पश्चिम बंगाल के मतुआ बहुल इलाके में SIR के तहत मतदाता सूचियों से लाखों नाम हटाए जाने के बाद आक्रोश बढ़ता जा रहा है। भाजपा बोंगाँव, गाइघाटा और नादिया जैसे प्रमुख क्षेत्रों में नुकसान की भरपाई करने में जुटी है।
बंगाल के मतुआ बहुल इलाके में ममता बनर्जी का स्वागत
पश्चिम बंगाल में मतुआ समुदाय का गुस्सा भड़क उठा है। मतुआ समुदाय का कहना है कि चुनाव आयोग की विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision - SIR) प्रक्रिया के बाद मतदाता सूची से उनके लाखों नाम काट दिए गए। खासतौर पर नदिया और उत्तर 24 परगना जिलों के मतुआ प्रभावित इलाकों में यह गुस्सा साफ दिख रहा है। भाजपा ने वर्षों से मतुआ रिफ्यूजियों को भारतीय नागरिकता का वादा देकर अपना वोट बैंक मजबूत किया था, लेकिन अब यही इलाके पार्टी के लिए सबसे बड़ी कमजोरी बन गए हैं।
मतुआ समुदाय नामशूद्रों की एक दलित जाति है। जिसकी स्थापना 19वीं शताब्दी में बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी बंगाल) में हरिचंद ठाकुर ने की थी। लाखों मतुआ बांग्लादेश से उत्पीड़न से बचने और बेहतर जीवन की तलाश में भारत आए। बंगाल में वे दूसरी सबसे बड़ी अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय हैं। हर पार्टी भाजपा, कांग्रेस, सीपीएम और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस इनके भारतीय नागरिकता अधिकारों का वादा करके उन्हें लुभाने की कोशिश करती रही है।
अखिल भारतीय मतुआ महासंघ के महितोष बैद्य ने बताया, “लोगों में गुस्सा, भ्रम और निराशा है। उन्हें लगा था कि नागरिकता का सवाल सुलझ गया, लेकिन अब वे फिर पुराने वोटर स्लिप, आधार कार्ड, राशन कार्ड और स्कूल सर्टिफिकेट लेकर लाइन में खड़े हैं।”
भाजपा डैमेज कंट्रोल में जुटी
भाजपा के अंदरूनी सूत्रों ने टेलीग्राफ से बातचीत में स्वीकार किया कि मतुआ वोट कटने से पार्टी को बड़ा नुकसान होने जा रहा है। क्योंकि यह उनका कोर सोशल बेस है। 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की 77 सीटों में से आधी से ज्यादा मतुआ और रिफ्यूजी प्रभावित इलाकों से सीटों से आई थीं। मतुआ वोट पूरे नदिया, उत्तर 24 परगना और उत्तर बंगाल की करीब 55 विधानसभा सीटों में फैला हुआ है।
बोंगांव सांसद और केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर ने आश्वासन देते हुए कहा, “कोई भी हिंदू शरणार्थी कहीं नहीं जाएगा। किसी को बांग्लादेश नहीं धकेला जाएगा। हम सबकी मदद कर रहे हैं, अपील फाइल करवा रहे हैं। हर किसी को नागरिकता मिलेगी और मतदाता सूची में नाम बहाल हो जाएगा।”
भाजपा कार्यकर्ता अब मतुआ क्षेत्रों में फॉर्म-6 (नए मतदाता) और ऑनलाइन अपील फाइल कराने में मदद कर रहे हैं। फिर भी मतुआ समुदाय इस आश्वासन पर भरोसा करने को तैयार नहीं है। उसका कहना है कि यह वक्ती उपाय है यानी तुरंत में किया जा रहा उपाय है। हम किस तरह यकीन करें। इतने लंबे समय से वादे के बावजूद यह स्थिति सामने है।
टीएमसी की रणनीति
ममता बनर्जी सरकार इस गुस्से को अपने फायदे में बदलने की कोशिश कर रही है। तृणमूल कांग्रेस की मतुआ महासंघ की प्रमुख और राज्यसभा सांसद ममता बाला ठाकुर ने टेलीग्राफ से कहा, “मतुआ लोगों ने भाजपा को विश्वास दिलाया कि उन्हें नागरिकता मिल जाएगी। अब उनका वोटिंग अधिकार भी छीना जा रहा है। लोग डरे हुए हैं कि नाम सूची से गायब होने के बाद कल उन्हें विदेशी करार दिया जाएगा।” ममता बनर्जी ने भी कहा कि भाजपा को वोट देने वाले हिंदू शरणार्थी भी अब सुरक्षित नहीं हैं।
2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। मतुआ समुदाय दक्षिण बंगाल के कई चुनावी नतीजों को तय करने वाली ताकत रहा है। अब सवाल यह उठ रहा है कि वर्षों तक सीएए का वादा देकर लिया गया वोट आखिर क्या गारंटी दे पाया?
भाजपा ने पहले मतुआ रिफ्यूजियों को बताया था कि दस्तावेजों की चिंता न करें, सीएए सब संभाल लेगा। लेकिन अब वही परिवार पुराने दस्तावेज लेकर पहचान साबित करने की कतार में खड़े हैं। मतुआ क्षेत्रों में अब तक जारी नागरिकता प्रमाणपत्र अनुमानित एक करोड़ आवेदनों का महज एक प्रतिशत से भी कम हैं।
सबसे ज्यादा प्रभावित इलाके
एसआईआर में नाम कटने से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र हैं- बोंगांव, बागदा, गाइघाटा, स्वरूपनगर, रानाघाट और कृष्णनगर। इन इलाकों में भाजपा ने सीएए के तहत भारतीय नागरिकता का वादा देकर मजबूत सामाजिक आधार बनाया था। अब यहां राजनीतिक माहौल पूरी तरह बदल गया है।
उत्तर 24 परगना जिले में, जहां मतुआ समुदाय की सबसे ज्यादा आबादी है, मतदाता सूची से 12.3 लाख से ज्यादा नाम हटाए गए। बोंगांव सब-डिवीजन में सबसे भारी झटका लगा। बागदा में करीब 55,000, बोंगांव उत्तर और दक्षिण मिलाकर करीब 75,000, गाइघाटा में 39,000 और स्वरूपनगर में 18,000 नाम गायब हो गए। नदिया जिले में अधीनस्थ जांच (adjudication) के तहत रखे गए 78 प्रतिशत नाम काट दिए गए, जो पूरे राज्य में सबसे ज्यादा है। अनुसूचित जाति आरक्षित सीटों जैसे गाइघाटा और बागदा में 'अनमैप्ड' मतदाताओं की दर सबसे अधिक रही।
मतुआ भाजपा से टीएमसी में जा रहे हैं
गाइघाटा के अशोक मंडल ने कहा, “वर्षों तक नागरिकता का वादा लेकर भाजपा को वोट दिया, अब मेरा नाम मतदाता सूची से गायब हो गया है। अगर आज वोटिंग अधिकार छिन गया तो कल कौन गारंटी देगा कि मुझे यहां का नहीं बताया जाएगा?” बागदा के बोयरा गांव में करीब 50 मतुआ परिवारों ने नाम कटने के बाद भाजपा छोड़कर तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया। एक गांववासी ने कहा, “हमने भाजपा को इसलिए वोट दिया था कि वे इस समस्या का अंत कर देंगे। इसके बजाय हमारा वोटिंग अधिकार भी छिन गया।”
बहरहाल, इस समस्या का इलाज सुप्रीम कोर्ट के पास है। वहां इसके खिलाफ याचिकाएं दायर की गई हैं। हालांकि एसआईआर के बाद अंतिम मतदाता सूची जारी हो चुकी है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट चाहे तो नया आदेश पारित कर मतुआ बहुल इलाकों के मतदाताओं के नाम शामिल करने को कह सकता है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई जल्द हो सकती है।