पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में एक विवादास्पद सीट राजारहट न्यू टाउन (Rajarhat New Town) का नतीजा अंतिम चरण में पलट गया। मुख्य रूप से मुस्लिम बहुल बूथ (बूथ नंबर 164) ने भाजपा को भारी समर्थन मिला, जिससे तृणमूल कांग्रेस (TMC) की बढ़त पलट गई और भाजपा जीत गई। लेकिन क्या यह सब सच है।

स्क्रॉल की एक रिपोर्ट के अनुसार, 4 और 5 मई को वोटों की गिनती के दौरान यह घटना घटी। 4 मई को TMC उम्मीदवार के पास 316 वोटों की बढ़त थी, लेकिन 5 मई को दोबारा गिनती हुई और बूथ नंबर 164 के वोट गिने गए, जिसमें भाजपा को भारी वोट मिले। लेकिन जब वोट गिने गए तो वहां टीएमसी प्रत्याशी का एजेंट मौजूद नहीं था। उसकी गैरमौजूदगी में वोट गिने गए और बीजेपी को विजयी घोषित किया गया। वही बीजेपी जो 4 मई को 316 वोटों से पिछड़ रही थी।

गिनती प्रक्रिया में अनियमितता?

राजारहट न्यू टाउन में कुल 330 बूथ थे। आमतौर पर हर राउंड में 20 EVM की गिनती होती। लेकिन राउंड 9 में बूथ 164 को छोड़ दिया गया। इसे अंतिम राउंड (18वें राउंड) में अलग से गिना गया, जिससे भाजपा उम्मीदवार पीयूष कनोडिया की जीत 316 वोटों से हो गई। सवाल ये है कि नवें राउंड में बूथ 164 के ईवीएम मशीन की गिनती क्यों छोड़ दी गई। और अगले दिन 18वें राउंड में उसे गिना गया। जबकि उस टीएमसी प्रत्याशी का एजेंट मौजूद नहीं था। 
सुप्रीम कोर्ट के मशहूर वकील प्रशांत भूषण ने इस घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए एक्स पर लिखा- मुस्लिम बहुल बूथ पर 97% मतदान भाजपा के पक्ष में होना ईवीएम में हेराफेरी, ईवीएम में बदलाव, या चुनाव आयोग के रिटर्निंग अधिकारी द्वारा ईवीएम में दर्ज आंकड़ों से बिल्कुल अलग वोट घोषित करने का स्पष्ट प्रमाण है। टीएमसी सांसद सागरिका घोष ने एक्स पर लिखा- चुनाव में धांधली कैसे हुई? चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट कहाँ हैं? टीएमसी राजारहाट न्यू टाउन में लगातार जीत रहा था, लेकिन अंतिम दौर में एक बहुसंख्यक मुस्लिम बहुल बूथ की गिनती नियमों के विपरीत कर दी गई और उसके 97% वोट बीजेपी को चले गए।

बूथ 164 का आंकड़ा

  • कुल वोट: 656
  • BJP : 637 वोट (97%)
  • TMC: सिर्फ 5 वोट
  • इस बूथ के 670 मतदाताओं में 88% से ज्यादा (591) मुस्लिम थे। 
  • अनुमान के मुताबिक, मुस्लिम वोटरों में से भी 94% से ज्यादा ने भाजपा को वोट दिया।
  • इसी इलाके के बूथ 165 में लगभग समान मुस्लिम बहुल आबादी (91%+) होने के बावजूद नतीजे बिल्कुल अलग थे:
  • BJP: 32 वोट
  • TMC: 290 वोट
  • CPI(M): 299 वोट

  • दोनों बूथ एक ही पोलिंग केंद्र (जगदीशपुर एफपी स्कूल) पर हैं।
इस साल अप्रैल में जिन चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव हुए, उनमें से पश्चिम बंगाल के नतीजों ने सबसे ज्यादा दिलचस्पी और विवाद पैदा किया। केंद्र में सत्ताधारी पार्टी ने चुनाव प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ी। प्रधानमंत्री ने खुद राज्य में 18 चुनावी रैलियों को संबोधित किया। यहां तक ​​कि वे झालमुरी की दुकान पर रुककर उसका एक पैकेट भी खरीदे। केंद्रीय गृह मंत्री लगभग दो सप्ताह तक वहीं डेरा डाले रहे और करीब 50 रैलियों को संबोधित किया। इसके अलावा, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन के कई मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री भी राज्य में पहुंचे, साथ ही अन्य राज्यों के कई सांसद, विधायक और पार्टी एवं सरकार के नेता भी आए और सभी ने बंगाल में जमकर चुनाव प्रचार किया। यदि भाजपा और उसके सहयोगियों द्वारा किया गया यह अभूतपूर्व प्रयास था, तो केंद्रीय एजेंसियों और अर्धसैनिक बलों जैसी केंद्रीय सरकारी मशीनरी की तैनाती भी कम प्रभावशाली और स्पष्ट नहीं थी।
घोषित परिणाम भाजपा के लिए एकतरफा जीत थी। इसने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल को करारी हार दी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी ही सीट से 7,000 से अधिक वोटों के अंतर से हार गईं। भाजपा ने दो-तिहाई बहुमत हासिल किया और 2021 में अपनी 77 सीटों की संख्या को बढ़ाकर आज 207 कर लिया। तृणमूल की सीटों की संख्या 2021 में 215 से घटकर इस बार 80 रह गई। भाजपा का वोट शेयर 2021 में 38.39 प्रतिशत से बढ़कर इस चुनाव में 46.20 प्रतिशत हो गया, जो 7.81 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। दूसरी ओर, तृणमूल का वोट शेयर 2021 में 48.55 प्रतिशत से घटकर 41.12 प्रतिशत हो गया, जो 7.43 प्रतिशत की गिरावट है। हालांकि, प्रतिशत के हिसाब से टीएमसी और भाजपा के बीच का अंतर केवल 5 प्रतिशत है।
भाजपा की समग्र स्ट्राइक रेट में वृद्धि देखी गई: 2021 में 26.28 प्रतिशत से बढ़कर अब यह 70.65 प्रतिशत हो गई है। वहीं, तृणमूल की स्ट्राइक रेट 2021 में 74.14 प्रतिशत से घटकर 2026 में मात्र 27.59 प्रतिशत रह गई है। सत्ताधारी तृणमूल के मुकाबले मात्र 5 प्रतिशत वोट शेयर के अंतर से भाजपा को लगभग 43 प्रतिशत अधिक स्ट्राइक रेट और 127 अधिक सीटें मिली हैं।
इस अप्रत्याशित परिणाम की भविष्यवाणी नहीं की गई थी और यह अवास्तविक सा लग रहा था। लेकिन इसके साथ ही राज्य में मतदान की गति भी उतनी ही अवास्तविक और तेज थी। इससे चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठते हैं।