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गृह युद्ध और आतंकवादी हमलों से पहले भी लहू लुहान रहा है श्रीलंका

श्रीलंका में तीन होटलों और दो गिर्जाघरों पर हुए 8 धमाकों में 200 से ज़्यादा लोगों के मारे जाने की वारदात के बाद लोगों का ध्यान इस देश की ओर गया, जहाँ 2009 के बाद से अमन चैन था और हमले की कोई बड़ी वारदात नहीं हुई थी। लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम यानी एलटीटीई यानी लिट्टे के साथ चले गृह युद्ध के 2009 में ख़त्म होने और उसमें तमिल टाइगर्स के पूरी तरह ख़ात्मे के बाद यह पहला बड़ा हमला है।

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ये हमले उस दौर की याद दिलाते हैं, जब तमिल टाइगर्स का उत्तरी श्रीलंका पर पूरा नियंत्रण था, वहाँ उनकी समानान्तर सरकार थी, जहाँ सरकार या सेना का कोई आदमी जाने की हिम्मत नहीं कर सकता था। यह पूरी तरह से मुक्त क्षेत्र या ‘लिबरेटेड ज़ोन’ था। यह श्रीलंका के रक्त-रंजित इतिहास का वह पन्ना है, जिसे भूलना हर कोई चाहेगा, पर भूलना नामुमिकन है। इसलिए ईस्टर रविवार के हमलों के परिप्रेक्ष्य में 25 साल के उस दौर पर एक नज़र डालना निहायत ही ज़रूरी है।
श्रीलंका के तमिलों के साथ कथित भेदभाव और नस्लीय सफ़ाए के आरोपों के बीच तमिल टाइगर्स ने अपने आप को स्थापित किया। वेलुपिल्लई प्रभाकरण ने इसे मजबूत किया, तमिलों के जन-जन के बीच वह इसे ले गए। जल्द ही वह एक ऐसा संगठन बन गया, जिससे सरकार ख़ौफ खाती थी, सेना टकराना नहीं चाहती थी।
जुलाई, 1983 : तमिल टाइगर्स ने देश के उत्तरी हिस्से में 13 सैनिकों को मार डाला। इसके बाद कोलंबो और दूसरे हिस्सों में तमिल-विरोधी दंगे हुए, जिनमें सैकड़ों मारे गए, हज़ारों लोगों को बेघर होना पड़ा। लिट्टे ने इसे ‘प्रथम ईलम युद्ध’ क़रार दिया।

1987: भारत ने श्रीलंका सरकार और तमिल टाइगर्स में संधि करवाई, तमिलों पर हथियार डालने के लिए दबाव डाला। इसे लागू करने के लिए भारत ने भारतीय शांति रक्षक सेना ( इंडियन पीसकीपिंग फ़ोर्स यानी आईपीकेएफ़) भेज दिया। टाइगर्स के साथ लड़ाई में 1,000 से ज़्यादा भारतीय सैनिक मारे गए।

1990 : भारत सरकार ने आईपीकेएफ़ को वापस बुला लिया। इसके बाद पूरे उत्तर और पूर्वी हिस्से पर तमिल टाइगर्स का क़ब्जा हो गया। टाइगर्स ने इसे ‘द्वितीय ईलम युद्ध’ बताया।

1991: राजीव गाँधी की हत्या हो गई। इसके लिए तमिल टाइगर्स को ज़िम्मेदार माना गया। साल 2005 में टाइगर्स के सिद्धान्तकार एंटन बालासिंघम ने इस पर खेद जताया।
1993 : तमिल टाइगर्स ने श्रीलंका के राष्ट्रपति रणसिंघे प्रेमदास की हत्या कर दी।
Bloody history of terrorism hit Sri Lanka - Satya Hindi
1995 : श्रीलंका की प्रधानमंत्री चंद्रिका कुमारतुंगे ने विद्रोहियों के साथ बातचीत की, युद्धविराम किया। पर जल्द ही यह युद्धविराम टूट गया। तमिल टाइगर्स ने सेना का विमान गिरा दिया। श्रीलंका की सेना ने विद्रोहियों से जाफ़ना छीन लिया। इसे टाइगर्स ने ‘तृतीय ईलम युद्ध’ क़रार दिया।

1995-2001 : इस ‘तृतीय ईलम युद्ध’ के दौरान भयंकर लड़ाइयाँ हुईं। विद्रोहियों ने देश के केंद्रीय बैंक पर हमला किया, 100 लोग मारे गए। प्रधानमंत्री कुमारतुंगे पर हमला किया, वह बाल-बाल बचीं।

2002 : नॉर्वे की मध्यस्थता में युद्धविराम हुआ, शांति वार्ता हुई। अगले ही साल टाइगर्स ने युद्धविराम तोड़ दिया और बातचीत ख़त्म कर दी।
2004-05 : एलटीटीई के पूर्वी क्षेत्र के कमांडर कर्नल करुणा अम्मान भेदभाव का आरोप लगा कर अपने 6,000 लड़ाकों के साथ अलग हो गए। टाइगर्स ने इसे सेना की कारस्तानी बताया। लेकिन इसके बाद दोनों गुटों में वर्चस्व की लड़ाई हुई और दोनों ने एक दूसरे पर कई बड़े हमले किए।

2006 : सेना और तमिल टाइगर्स में फिर ज़बरदस्त लड़ाई छिड़ी। इसे ‘चतुर्थ ईलम युद्ध’ कहा गया। जनीवा में चली शांति वार्ता बेकार साबित हुई।

Bloody history of terrorism hit Sri Lanka - Satya Hindi
2007: पूर्वी इलाक़े के मजबूत गढ़ से तमिल टाइगर्स को खदेड़ कर सेना ने कब्जा कर लिया।
2008 : सरकार ने शांति वार्ता ख़त्म होने के बाद जनवरी में ही विद्रोहियों के ठिकानों पर ज़ोरदार हमला बोल दिया।
2009 : सेना ने जनवरी में ही विद्रोहियों के मुख्यालय किलिनोच्ची पर कब्जा कर लिया, तमिल टाइगर्स को वहाँ से भागना पड़ा। लड़ाई बढ़ती गई, लिट्टे ने 17 अप्रैल को शांति वार्ता का प्रस्ताव रखा, जिसे सरकार ने खारिज कर दिया। सरकार ने 21 अप्रैल को दो दिनों में विद्रोहियों को हथियार डालने का अल्टीमेटम दिया। इसके बाद सेना ने बड़ा अभियान छेड़ा। हफ़्ते भर में 1 लाख से ज़्यादा तमिल बेघर हुए। विद्रोहियों ने 26 अप्रैल को एकतरफा युद्धविराम का एलान किया, जिसे सरकार ने मजाक क़रार दिया।
इसके बाद की लड़ाई में हज़ारों लोग मारे गए, लाखों बेघर हुए, मानवाधिकारों का बड़े पैमाने पर उल्लंघन हुआ। पूरे तमिल टाइगर्स का सफ़ाया हो गया, प्रभाकरण की पत्नी और 11 साल के बेटे तक को नहीं बख़्शा गया। प्रभाकरण को 18 मई को मार डाला गया। इसके साथ ही इस गृह युद्ध का अंत हो गया।
लेकिन, ईस्टर रविवार को हुआ हमला इससे अलग है। हमले के तौर तरीके अलग हैं और निशाने पर लोग भी दूसरे हैं। तमिल टाइगर्स के लड़ाके छापामार युद्ध करते थे, सैनिकों को घेर कर भयानक गोलाबारी करते थे। वे बम लगा कर सिलसिलेवार विस्फोट नहीं करते थे। ये हमले इस मामले में भी अलग हैं कि एक धर्म विशेष के लोगों पर प्रार्थना के दौरान हमले हुए। वे सिर्फ़ इसलिए मारे गए कि एक धर्म विशेष के थे। तमिल टाइगर्स के हमले में जो सिंहली या बौद्ध मारे गए, वे अपने नस्ल या धर्म की वजह से नहीं मारे गए थे। तमिल टाइगर्स ने किसी बौद्ध स्तूप पर हमला नहीं किया था। इन हमलों में लगे लोगों का तौर तरीका इस्लामिक स्टेट से मिलता जुलता है और निशाने पर भी ईसाई थे। यह श्रीलंका में एक नए किस्म की हिंसा की शुरुआत है।

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