध या जातिवाद का सबूत बार-बार मिलेगा।
भाटी साहब ने कहा कि ऐसा नहीं है कि हमारी भाषाओं में मात्र दलित और पिछड़ी जातियों से संबंधित कहावतें और मुहावरे हैं। तथाकथित उच्च जातियों को लेकर भी ढेर सारी कहावतें और मुहावरे हैं। उन्होंने कहा कि वे खुद उनमें से किसी को उद्धृत करना पसंद नहीं करते लेकिन यह बतलाने के लिए कि ‘उच्च जातियाँ’ मुहावरों में हैं और वह भी अपमानजनक अवस्था में, उन्होंने उनमें से एक को उद्धृत किया।

भारतीय जनता पार्टी ने पिछले 12 साल में हिंदू समाज को सिखला दिया है कि वह मिथ्या क्रोध कैसे पैदा करे। एक पूरा उद्योग है जो ऑडियो, वीडियो देखता रहता है और उनमें से वैसे हिस्से काटकर निकालता है जिससे समाज के किसी न किसी हिस्से में क्रोध पैदा किया जा सके।

एक पूरे वाक्य को काटकर एक हिस्सा निकालना और फिर उसे चारों तरफ़ प्रसारित करना, यह आम बात है। भाटी साहब के भाषण से मात्र उस हिस्से को काटकर निकाला गया जिसमें ब्राह्मणों से संबंधित कहावत उद्धृत करते वे दिखलाई पड़ रहे हैं। उसके आगे-पीछे के हिस्से ग़ायब हैं। ठीक पहले का वह वाक्यांश ग़ायब है जिसमें वे इस तरह की कहावत के प्रति अपनी अरुचि ज़ाहिर कर रहे हैं।
पूरा भाषण सुनने का धीरज किसी में नहीं, न उस विषय में रुचि है। क्रुद्ध होने को तैयार समाज बैठा है। विशेषकर ‘उच्च जाति’ का समाज जिसे लगता रहा है कि उसके अधिकार नाजायज़ तरीक़े से छीनकर तथाकथित निचली जातियों को दे दिए गए हैं।भाटी साहब के भाषण के इस कटे हुए हिस्से से उसकी क्रोधाग्नि को भड़काया गया। सबके सब भाटी साहब पर टूट पड़े। भाजपा सबसे पहले खड्ग लेकर मैदान में कूदी। इससे मालूम हुआ कि उनका भाषण देख कौन रहा था कि उसमें से अपने लिए सुविधाजनक प्रसंग कैसे निकाले। ब्राह्मण का ‘अपमान’ महँगा है, यह कांग्रेस नेता अजय राय के  क्रोध से भी मालूम होता है।इसलिए उन्होंने भी जहाँ अपमान नहीं है, वहाँ उसे खोज लिया और भाटी साहब को दंडित करने की माँग करने लगे।
तो भाटी साहब ने जो नहीं कहा, उसके लिए भी उन्हें माफ़ी माँगनी पड़ी। ब्राह्मण समुदाय का गुणगान करना पड़ा। कहना पड़ा कि वे हर जाति का सम्मान करते हैं और ब्राह्मणों में बड़े विद्वान, बुद्धिजीवी हो चुके हैं, वे कैसे उनका अपमान कर सकते हैं।
इस घटना से एक बार फिर मालूम होता है कि भाजपा ने पूरा वातावरण कितना विषाक्त बना दिया है।पिछले 12, 13 सालों में कई ऐसी घटनाएँ हो चुकी हैं जिनमें सार्वजनिक वक्तव्यों में से एक अंश निकालकर बिना संदर्भ के प्रसारित किया जाता है और समाज के किसी न किसी तबके  में, ख़ासकर हिंदुओं और ‘राष्ट्रवादियों’ में वक्ता के ख़िलाफ़ क्रोध भड़काया जाता है।कई लोगों पर इस आधार पर मुक़दमा चलाया गया है और कुछ जेल में भी हैं। हम ऐसे अध्यापकों के बारे में भी जानते हैं जिनके कक्षा के व्याख्यान के एक हिस्से के आधार पर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की गई है। राजकुमार भाटी ऐसे ही एक षड्यंत्र के सबसे ताज़ा शिकार बनाए गए हैं।
इस प्रकार के अभियान प्रायः हिंदुत्ववादी, ख़ुद को उच्च जाति या ‘जेनरल केटेगरी’ कहनेवाले चलाते हैं।इसके निशाने पर प्रायः उदार, प्रगतिशील बुद्धिजीवी और राजनेता होते हैं।लेकिन बेचारे दक्षिणपंथी भी कभी कभी अपने ही लोगों के शिकार हो जाते हैं। अभी हाल में एक दंक्षिणपंथी लेखक पर हिंदुत्ववादियों ने हमला कर दिया क्योंकि उन्होंने बाबर पर किताब लिखी थी। उसी तरह दिल्ली विश्वविद्यालय के एक अध्यापक पर इसलिए पुलिस रिपोर्ट कर दी गई कि उन्होंने वेंडी डोनिगर को उद्धृत किया था। वे बेचारे डोनिगर के उस उद्धरण के सहारे बताने की कोशिश कर रहे थे कि वे कितनी ग़लत हैं।लेकिन उन्हें शाबाशी की जगह एफ़ आई आर मिली!
राजकुमार भाटी के वक्तव्य को पूरा सुना जाएगा, इसमें संदेह है। क्योंकि पूरा वक्तव्य सुनने से क्रोध का आधार लुप्त हो जाएगा। अगर निरंतर उत्तेजना और क्षोभ का वातावरण बनाकर न रखा जाए तो हिंदुत्व का आधार भी कमजोर होने लगेगा।