बिहार की भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के लोकप्रिय नेता कामरेड चंद्रशेखर के जयंती समारोह के समापन समारोह में भाग लेने का मौक़ा मिला। कार्यक्रम के शुरू होने के इंतज़ार के क्रम में एक एक करके पार्टी के पुराने सदस्यों को धीरे धीरे सभा स्थल पर आते देखता रहा। उनकी शारीरिक अशक्तता ज़ाहिर थी। आहिस्ता, लड़खड़ाते कदमों से आते इन लोगों को देख मिले जुले ख़याल आए। क्या अब पार्टी का आधार यही रह गया है? लेकिन इस तरह सोचने में इन सबके प्रति नाइंसाफ़ी भी है। क्या यह मार्के की बात नहीं कि इस उम्र में, इतनी तकलीफ़ उठाकर दोपहर के वक्त ये अपने के पुराने नेता को याद करने आए  हैं? सिर्फ़ उस नेता को ही नहीं जिसे गुजरे अरसा हो गया है। बल्कि उन विचारों को भी ताज़ा करने जिन्होंने इन सबको उस नेता की तरह ही अपनी तरफ़ खींचा। 
अब भाकपा से किसी भी तरह के फ़ायदे की कोई उम्मीद नहीं रह गई है। वह राजनीतिक रूप से बहुत कमजोर भी हो गई है। फिर भी ये लोग कुछ अपने पुराने लगाव के कारण,और कुछ उस विचार में यक़ीन के कारण जिसकी वजह से ये पार्टी में शामिल हुए होंगे, आज की सभा में तकलीफ़ उठाते हुए भी पहुँचे थे। इनकी ढलती उम्र इनके ख़िलाफ़ न जानी चाहिए। यह सवाल दीगर है और पार्टी के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण कि क्यों नई उम्र के लोग पार्टी में शामिल नहीं हो रहे। आख़िर ये सब, जिनकी बात मैं कर रहा हूँ, अपनी जवानी में ही पार्टी की तरफ़ आए होंगे। पार्टी ने अब युवाओं के लिए वह आकर्षण क्यों और कैसे खो दिया? लेकिन जैसा मैं कहने की कोशिश कर रहा हूँ, यह सवाल अपनी जगह दुरुस्त होते हुए भी इन बुजुर्गों को अप्रासंगिक नहीं बना देता।
कार्यक्रम की शुरुआत इसी पीढ़ी के नेता शत्रुघ्न प्रसाद सिंह ने की। वे बिहार में स्कूली अध्यापकों के बड़े नेता रहे हैं और उनकी सेवा शर्तों को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने कई आंदोलनों का नेतृत्व किया है।अब उनकी उम्र हो चुकी है और सेहत साथ नहीं देती। फिर भी वक्त के पहले वे सभा में मौजूद थे।खाँसी के दौरे के बीच बोलते हुए उन्होंने नई और पुरानी कई किताबों और  लेखों का ज़िक्र किया। मैं उनकी याददाश्त और किताबों के प्रति उनकी दिलचस्पी पर हैरान था। उन्हें बरसों पढ़े लेखकों के नाम और लेखों के शीर्षक तक याद थे। यह ख़ासियत आप कम्युनिस्ट आंदोलन की गुजरती पीढ़ी में देख सकते हैं। 
सभा का विषय था ‘भारत में जनतंत्र की यात्रा’। शत्रुघ्न बाबू ने 2015 के एक लेख का ज़िक्र करते हुए कहा कि उसमें वामपंथी पार्टियों से शिकायत की गई थी कि उन्होंने धर्म की बिलकुल उपेक्षा की जबकि वह भारत जैसे पारंपरिक समाज की रग-रग में समाया हुआ है। इसका नतीजा हुआ कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी को खुला मैदान मिल गया। उन्होंने धर्म का विकृत ढंग से राजनीतिक इस्तेमाल किया। उदार और वामपंथी राजनीतिक दलों की धर्म के प्रति इस उदासीनता का नतीजा ही उग्र संप्रदायवाद है। शत्रुघ्न बाबू इस विषय पर कुछ लंबी चर्चा चाहते थे।
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धर्मनिरपेक्ष दलों द्वारा धर्म की उपेक्षा की यह  शिकायत किसी एक की नहीं है। और नई भी नहीं। अभी दो साल पहले की घटना याद आई। मुक्तिबोध की पोलिश मित्र आग्नेष्का सोनी के अंतिम संस्कार के वक्त एक महिला बतला रही थीं कि किस तरह उनकी कॉलोनी में जय श्रीराम के नारे लगाते हुए फेरियाँ होने लगी हैं जो ख़ासी आक्रामक हैं। यह सुनकर एक मित्र ने अफ़सोस के साथ कहा कि यह इसलिए हो रहा है कि हमने  यह सब कुछ ‘उनके’ लिए छोड़ दिया है। उनके यानी,आर एस एस! शायद  इसीलिए शत्रुघ्न बाबू जैसे तजुर्बेकार नेता को भी अपने ऊपर शक होने लगा है कि कहीं उन जैसे लोगों के कारण ही तो देश में सांप्रदायिकता को पैर पसारने का मौक़ा तो नहीं मिल गया!
इत्तफ़ाक़ ही था कि जिस मध्य विद्यालय के प्रांगण में यह सभा हो रही थी, वहाँ मंच के ठीक सामने और श्रोताओं के पीछे एक मंदिर था। फ़रवरी की दोपहर तीखी होती धूप में इस समस्या पर विचार करना इतना आसान नहीं था। क्या सचमुच भाजपा के अलावा दूसरे दलों की धर्म-निरपेक्षता ही भाजपा के उभार का कारण है? क्या यह सच है कि एकमात्र भाजपा ने धर्म में दिलचस्पी दिखलाई और इस वजह से जनता उसकी तरफ़ झुकी? इस प्रश्न पर विचार करने का सही तरीक़ा यह है कि हम पूछें कि क्या भाजपा की रुचि धर्म में है या एक पहचान के निर्माण में जिसके आधार पर सबसे आसानी से बहुमत का गठन किया जा सकता है?
जनतंत्र में कोई भी राजनीतिक दल धर्म के साथ कैसे रिश्ता बनाएगा?  जिन देशों में एक ही धर्म हो, वहाँ की बात रहने दें, भारत जैसे बहुधार्मिक देश में एक धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल किस धर्म के साथ अपना रिश्ता बनाए और कैसे? जब यह अफ़सोस किया जाता है कि ऐसा न करके हमने मैदान भाजपा के लिए ख़ाली छोड़ दिया तो इसका मतलब यही है कि वह हिंदू धर्म है जिसके साथ राजनीतिक दलों को कुछ करना चाहिए। उदाहरण गाँधी का दिया जाता है। गाँधी के प्रयोग भी हिंदू धर्म के साथ ही थे। किसी और एक साथ हो भी नहीं सकते थे। उन्होंने अवश्य सर्व धर्म प्रार्थना को अपनी राजनीतिक गोलबंदी का एक अनिवार्य हिस्सा बनाया: एक ऐसी जगह जहां सारे धर्मों के लोग साथ बैठ सकें। इस तरह वे एक भारतीय जन की सामूहिकता का निर्माण करने का प्रयास कर रहे थे। इस्लाम और ईसाइयत से उन्होंने कुछ तत्व ग्रहण किए लेकिन वे सारे धर्मों के साथ बराबरी से संवाद करने की स्थिति में नहीं थे। वह उनका काम भी न था।

गाँधी की रुचि धर्म में उतनी नहीं जितना नीति में थी। लोग सार्वजनिक तौर पर कैसे आचरण करें? उनकी सामाजिकता किस प्रकार की हो?  गाँधी धर्मशास्त्रीय प्रश्नों से उलझे लेकिन उन्हें इसका पूरा अहसास था कि उनकी भाषा आख़िरकार एक हिंदू की भाषा है। वे प्रायः एक हिंदू की तरह ही जनता को संबोधित करते रहे। इसका अध्ययन करने  की ज़रूरत है कि क्या उनकी राजनीति की धार्मिक शब्दावली के कारण ग़ैर हिंदुओं में उनके राजनीति की अपील पर क्या असर पड़ा रहा था?

बहरहाल! प्रश्न यह है कि धर्म और राजनीति या राज्य का कौन सा रिश्ता सबसे सहज और उचित भी होगा? भारतीय राज्य ने तय किया कि भारत में सारी धार्मिक अभिव्यक्तियों की बराबर की जगह होगी। सारे धर्मों के लोगों का भारत पर एक सा अधिकार होगा। भारत की यह कल्पना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को स्वीकार न थी।उसके मुताबिक़ भारत पहले हिंदुओं का है और बाक़ी धर्मों के लोग यहाँ सीमित राजनीतिक और सांस्कृतिक अधिकारों के साथ रह सकते हैं। 
इस समझ का धर्म से कोई लेना देना नहीं था। एक आबादी या सामूहिक पहचान बनाने के लिए धर्म को एक आधार बनाने की कोशिश आर एस एस करता रहा। इसमें यह भी शामिल था कि हिंदू आबादी का हित हर मामले में ग़ैर मुसलमान आबादी से भिन्न है और दोनों में साझेदारी संभव नहीं है। या धार्मिक प्रश्न न था। यह पूरी तरह से सांसारिक मसला था। राज्य के स्वरूप, राज्य और उसमें रहनेवाले लोगों का उससे रिश्ता: यह आध्यात्मिक नहीं, राजनीतिक मसला है।
भारत के पहले प्रधानमंत्री इस मामले में निर्द्वंद्व थे। धार्मिक अभिव्यक्ति के बारे में राज्य कोई निर्णय नहीं लेगा। बल्कि वह इसमें धार्मिक समुदाय की मदद करेगा। अपने शासनकाल में इलाहाबाद के कुंभ में नेहरू ने खुद भाग लिया क्योंकि उनके देश की जनता का बड़ा हिस्सा इसमें शामिल हो रहा था। लेकिन कुंभ भारत का राजकीय पर्व नहीं हो सकता था। कांग्रेस पार्टी के नेताओं को अपनी धार्मिक पहचान ज़ाहिर करने पर कोई पाबंदी न थी। हाँ! नेहरू धर्म के माध्यम से अपने लिए जनमत के गठन  के पक्ष में न थे।
क्या नेहरू के दौर में क् कभी किसी को अपने धर्म के पालन या उसके सार्वजनिक अभ्यास में  कभी कोई बाधा आई? क्या उनकी सरकार ने इस मामले में कभी जनता के किसी हिस्से को नियंत्रित करने का प्रयास किया? क्या एक राजनेता और एक प्रशासक के रूप में उन्होंने नास्तिकता का किसी भी प्रकार प्रचार करने की कोशिश की? क्या उस दौर की स्कूली पाठ्यपुस्तकें नास्तिकता का प्रचार करती हैं? नेहरू युग में राज्य धर्म के प्रति उदासीन भी न था। वह जनता के अलग-अलग हिस्सों की अपनी धार्मिक अभिव्यक्ति को सुगम और सुचारु बनाने के लिए राजकीय संसाधनों का उपयोग भी करता रहा। हाँ! धर्म को जनतांत्रिक गोलबंदी की अपील बनाने के ख़तरे से नेहरू वाक़िफ़ थे। इसमें अनिवार्य रूप से संकीर्णता और आबादियों के बीच अलगाव की आशंका थी। कांग्रेस के बाक़ी नेता नेहरू से पूरी तरह सहमत न थे। इसलिए न तो पटेल और न गोविंद वल्लभ पंत या  रवि शंकर शुक्ला को आर एस एस से वैसा परहेज़ रहा, जैसा नेहरू को था।नेहरू की यह आशंका ग़लत न थी, यह आज साबित हो गया है।

आर एस एस की हिंदू धर्म में रुचि नहीं है। उसके पास वे बौद्धिक साधन भी नहीं कि वह धर्मशास्त्रीय प्रश्नों की मीमांसा करे। वह एक हिंदू का निर्माण कर रहा है जो अपने साथ ‘ऐतिहासिक’ अन्याय का बदला लेने को प्रशिक्षित किया जाता है। वह बदला मुसलमानों और ईसाइयों से लेना है।

उन्हें परास्त करके भारत पर अपने लिए पूरा क़ब्ज़ा करना है: यह आर एस एस के हिंदू संगठन का उद्देश्य है। आर एस एस के किसी नेता ने इसीलिए गाँधी या विनोबा की तरह गीता की  मीमांसा नहीं की। उसके नेताओं ने राष्ट्रवाद को परिभाषित किया। राष्ट्रवाद की इस परिभाषा के अनुसार भारत पर पहला अधिकार हिंदुओं का होगा और अन्य धर्मावलंबी दोयम दर्जे के नागरिक होंगे। इस परिभाषा का धर्म से क्या लेना देना है?
हमें यह स्वीकार करना होगा कि आर एस एस अपने मिशन में बड़ी हद तक कामयाब हो गया है।लेकिन इसका कारण दूसरे राजनीतिक समूहों के धर्म के प्रति उदासीनता नहीं है। उसका कारण यह है कि उनमें से प्रायः सबको आर एस एस की इस परिभाषा से बहुत दिक़्क़त न थी। इसीलिए गांधी की हत्या के तुरत बाद ही राममनोहर लोहिया जैसे ‘क्रांतिकारी गांधीवादी’ आर एस एस और जनसंघ के साथ मिलकर अपने लिए बहुमत का निर्माण करने लगे। बहुमत के निर्माण के लिए आर एस एस या जनसंघ के साथ जाने में वामपंथी दलों को भी बुनियादी उज्र न था, यह पिछली सदी के साठवाले दशक में जनसंघ के साथ मिलकर सरकार चलाने के उनके निर्णय से ज़ाहिर हुआ। फिर जयप्रकाश नारायण और उनके साथ कांग्रेस विरोधी दलों ने जिस उत्साह के साथ आर एस एस को साथ लिया उससे भी आर एस एस की जनतांत्रिक बहुमत की परिभाषा को स्वीकृति मिली।
हिंदू बहुमत बनाने का सबसे आक्रामक अभियान रामजन्म भूमि आंदोलन था। आर एस एस जो ज़मीन 60 साल से तैयार कर रहा था, उसने इस अभियान की सफलता की गारंटी की। इस आंदोलन में शामिल होने के पीछे धार्मिक कारण न था, वह आख़िरकार ज़मीन पर क़ब्ज़े की हिंसक इच्छा थी जिसने हिंदुओं की बड़ी आबादी को उत्तेजित किया। बाबरी मस्जिद की ज़मीन हमारी थी, उसे मुसलमानों से वापस छीनना है: यह कोई धार्मिक प्रेरणा न थी।  देश की ज़मीन और संसाधनों पर क़ब्ज़े या अधिकार का एक सिद्धांत हिंदू राष्ट्रवाद या नाज़ीवाद है। इसमें किसी भी तरह की कोई धार्मिकता नहीं है।
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हाँ! इस अभियान के संगठन के लिए एक नारा, एक प्रतीक चाहिए था। वह नारा ‘जय श्रीराम’ था और वह प्रतीक तीर धनुषधारी आक्रामक राम की छवि। इसमें कुछ भी धार्मिक न था।
शत्रुघ्न बाबू जैसे लोग, जो जनता को उसके अधिकारों के लिए संघर्ष के आधार पर संगठित करने की राजनीति करते रहे, जीवन की सांध्य वेला में अपने  प्रयासों को विफल होते देखकर सोच रहे हैं कि उनसे चूक कहाँ हुई। वह चूक निश्चय ही यह न थी कि उन्होंने धर्म पर विचार नहीं किया। शायद यह कहा जा सकता है कि उनकी पार्टी या अन्य राजनीतिक पार्टियों ने धर्म के आधार पर गोलबंदी की राजनीति के ख़तरे को ठीक-ठीक नहीं समझा।