यूएस राष्ट्रपति ट्रंप धीरे-धीरे अपनी नीतियों की वजह से अकेले पड़ते जा रहे हैं। अब पड़ोसी मुल्क कनाडा ने भी आर्थिक मोर्चे पर उन्हें चुनौती दे दी है। ईरान पर थोपे गए युद्ध में अमेरिका का साथ उसके मित्र देशों ने नहीं दिया। ट्रंप ने मित्र देशों और नाटो देशों से अपने वॉरशिप होर्मुज स्ट्रेट में भेजने को कहा। ऑस्ट्रेलिया, इटली, स्विटज़रलैंड, कनाडा, जर्मनी, साउथ कोरिया ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे अपने वॉरशिप नहीं भेजेंगे। स्विटरज़लैंड ने तो अपना एयर स्पेस ही यूएस की सैन्य गतिविधियों के लिए बंद कर दिया। लेकिन कनाडा तो अमेरिका का पड़ोसी मुल्क है। उसने ट्रंप के बिजनेस मॉडल को ही चैलेंज कर दिया है।

कनाडा ने बताया- ऑर्ट ऑफ नो डील यानी सौदा न करने की कला

ट्रंप की ट्रेड पॉलिटिक्स हमेशा मैक्सिमम प्रेशर + बिग ऑफर + प्री-कंडीशंस मॉडल पर आधारित रही है। यह वही स्ट्रेटेजी है जिसे उन्होंने अपनी किताब The Art of the Deal में प्रमोट किया था- पहले दबाव बनाओ, फिर डील को “ऐतिहासिक” बताकर पार्टनर को मानने पर मजबूर करो। लेकिन कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने इसी मॉडल को सीधे चुनौती दी। उनका “We are not negotiating with you” वाला स्टैंड सिर्फ बयान नहीं बल्कि स्ट्रेटेजिक सिग्नल है। कार्नी का सीधा फॉर्मूला है- अगर प्री-कंडीशंस सॉवरेनिटी (संप्रभुता) को चोट पहुँचाएँ, तो डील ही मत करो। यही कारण है कि इसे विश्लेषक “Art of No Deal” कह रहे हैं। यानी नेगोशिएशन की सबसे बड़ी ताकत कभी-कभी टेबल से उठ जाना भी होती है। पता नहीं भारत अमेरिका ट्रेड डील को लेकर भारतीय अधिकारियों को यह बात सूझ रही है या नहीं। विपक्ष ने तो खैर नरेंदर सरेंडर का नारा दे दिया है।

कनाडा समेत दुनिया के कई देशों का यूएस पर से भरोसा उठा

कनाडा का सबसे बड़ा तर्क विश्वास का संकट है। ट्रेड एग्रीमेंट United States–Mexico–Canada Agreement (USMCA / CUSMA) को नॉर्थ अमेरिका की आर्थिक रीढ़ माना जाता था। अगर कनाडा को लगता है कि अमेरिका बिना कंसल्टेशन टैरिफ लगा सकता है। एनर्जी या बॉर्डर पॉलिसी बदल सकता है।  पॉलिटिकल प्रेशर से डील की शर्तें बदल सकता है।  तो फिर नई “बड़ी डील” पर भरोसा करना मुश्किल हो जाता है। यह सिर्फ कनाडा की चिंता नहीं, दुनिया के कई देश अब US ट्रेड पॉलिसी को “अनप्रेडिक्टेबल” मानने लगे हैं।
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कनाडा की जवाबी रणनीति- आर्थिक मार

कार्नी सरकार ने जो कदम उठाए, वे सिर्फ रिएक्शन नहीं बल्कि कैलकुलेटेड इकोनॉमिक वेपन्स हैं यानी उसका सोचा समझा आर्थिक हमला। उसने जवाबी टैरिफ लगाए हैं। $47 बिलियन के अमेरिकी एक्सपोर्ट्स पर टैरिफ लगाए हैं। जिसमें खासकर रिपब्लिकन नेतृत्व राज्यों- टेक्सास, आयोवा को टारगेट किया गया है। इसे विशेषज्ञ क्लासिक पॉलिटिकल-इकोनॉमिक प्रेशर कहते हैं। इसका मतलब यह है कि
व्हाइट हाउस को अपनी भी घरेलू पॉलिटिकल कीमत महसूस कराओ।

कनाडा अमेरिका को भारी मात्रा में क्रूड ऑयल, इलेक्ट्रिसिटी, नैचुरल गैस सप्लाई करता है। अगर वो 15-20% कट करता है यानी नहीं सप्लाई करता है तो अमेरिका में बिजली और फ्यूल महंगे होंगे। इंडस्ट्रियल कॉस्ट बढ़ेगी। मिडवेस्ट और नॉर्थ-ईस्ट स्टेट्स में पॉलिटिकल दबाव बढ़ेगा। यह बताता है कि एनर्जी इंटरडिपेंडेंस एक जियोपॉलिटिकल हथियार बन सकती है।

EV, डिफेंस और टेक इंडस्ट्री के लिए लिथियम, निकल, कोबाल्ट, रेयर अर्थ बहुत जरूरी हैं। कनाडा अगर इन पर एक्सेस सीमित करता है तो अमेरिका की ग्रीन ट्रांजिशन + डिफेंस सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। हालांकि कुछ जोखिम भी है, जिसमें ट्रांजिशन पीरियड में जॉब लॉस, लॉजिस्टिक्स कॉस्ट, नए रेगुलेशन का सामना। यानी कुल मिलाकर कुछ समय के लिए कनाडा को हल्का दर्द मिल सकता है। 

यूएस के मिड टर्म पर पड़ सकता है असर

अमेरिका-कनाडा टकराव अगर बढ़ता है तो ऑटो सेक्टर पर सीधा असर पड़ेगा। नॉर्थ अमेरिकन सप्लाई चेन इंटीग्रेटेड है। कनाडा से पार्ट्स रुकेंगे तो प्रोडक्शन शटडाउन संभव है। हाउसिंग पर भी असर पड़ेगा। कनाडियन लंबर महंगा हुआ तो घरों की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसी तरह कनाडा मार्केट बंद हुआ तो यूएस के किसानों पर असर पड़ेगा। एनर्जी महंगी होगी तो महंगाई का नया दबाव बढ़ेगा। इसका पॉलिटिकल असर मिड टर्म चुनावों में दिख सकता है।
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यह केस दुनिया के अन्य देशों के लिए एक मिसाल बन सकता है। अमेरिका ने मैक्सिको को बहुत सताया हुआ है। यूरोपियन यूनियन के देश ट्रंप के रवैए से परेशान हैं। एशियाई अर्थव्यवस्थाएं भी ट्रंप टैरिफ का शिकार हैं। ऐसे में ऐसे देशों के लिए कनाडा की ट्रंप मॉडल को चुनौती मिसाल बन सकती है। इससे वैश्विक ट्रेड सिस्टम अधिक मल्टी-पोलर बना सकता है।