पश्चिम बंगाल में पहले चरण में 23 अप्रैल को जिन 152 सीटों पर मतदान होने हैं वहां भाजपा की साख दांव पर है। बीते चुनाव में पार्टी को जिन 77 सीटों पर जीत मिली थी उनमें से 59 पर पहले दौर में ही मतदान होना है। वैसे, भी उत्तर बंगाल में पार्टी की स्थिति और चुनावी प्रदर्शन तृणमूल कांग्रेस के मुकाबले बेहतर रहा है। पहले दौर में खासकर उत्तर बंगाल की 54 सीटों के नतीजे ही सत्ता की दशा-दिशा तय करेंगे।
लेकिन बीते पांच साल तृणमूल कांग्रेस और खासकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इलाके में पार्टी के पैरों तले खिसकी जमीन को थामने और मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। तृणमूल कांग्रेस के सामने पिछली बार जीती 92 सीटें बचाने की चुनौती है।
पिछली बार बीजेपी को मिली 59 सीटों में से 26 पर हार-जीत का अंतर बहुत कम रहा था। इस बार अगर तीन-चार फीसदी वोट भी इधर-उधर हुए तो नतीजे बदल सकते हैं। भाजपा की तमाम उम्मीदें पहले चरण पर ही टिकी हैं। इसकी वजह यह है कि दूसरे चरण में जिन 142 सीटों पर मतदान होना है उसे तृणमूल कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है। इस दौर में जिन 142 सीटों पर मतदान होना है उनमें से वर्ष 2021 में भाजपा को महज 18 पर ही जीत हासिल हो सकी थी।
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वर्ष 2021 के चुनाव बाद की स्थिति का विश्लेषण करें तो दलबदल की वजह से अब बीजेपी के पास 77 में से 65 विधायक ही बचे हैं जबकि उस बार 215 सीटें जीतने वाली तृणमूल कांग्रेस के विधायकों की संख्या 223 तक पहुँच गई। तृणमूल इस बार 291 सीटों पर मैदान में हैं। दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र की तीन सीटें उसने अपने सहयोगी भारतीय गोरखा प्रजातंत्रिक मोर्चा के लिए छोड़ दी है।
पिछली बार हाथ मिला कर मैदान में उतरी कांग्रेस और वाममोर्चा इस बार अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे अधीर रंजन चौधरी कोई तीस साल विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमा रहे हैं। 

वाममोर्चा ने अपने घटक दलों के अलावा इंडियन सेक्युलर फ्रंट यानी आईएसएफ के साथ चुनावी तालमेल किया है। पिछली बार न तो वाममोर्चा का खाता खुला था और न ही कांग्रेस का।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पहले दौर में भाजपा के सामने उन 26 सीटों पर कब्जा बनाए रखने की कड़ी चुनौती है जहां उसकी जीत का अंतर पांच फीसदी से भी कम रहा था। इस दौर में महज एक सीट ऐसी है जहां पार्टी के प्रतिद्वंदी के मुकाबले 20 फीसदी ज्यादा वोट मिले थे।

पिछली बार 8 चरण में चुनाव

बंगाल में वर्ष 2021 में आठ चरणों में मतदान हुआ था। लेकिन चुनाव आयोग ने इस बार दो ही दिन मतदान का फ़ैसला किया है। हालाँकि उसने इसकी कोई तार्किक वजह नहीं बताई है। लेकिन दोनों चरणों को देखने पर साफ़ होता है कि पहले दौर में बीजेपी की मजबूती वाली सीटों पर मतदान होगा और दूसरे चरण में तृणमूल कांग्रेस की। दूसरे चरण में कोलकाता की भवानीपुर सीट सबसे प्रमुख सीट है। यहां विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को चुनौती दे रहे हैं। पिछले चुनाव में नंदीग्राम सीट पर उन्होंने ममता को हरा दिया था। बाद में भवानीपुर में हुए उपचुनाव में ममता जीती थी।
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उत्तर बंगाल के छह जिलों में विधानसभा की 54 सीटों पर पहले चरण में ही मतदान होना है। चाय बागानों वाला यह इलाका किसी दौर में वाममोर्चा का मजबूत गढ़ माना जाता था। लेकिन वर्ष 2011 में ममता ने इसमें सेंध लगाते हुए 28 सीटें जीत ली थीं। लेकिन 2016 में भाजपा भी इलाके में मजबूती से पैर जमाने लगी। उसने इलाके की सात सीटें जीती जबकि 2011 में उसका खाता नहीं खुला था। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में आठ में से सात सीटें जीत कर बीजेपी ने अपना दबदबा बनाए रखा था। वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में भी उसने इलाके में 30 सीटें जीती थी।

टीएमसी-बीजेपी में सीधा मुक़ाबला

यह कहना ज्यादा सही होगा कि वाममोर्चा और कांग्रेस के हाशिए पर पहुंचने के कारण उत्तर बंगाल में इस बार तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला होगा। तृणमूल कांग्रेस इस इलाके पर खास जोर दे रही है। इलाके की अहमियत इसी से समझी जा सकती है कि ममता ने अपना चुनाव अभियान उत्तर बंगाल से ही शुरू किया है।

इलाके में कई सीटों पर चाय बागान मजदूरों के वोट निर्णायक हैं। इसके अलावा कोच राजबंशी और कामतापुरी वोटर भी कम से कम 15 सीटों पर हार-जीत तय करने की स्थिति में हैं।
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जहां तक मुद्दों का सवाल है, चाय उद्योग और इसके मजदूरों की दुर्दशा और इलाके का विकास ही सबसे बड़ा मुद्दा है। ये मुद्दे यहां पारंपरिक रहे हैं और हर चुनाव में उभरते रहते हैं।

पहले दौर की सीटों के लिए सत्ता के दोनों दावेदारों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या तृणमूल कांग्रेस को अपने पैरो से खिसकी जमीन वापस पाने में कामयाबी मिलती है या फिर बीजेपी अपने इस मजबूत गढ़ को बचाने में कामयाब रहती है।