इसराइली संसद (नेसेट) ने बेहद विवादास्पद कानून पारित किया है। इसके तहत आतंकवादी हमलों के दोषी पाए गए फ़िलिस्तीनियों के लिए मौत की सज़ा अनिवार्य कर दी गई है। इसराइली सांसदों ने 62-47 के मत से यह कानून पारित किया। हालांकि जज "विशेष परिस्थितियों" में आजीवन कारावास का विकल्प चुन सकते हैं, अन्यथा मौत की सज़ा अनिवार्य होगी और सज़ा सुनाए जाने के 90 दिनों के भीतर इसे लागू किया जाएगा। दुनियाभर में इसराइल के इस कानून की निन्दा हो रही है। यह कानून पास होने के बाद इसराइली सांसदों ने जिस तरह इसका जश्न मनाया, उस पर तमाम देशों के आम लोगों का ध्यान गया है।  

इसराइली जेलों में कितने फिलिस्तीनी बंद हैं

2026 की शुरुआत तक, 10,000 से 11,000 से अधिक फ़िलिस्तीनी इसराइली जेलों और हिरासत केंद्रों में बंद हैं, जिनमें से बड़ी संख्या में सुरक्षा संबंधी या "आतंकवाद" के आरोपों में हिरासत में हैं, जिनमें हज़ारों लोग बिना मुक़दमे के प्रशासनिक हिरासत में हैं। रिपोर्टों के अनुसार, वर्तमान में लगभग 10,068 से 11,100 फ़िलिस्तीनी हिरासत में हैं, यह संख्या अक्टूबर 2023 के बाद से काफ़ी बढ़ गई है। इनमें से 3,500 से अधिक व्यक्ति "प्रशासनिक हिरासत" में हैं, जिसका अर्थ है कि उन्हें बिना किसी आरोप या मुक़दमे के जेल में रखा गया है, जिन्हें अक्सर "अवैध लड़ाके" या सुरक्षा के लिए खतरा माना जाता है। दिसंबर 2024 तक, इसराइल जेल सेवा (IPS) ने 9,600 से अधिक फ़िलिस्तीनियों को "सुरक्षा" के आधार पर हिरासत में रखा था, जिसमें मुक़दमे की प्रतीक्षा कर रहे लोग और हिंसा या आतंकवाद से संबंधित अपराधों के दोषी लोग दोनों शामिल हैं। 2023 के हमलों के बाद फिलिस्तीन के लोगों की मासिक गिरफ्तारियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जो 350 से बढ़कर 2,373 हो गई। अक्टूबर 2023 से अब तक, 100 से अधिक फिलिस्तीनी बंदियों की इसराइली हिरासत में मौत हो चुकी है।

क्यों है यह कानून विवादित?

विशेषज्ञों और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह कानून न्यायिक असमानता को बढ़ा सकता है क्योंकि यह मुख्यतः फिलिस्तीनियों को निशाना बनाता है। आलोचकों के अनुसार:
  • यह कानून “चयनात्मक न्याय” (Selective Justice) का उदाहरण बन सकता है
  • इससे West Bank और Gaza Strip में हिंसा और भड़क सकती है
  • शांति प्रक्रिया को गहरा झटका लग सकता है
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क्या फांसी से आतंकवाद रूक सकता है

टाइम्स ऑफ इसराइल की एक रिपोर्ट के मुताबिक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी लंबे समय से इस कानून के प्रस्ताव का विरोध कर रहे थे। उनका तर्क है कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि मृत्युदंड आतंकवाद को रोकता है। उन्होंने चेतावनी दी है कि इससे प्रतिशोध भड़क सकता है और हिंसा बढ़ सकती है। आईडीएफ, शिन बेट खुफिया एजेंसी और सरकारी मंत्रालयों के प्रतिनिधियों ने इस कानून पर कई महीनों तक चली नेसेट राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की चर्चाओं के दौरान इस तरह का विरोध जताया था। लेकिन कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने अपनी सरकार को बचाने और अंध राष्ट्रवादियों को खुश करने के लिए इस कानून को पास कराया है।

इसराइल में विरोध के सुरः यायर लैपिड की येस एटिड, अरब-बहुसंख्यक हदाश-ताअल और वामपंथी डेमोक्रेट्स पार्टी सहित कई विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों ने इस कानून को रद्द करने के लिए तेल अवीव हाईकोर्ट में याचिका दायर करने की घोषणा की है। डेमोक्रेट्स सांसद गिलाद कारिव ने कहा- "यह एक अनैतिक कानून है जो एक यहूदी और लोकतांत्रिक राज्य के रूप में इसराइल राज्य के मूलभूत मूल्यों और उन अंतरराष्ट्रीय कानूनों के प्रावधानों के विपरीत है जिनका पालन करने का इसराइल ने वचन दिया है।" सांसद गिलाद कारिव संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के सदस्य हैं और इस कानून के सबसे मुखर विरोधियों में से एक रहे हैं। रब्बीज़ फॉर ह्यूमन राइट्स ने भी इस कानून का विरोध किया है। अदालत में दायर होने वाली याचिका में रब्बी संगठन के लोग शामिल हैं।

फिलिस्तीन अथॉरिटी की कड़ी आपत्ति

इस कानून की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी निंदा हो रही है। फिलिस्तीनी अथॉरिटी ने इस कानून की कड़ी निंदा करते हुए इसे "खतरनाक" बताया। फिलिस्तीनी अथॉरिटी के विदेश मंत्रालय ने X पर एक पोस्ट में कहा कि "फिलिस्तीनी भूमि पर इसराइल की कोई संप्रभुता नहीं है।" उसने यह भी कहा, "यह कानून एक बार फिर इसराइली औपनिवेशिक व्यवस्था के स्वरूप को उजागर करता है, जो विधायी आवरण के तहत गैर-न्यायिक हत्याओं को वैध ठहराने का प्रयास करती है।"
जर्मनी, फ्रांस, इटली और ब्रिटेन ने खुलकर इसराइली कानून का विरोध किया है। इन चारों यूरोपीय देशों के विदेश मंत्रियों ने इसराइली सांसदों से इस विधेयक को रद्द करने का आग्रह किया। जर्मन विदेश कार्यालय द्वारा जारी एक बयान में मंत्रियों ने कहा, “हम इस विधेयक के स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण स्वरूप को लेकर विशेष रूप से चिंतित हैं। इस विधेयक को पारित करने से लोकतांत्रिक सिद्धांतों के प्रति इसराइल की प्रतिबद्धताओं को खतरा होगा।” विधेयक पारित होने के बाद, अमेरिका ने उल्लेखनीय रूप से इसकी निंदा नहीं की, जबकि अधिकांश पूर्व राष्ट्रपतियों के समय में ऐसा होता था। 

इसराइल में अब तक सिर्फ 1 फांसी

इसराइली कानून में मृत्युदंड का प्रावधान औपचारिक रूप से मौजूद है, लेकिन इसे केवल एक बार ही अंजाम दिया गया है। 1962 में नाज़ी युद्ध अपराधी एडॉल्फ आइचमैन को फांसी दी गई थी। अब तक, इसराइली अदालतें केवल अत्यंत सीमित परिस्थितियों में और जजों के सर्वसम्मत निर्णय से ही मृत्युदंड दे सकती थीं, जो आतंकवाद के मामलों में कभी भी पूरी नहीं हुई है। लेकिन अब फिलिस्तीनियों के मामले में नया कानून बनाया गया है।

अल अज़हर यूनिवर्सिटी मिस्र ने कड़ा विरोध किया

मिस्र के प्रमुख सुन्नी इस्लामी संस्थान अल-अज़हर यूनिवर्सिटी ने मंगलवार को इस कानून के पास होने पर अफसोस जताया। यूनिवर्सिटी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था इसराइल द्वारा फ़िलिस्तीनी कैदियों को फांसी देने की अनुमति देने वाले कानून को पारित करने के कदम का सामना करने में विफल रही है। इसने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से तेल अवीव द्वारा फ़िलिस्तीनियों की हत्या को वैध बनाने के प्रयासों को रोकने के लिए तुरंत कार्रवाई करने का आह्वान किया।

'इसराइल का खूनी चेहरा उजागर'

अल-अज़हर यूनिवर्सिटी ने कहा कि वह "अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था के पतन और ज़ायोनी कब्जे द्वारा फ़िलिस्तीनी कैदियों और बंदियों के खिलाफ मौत की सजा लागू करने वाले विधेयक को मंजूरी देने का सामना करने में इसकी अक्षमता पर गहरा खेद व्यक्त करती है और इसकी कड़ी निंदा करती है।" इसने कहा कि यह कदम "एक बार फिर इस कब्जे के खूनी चेहरे को उजागर करता है, जो अपने निरंतर अपराधों से संतुष्ट नहीं है, बल्कि अब हत्या को वैध बनाने और इसे एक झूठा और उजागर विधायी आवरण प्रदान करने की कोशिश कर रहा है।" अल-अज़हर ने फ़िलिस्तीनियों की हत्या को वैध ठहराने के उद्देश्य से कब्ज़े वाली ताकतों द्वारा जारी किए गए सभी उपायों या निर्णयों को "स्पष्ट रूप से अस्वीकार" किया। उसने कहा कि यह निर्णय "हत्या को कानूनी दर्जा देने का एक हताश प्रयास है, जो इसकी वास्तविकता को नहीं बदलता, और क्रूरता और नैतिक पतन की स्थिति के साथ-साथ सभी मानवीय मूल्यों का उल्लंघन दर्शाता है।"
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मुस्लिम देशों के संगठन ओआईसी का बयान

इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) ने फिलिस्तीनी कैदियों पर फांसी लागू करने वाले कानून को मंजूरी देने की कड़ी निंदा की है।ओआईसी ने इसे अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून, विशेष रूप से चौथे जिनेवा सम्मेलन और नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय संधि के लिए एक स्पष्ट चुनौती बताया है। एक बयान में, ओआईसी ने चेतावनी दी कि इसराइली जेलों में हजारों फिलिस्तीनी कैदियों को यातना, दुर्व्यवहार, अपमान, आतंक, बलात्कार, भुखमरी, बुनियादी मानवाधिकारों से व्यवस्थित रूप से वंचित करना और सीधे तौर पर उनकी जान को निशाना बनाना जैसे गंभीर अपराधों का सामना करना पड़ रहा है।
ओआईसी यह भी कहा कि ऐसे उपाय ग़ज़ा पट्टी और वेस्ट बैंक, जिसमें कब्जे वाले पूर्वी यरुशलम भी शामिल हैं, में इसराइली कब्जे द्वारा किए जा रहे नरसंहार का विस्तार है। ओआईसी ने संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और अंतर-संसदीय संघ सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इसराइली संसद के खिलाफ सभी आवश्यक उपाय करने, कब्जेदार शक्ति इसराइल के खिलाफ जवाबदेही तंत्र को सक्रिय करने और इस अवैध कानून को रद्द करने के लिए दबाव डालने, फिलिस्तीनी कैदियों के अधिकारों की रक्षा करने और उनकी रिहाई के लिए काम करने का आह्वान किया।