उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुधवार 22 अप्रैल को कोलकाता की चुनावी रैली में कहा-"आपने देखा ही होगा कि कोलकाता के मेयर कह रहे हैं कि यहां उर्दू का इस्तेमाल होगा। हम यहां यह कहने आए हैं कि बंगाली पहचान के साथ कोई खिलवाड़ नहीं कर सकता... बंगाल की पहचान काबा से नहीं, बल्कि मां कालीबाड़ी से जुड़ी है... बंगाल में गौहत्याएं बड़े पैमाने पर हो रही हैं। ममता दीदी भगवान राम के नाम से चिढ़ जाती हैं। दुर्गा पूजा के दौरान अनुमति नहीं दी जाती...।" 
कोलकाता की इसी रैली में योगी आदित्यनाथ ने कहा- "यहां जो अराजकता हम देख रहे हैं, वह 2017 से पहले उत्तर प्रदेश में व्याप्त अराजकता के समान है... आज यूपी में कोई अशांति नहीं है... हर जगह उत्सव का माहौल है... आज यूपी के लोग 'राम राज्य' के नए युग में जी रहे हैं... यूपी में एक ही आवाज है, एक ही नारा है: हम न तो गौहत्या होने देंगे और न ही हिंदुओं को विभाजित होने देंगे... यह भारत की विरासत के प्रति सम्मान की भावना है, और यह तभी संभव है जब भाजपा की दोहरी इंजन वाली सरकार हो।"
बंगाल में योगी आदित्यनाथ बीजेपी के स्टार प्रचारक हैं। उनका ऐसा भाषण पहला नहीं है। उन्होंने अब तक करीब 7 चुनावी रैलियों को संबोधित किया है। बंगाल की प्रमुख राजनीतिक पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने चुनाव आयोग में योगी के भाषणों की शिकायत भेजी है। उनके ये भाषण 17 अप्रैल से लेकर अब तक हर रैली में बार-बार दोहराए जा रहे हैं। इसी बीच गुरुवार 23 अप्रैल को पहले चरण के लिए मतदान होने जा रहा है।

बंगाल में चुनाव आचार संहिता लागू है

15 मार्च 2026 को चुनाव की तारीखें घोषित होते ही पश्चिम बंगाल में केंद्रीय चुनाव आयोग ने आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct - MCC) लागू कर दी। चुनाव आयोग का नियम स्पष्ट कहता है: किसी भी पार्टी या उम्मीदवार को जाति, समुदाय या धर्म के आधार पर तनाव बढ़ाने, नफरत फैलाने या साम्प्रदायिक भावनाओं को वोट के लिए भड़काने वाली गतिविधि/भाषण नहीं करने चाहिए। धार्मिक स्थलों (मंदिर, मस्जिद आदि) का प्रचार के लिए इस्तेमाल वर्जित है। यह चुनाव घोषणा के साथ लागू होता है और सभी पर बाध्यकारी है (पीएम, सीएम, मंत्री सहित)। इनके  उल्लंघन पर ईसीआई नोटिस, चेतावनी या सख्त कार्रवाई कर सकती है।


किसी भी नेता के साम्प्रदायिक भाषण पर नोटिस जारी हुआ?

22 अप्रैल तक उपलब्ध सूचना के मुताबिक पश्चिम बंगाल में अभी तक किसी भी पार्टी के नेता को कोई नोटिस जारी नहीं हुआ। योगी के “काबा” वाले बयान पर विपक्ष ने ईसीआई से कार्रवाई की मांग की है, लेकिन ईसीआई ने अभी कोई नोटिस या कार्रवाई नहीं की है। अन्य पार्टियों के नेताओं पर भी कोई रिपोर्टेड नोटिस नहीं मिला।

2024 के लोकसभा चुनाव में आयोग का रुख

2024 के लोकसभा (और कुछ विधानसभा) चुनावों में ECI की कार्रवाई क्या थी। जानना दिलचस्प होगा। चुनाव आयोग ने कुछ शिकायतें लीं और नोटिस जारी किए। जैसे पीएम मोदी के राजस्थान की रैलियों में दिए गए बयान, जैसे - मुसलमान आपके मंगलसूत्र छीन लेंगे, भैंस छीन लेंगे...आदि बयान पर बीजेपी अध्यक्ष को नोटिस दिया। लेकिन आयोग ने कोई कड़ी कार्रवाई नहीं की। यहां तक उसने पीएम मोदी के नाम से नामजद नोटिस भी नहीं दिया। Human Rights Watch और सिविल सोसाइटी ने कहा कि बीजेपी नेताओं के “हेट स्पीच” पर चुनाव आयोग नरम रहा। सुप्रीम कोर्ट ने भी आयोग को सख्ती से कार्रवाई का निर्देश देने वाली याचिका खारिज कर दी। कुल मिलाकर नोटिस तो दिए गए, लेकिन “उल्लेखनीय सजा” किसी में नहीं हुई। यहां तक कि आयोग चेतावनी तक नहीं दे सका।

बंगाल में क्या मुस्लिम मतदाता निशाने पर हैं 

द हिन्दू/हिंदुस्तान टाइम्स अखबार ने 9 अप्रैल 2026 को खबर दी कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के दौरान कुल 90 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। इनमें से 63 फीसदी हिन्दू और 34 फीसदी मुस्लिम हैं।  पश्चिम बंगाल में मुस्लिमों की आबादी राज्य में मात्र 27 फीसदी (2011 की जनगणना) होने के बावजूद उनके 34 फीसदी वोटरों को सूची से हटाया जाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राज्य के मुस्लिम मतदाता आमतौर पर सत्तारूढ़ टीएमसी के मतदाता माने जाते रहे हैं।
द गार्डियन ने 23 अप्रैल को इस मुद्दे पर टीएमसी सांसद सागरिका घोष की टिप्पणी प्रकाशित की है। सागरिका घोष ने कहा- “बंगाल में जो हुआ है, वह संवैधानिक अपराध है। यह भारत की जनता के खिलाफ, बंगाल की जनता के खिलाफ अपराध है।” सागरिका घोष ने कहा, “स्वतंत्रता के बाद के भारत के इतिहास में इसे एक बड़े घोटाले के रूप में याद किया जाएगा। एक व्यक्ति, एक वोट का अधिकार संविधान द्वारा भारतीय जनता को दिया गया एक महान अधिकार है। आप चाहे कितने भी गरीब हों, चाहे कितने भी असहाय हों, आपको वोट देने का अधिकार है। लेकिन यह अधिकार छीन लिया गया है।”

सबार इंस्टीट्यूट की रिसर्च

सबार इंस्टीट्यूट ने बंगाल में मुस्लिम वोटरों के नाम काटे जाने पर रिसर्च की है। गार्डियन ने उनसे बात की। सबार इंस्टीट्यूट के सबीर अहमद ने द गार्डियन को बताया कि “हमारी रिसर्च के अनुसार, धर्म सबसे बड़ा अंतर पैदा करने वाला कारक रहा है।” हम आंकड़ों के आधार पर मामलों की बारीकी से निगरानी और दस्तावेजीकरण कर रहे हैं। उसके मुताबिक “मुसलमान असमान रूप से प्रभावित हुए हैं।”

गार्डियन ने लिखा है- भाजपा अधिकांश भारतीय राज्यों पर अपना वर्चस्व स्थापित करने में सफल रही है, पश्चिम बंगाल में वह पैर जमाने में नाकाम रही है, जिसका एक कारण यह है कि उसे राज्य की बड़ी मुस्लिम आबादी का समर्थन प्राप्त नहीं है, जो उसके हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे से सावधान हैं। कुछ मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में, लगभग आधे मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं, जिनमें वे लोग भी शामिल हैं जिनके पास यह साबित करने वाले दस्तावेज हैं कि वे जन्म से भारतीय नागरिक हैं और या तो वे, या उनके माता-पिता, 2002 की मतदाता सूची में थे, जो मतदाता पात्रता की अंतिम तिथि है।
बंगाल में गुरुवार 23 अप्रैल को पहले चरण का मतदान है। 29 अप्रैल को दूसरे चरण का मतदान है। 4 मई को नतीजे आएंगे। बीजेपी के स्टार प्रचारक योगी आदित्यनाथ को किसी भी तरह का नोटिस दिया जाना चुनाव आयोग की मंशा को साफ कर रहा है। अगर चुनाव आयोग अब नोटिस देता है तो भी उसका जवाब समय पर नहीं आएगा और न समय पर कार्रवाई होगी।