एक पांच वर्षीय बच्ची द्वारा मुख्यमंत्री को खिलौना बुलडोजर भेंट करने का वायरल वीडियो परेशान करने वाला है। खास तौर पर जब दुर्गा को सर्वोच्च शक्ति का प्रतीक निराला की कविता में दर्शाया गया है। प्रसिद्ध विचारक और स्तंभकार अपूर्वानंद के चुभते सवालः
यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को बुलडोजर भेंट करती बच्ची
मैं ‘निराला’ की कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ पर एक सहकर्मी की जिज्ञासा के समाधान की कोशिश कर रहा था। प्रश्न कविता का अंतिम अंश से संबंधित था, जिसमें दुर्गा राम की आराधना से प्रसन्न होकर अपने सम्पूर्ण रूप में प्रकट होती हैं।दुर्गा के इस रूप का जो वर्णन निराला ने किया है, हम उसे समझने का प्रयास कर रहे थे।दुर्गा के इस संपूर्ण रूप में उनके ‘मस्तक पर शंकर’ होने का क्या मतलब हो सकता है?
दुर्गा, भगवती हैं और इस कविता में वे शक्ति हैं।इस अंश के पहले राम रावण के विरुद्ध युद्ध छोड़ देने की सोच रहे हैं क्योंकि उन्होंने देखा कि शक्ति ने अन्याय का साथ देना तय किया है।रावण को अपनी गोद में लिए हुए शक्ति की छवि ने राम को जड़ कर दिया है। बुजुर्ग जाम्बवान राम की घबराहट देखते हैं और उन्हें रणक्षेत्र से हटकर शक्ति की मौलिक कल्पना के लिए साधना करने की सलाह देते हैं।उनकी राय मानकर राम तपस्या करते हैं। इस तप में उन्हें 108 कमल दुर्गा के चरणों में अर्पित करने हैं।दुर्गा उनके साथ खेल करती हैं या उनकी परीक्षा लेती हैं।अर्पण के लिए जो आख़िरी कमल बचा है, उसे दुर्गा उठा ले जाती हैं।
राम यह सोचकर हताश हो उठते हैं कि उनकी पूजा अपूर्ण रह जाएगी।लेकिन फिर उन्हें याद आता है कि उनकी माँ उन्हें दुलार में राजीवनयन कहकर पुकारती थीं। तो कमल जैसे नयनों को ही क्यों न कमल की जगह अर्पित किया जाए? वे अपनी आँख निकालने को बाण का संधान करते हैं। अपनी साधना के प्रति राम की दृढ़ता से प्रभावित दुर्गा प्रकट होती हैं। वे आदिशक्ति हैं, महाशक्ति हैं। राम को जय का आश्वासन देकर वे राम के शरीर में समा जाती हैं।
कविता के इस अंश को लेकर निराला के अध्येताओं में मतभिन्नता रही है। राम तपस्या करने बैठे थे जाम्बवान की इस चुनौती का उत्तर देने कि उन्हें शक्ति की मौलिक कल्पना करनी है। तो क्या अंत में राम के सामने जो शक्ति प्रकट हुईं,वे राम की अपनी मौलिक कल्पना की सृष्टि थीं?
हम दोनों हिंदी के अध्यापक इस समस्या पर सर खपा रहे थे। कोई उत्तर न मिलता देख पटना के अपने मित्र और निराला के विशेषज्ञ तरुण कुमार को फ़ोन मिलाया। फ़ोन व्यस्त था। ध्यान एक्स( ट्विटर) को तरफ़ चला गया। एक वीडियो पर आँख टिक गई। प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया द्वारा जारी वीडियो था। सो, खबर प्रामणिक ही होगी, किसी की इच्छापूर्ति के लिए काल्पनिक या कृत्रिम मेधा की सृष्टि न होगी, यह मानकर उसे देखने लगा।एक नन्हीं-सी बच्ची का इंटरव्यू चल रहा था। उसके पीछे उसकी माँ रही होंगी। एकाध वयस्क भी:परिवार के बड़े। खबर गोरखपुर की थी।बच्ची की मुलाक़ात सुबह की सैर पर निकले राज्य के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ से हुई थी। उसी का वर्णन ख़बर में था।
5 बरस बच्ची के हाथ में एक खिलौना बुलडोज़र था। वीडियो में वह इस खिलौने को मुख्यमंत्री को भेंट करती दीखती है। इस भेंट से प्रफुल्लित मुख्यमंत्री उसे उसका उपहार वापस लौटाते हैं। पहले मुस्कुराते हुए उसके हाथ से इस भेंट को स्वीकार करते हैं, फिर उसे बुलडोज़र वापस करते हुए क़ायदे पोज़ देकर से फोटो खिंचवाते हैं। बच्ची पत्रकार को बतलाती है कि मुख्यमंत्री ने उसे खूब पढ़ने और बुलडोज़र से खेलने को कहा है।
बुलडोज़र से खेलने का क्या अर्थ है? बुलडोज़र से वे मुख्यमंत्री कैसे खेलते हैं? भारतीय जनता पार्टी के सारे मुख्यमंत्री बुलडोज़र से कैसे खेलते हैं? बुलडोज़र का असली मज़ा तब है जब सामने गिराने, तोड़ने-फोड़ने को कुछ हो।कुछ जिसे बुलडोज़र रौंद सके। आज के भारत में हम जानते हैं कि बुलडोज़र कौन चलाता है और वह किसका घर तोड़ता है? भारत में बुलडोज़र का जैसे धर्म तय हो गया है। वह उस हिंदू शक्ति का प्रतीक है जो मुसलमान को तबाह करती है।
गोरखपुर की उस सुबह यह सब कुछ अचानक न हुआ होगा। बच्ची और उसके परिजन सजे धजे दिखलाई पड़ रहे हैं। इससे ज़ाहिर होता है कि यह अचानक हुई मुलाक़ात न रही होगी। इतनी सुबह कोई इतना बन ठन का सड़क पर नहीं निकलता। मुख्यमंत्री बच्ची के मामा या नाना नहीं, सो वह उन्हें पहचानती हो, ऐसा भी नहीं रहा होगा। क्या वह बच्ची अपने मुख्यमंत्री को इतना प्यार करती है कि सुबह-सुबह उनसे मिलने और उन्हें उपहार देने की ज़िद कर माँ को उनके पास ले आई होगी? और क्या उसी बच्ची ने सोचा होगा कि मुख्यमंत्री को उपहार दिया जाए और वह भी बुलडोज़र? क्या 5 बरस की बच्ची जानती भी है कि मुख्यमंत्री क्या बला है? क्या बड़े भी खिलौनों से खेलते हैं?
क्या यह सोचना ग़लत होगा कि यह सब कुछ दरअसल उसके माँ-बाप के दिमाग़ की उपज रही होगी या ख़ुद मुख्यमंत्री के प्रचार विभाग ने बच्ची से यह मुलाक़ात और उसके द्वारा मुख्यमंत्री को बुलडोज़र का उपहार देने का पूरा प्रकरण आयोजित किया होगा?
बच्ची के हाथ से मुख्यमंत्री को बुलडोज़र दिलवाने का क्या मतलब है? क्या वह बुलडोज़र-राज का समर्थन कर रही है? या वह सर्वोच न्यायालय के इस फ़ैसले का विरोध कर रही है जिसमें उसने बुलडोज़र-न्याय पर ब्रेक लगाया है?
जो भी हो, बच्ची के हाथ में बुलडोज़र देखकर बहुतों को झटका लगा। एक क्षुद्र राजनीतिक उद्देश्य के लिए बच्ची का उपयोग लोगों को खला। जिन्हें यह बुरा लगा उनमें बहुतेरे हिंदू थे।
मेरा ध्यान राम की शक्ति की मौलिक कल्पना की तपस्या पर गया। राम ने जो शक्ति प्राप्त की उसका रूप क्या था, इसपर हम बहस कर रहे थे।शक्ति के एक नए प्रतीक, नई कल्पना, बुलडोज़र ने उस बहस को ध्वस्त कर दिया। बुलडोज़र शक्ति का प्रतीक है।हिंदुत्ववादी राज्य में ग़ैर संवैधानिक, ग़ैर क़ानूनी उच्छृंखल शक्ति का प्रतीक! ख़ासकर मुसलमानों को दंडित करने के लिए इस्तेमाल की जानेवाली क्रूर शक्ति का प्रतीक। पिछले 11-12 वर्षों में ही बुलडोज़र हिंदुओं के एक बड़े हिस्से में ऐसी शक्ति के प्रत्येक के रूप में उभरा है जो मुसलमानों को तबाह करती है। शक्ति के इस प्रतीक को स्नेहोपहार के तौर एक बच्ची के हाथ में देखकर अपने देश के हिंदुओं की कल्पनाशीलता की कैसी तस्वीर उभरती है?
माँ-बाप अपने बच्चों को शक्ति की किस कल्पना की शिक्षा या दीक्षा दे रहे हैं? यह जो अभी बच्ची से करवाया जा रहा है, उसके कारण शक्ति की यही कल्पना उनके लिए स्वाभाविक हो उठे, क्या यह असंभव है? बच्चे मानने लगें कि बुलडोज़र से मुसलमानों के घर तोड़ना, ज़मींदोज़ कर देना बिलकुल स्वाभाविक है? वे ख़ुद ही इसकी माँग करने लगें?
बच्चों के दिमाग़ में शक्ति की यह नई कल्पना घर कर सकती है। पुणे की संस्था ‘लोकायत’ की एक मित्र ने बच्चों के साथ अपना एक अनुभव बतलाया। वे उन बच्चों के साथ काम करती रही हैं। एक रोज़ पिकनिक के बाद उनके साथ लौट रही थीं। ऑटोरिक्शा जब एक मस्जिद के सामने से गुजरा तो बच्चों ने एक साथ नारा लगाया ‘जय श्रीराम!’ वे चौंक गईं।
‘जय श्रीराम’ अपनी ताक़त का ऐलान है। वह राम के प्रति श्रद्धा निवेदन नहीं। यह नारा ख़ासकर मुसलमानों को डराने के लिए और हिंदुत्ववादी शक्ति के प्रभुत्व की उद्घोषणा के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस नारे का आविष्कार ‘राम जन्मभूमि आंदोलन के दशक में हुआ था। बाबरी मस्जिद के ध्वंस की स्मृति इस नारे में बसी हुई है। यह नारा एक ताक़त का प्रतीक है, लेकिन वह ताक़त दूसरों को तकलीफ़ देने से पैदा हुए उल्लास के साथ जुड़ी हुई है। ‘जय श्रीराम’ यह नारा हिंदू जितना ख़ुद लगाते हैं, उससे ज़्यादा यह ज़बर्दस्ती मुसलमानों से लगवाया जाता है। यह मुसलमानों के आगे, उनके ऊपर हिंदुओं की प्रभुता की स्थापना की घोषणा है।
हाल में देहरादून में एक अध्यापक से मुलाक़ात हुई।वे पक्षी-विशेषज्ञ हैं।बच्चों और बड़ों को भी चिड़ियों के बारे में जानकारी देते हैं। उनके रहन-सहन, एक महादेश से दूसरे महादेश तक बिना पासपोर्ट वीज़ा के उनके आवागमन, अपने मूल निवास से हज़ारों मिल दूर इलाक़ों में उनके प्रवास के बारे में उनसे बात करते हैं। वे देहरादून के एक स्कूल के बच्चों को वे आप्रवासी चिड़ियों के बारे में बतला रहे थे। ख़्याल आया कि उन्हें मालूम होना चाहिए कि इंसान भी इस मामले में चिड़ियों की तरह ही हैं। सो वे उन्हें वनगुज्जरों की बस्ती में ले गए। उनसे मिलाने के पहले कहा कि बच्चों को उनका अभिवादन करना चाहिए। बच्चों ने मिलते ही समवेत स्वर में कहा, ‘जय श्रीराम!’ मेरे मित्र अध्यापक हतप्रभ रह गए।
पुणे के बच्चे झुग्गियों में रहनेवाले थे। देहरादून के ये बच्चे भारत के सबसे धनी तबके के बच्चे थे। दोनों से पूछा जाए कि वे जो नारा लगा रहे हैं, क्या इसका अर्थ जानते हैं, तो वे शायद पूछनेवाले का मुँह ताकने लगें। उन्हें नहीं मालूम कि यह हिंदुत्ववादी शक्ति का वीभत्स प्रतीक या उद्घोष है।उनको नहीं पता कि यह मुसलमानों और ईसाइयों को आतंकित करने का भाषाई हथियार है।
अभिवादन में आश्वस्ति है।मित्रता का भरोसा है।क्या ‘जय श्रीराम’ यह भरोसा सबको देता है?
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बच्ची के हाथ में खिलौना बुलडोज़र क्या हिंदुओं में शक्ति की एक नई कल्पना के यथार्थ हो जाने की सूचना है? या वह प्रत्येक प्रकार की कल्पनाशीलता का अंत है? कल्पना का रिश्ता सृजन से है।बुलडोज़र ध्वंस का प्रतीक है। कौन सी वह शक्ति है जो राम के आराधकों के अवचेतन में समा गई है?
राम नवमी के दिन राम की शक्ति की आराधना पर विचार के बीच बच्ची के हाथ बुलडोज़र की छवि के प्रवेश का साहित्य के लिए क्या अर्थ होगा?