ग्रीनलैंड को लेकर यूरोपीय देशों को ट्रंप की धमकी के बाद क्या अब यूरोपीय नेता ट्रंप को सैन्य गठबंधन नाटो के लिए मनाने की कोशिश कर रहे हैं? ईरान युद्ध से अब तक दूरी बनाए रखने वाले नाटो के प्रमुख मार्क रुट अब अमेरिकी हमलों को जस्टिफाई कर रहे हैं।
मार्क रुट और डोनाल्ड ट्रंप
जो नाटो पहले कहता रहा था कि ईरान युद्ध उसका युद्ध नहीं है और जिससे वह पूरी तरह दूर रहा, उसी नाटो के प्रमुख मार्क रुट ने अब ईरान पर अमेरिकी हमले को सही ठहराया है। हॉर्मुज में तीन तेल टैंकरों पर हमलों और उसके जवाब में अमेरिका की ताज़ा सैन्य कार्रवाई के बाद नाटो महासचिव मार्क रुटे ने पहली बार खुलकर अमेरिकी हमलों का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि ईरान पर अमेरिका की सैन्य कार्रवाई 'पूरी तरह ज़रूरी' थी, क्योंकि ईरान युद्धविराम का उल्लंघन कर रहा था। रुटे का यह बयान इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इससे पहले वे लगातार कहते रहे थे कि ईरान और अमेरिका का यह संघर्ष नाटो का युद्ध नहीं है। ऐसे में उनके बदले हुए रुख को लेकर यूरोप की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं।
नाटो प्रमुख का यह बयान तब आया है जब एक दिन पहले ही डोनाल्ड ट्रंप ने तुर्की में नाटो समिट के दौरान फिर दोहराया कि ग्रीनलैंड पर अमेरिका के नियंत्रण के लिए यदि नाटो के सहयोगी साथ नहीं देते हैं तो अमेरिका नाटो से अपना समर्थन कम कर सकता है या यूरोप से सैनिक वापस बुला सकता है। ट्रंप ने इसे नाटो के साथ रिश्ते खराब होने का एक कारण भी बताया। दरअसल, ट्रंप लंबे समय से ग्रीनलैंड खरीदने या नियंत्रण लेने की बात कर रहे हैं। उन्होंने कहा था, 'ग्रीनलैंड को अमेरिका के नियंत्रण में होना चाहिए, न कि डेनमार्क के पास'।
ट्रंप को साथ रखने की कोशिश में यूरोप?
तो क्या डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी के बाद यूरोप का रुख ईरान युद्ध पर बदल रहा है? यदि ऐसा है तो क्यों? दरअसल, विश्लेषकों का मानना है कि यूरोपीय देशों के सामने इस समय दो बड़ी चुनौतियाँ हैं। पहली, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को नाटो के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध बनाए रखना और दूसरी, यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था को मज़बूत करना।
हाल के महीनों में ग्रीनलैंड पर कब्जे जैसे ट्रंप के बयानों और यूरोपीय देशों पर रक्षा खर्च बढ़ाने के दबाव के कारण अमेरिका और उसके नाटो सहयोगियों के बीच तनाव पैदा कर दिया था। ऐसे में माना जा रहा है कि नाटो सम्मेलन के दौरान यूरोपीय नेता ट्रंप को सैन्य गठबंधन के साथ बनाए रखने के लिए उनकी विदेश नीति का खुलकर समर्थन कर रहे हैं।
'युद्धविराम तोड़ेगा तो जवाब मिलेगा': रुट
रायटर्स की रिपोर्ट के अनुसार तुर्की की राजधानी अंकारा में नाटो नेताओं के सम्मेलन से पहले पत्रकारों से बातचीत करते हुए मार्क रुटे ने कहा, 'जब युद्धविराम लागू हो और ईरान उसका उल्लंघन करे तब अमेरिका की ओर से सख्त जवाब देना बिल्कुल ज़रूरी है।' मार्क रुटे ने कहा कि अमेरिका की नाटो के प्रति प्रतिबद्धता पर कोई संदेह नहीं होना चाहिए। हालाँकि उन्होंने यह भी दोहराया कि अब यूरोपीय देशों और कनाडा को भी रक्षा खर्च बढ़ाना होगा ताकि बोझ केवल अमेरिका पर न रहे।
'अमेरिका पूरी तरह नाटो के साथ'
रिपोर्ट के अनुसार रुटे ने कहा कि अमेरिका न केवल यूरोप की सुरक्षा करता है बल्कि नाटो अमेरिका की सुरक्षा के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा, 'यूरोप और कनाडा यदि रक्षा बजट बढ़ाते हैं तो यह राष्ट्रपति ट्रंप की भी बड़ी जीत होगी और रूस के लिए नुकसान।'
पहले पूरी तरह दूर रहा था नाटो
जब अमेरिका-इसराइल ने फरवरी में ईरान पर सैन्य कार्रवाई शुरू की थी तो नाटो आधिकारिक रूप से पूरी तरह अलग रहा। फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन जैसे कई बड़े यूरोपीय देशों ने ट्रंप को अपने सैन्य अड्डों या एयरस्पेस का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी। उनका रुख साफ था- 'यह हमारा युद्ध नहीं है'। ट्रंप बेहद नाराज हुए। उन्होंने नाटो को 'पेपर टाइगर' यानी कागजी शेर तक कह दिया था और आरोप लगाया कि अमेरिका इतना पैसा नाटो पर खर्च करता है, लेकिन ज़रूरत के समय कोई साथ नहीं देता। लेकिन अब सीजफायर के उल्लंघन का हवाला देते हुए नाटो प्रमुख अमेरिकी हमलों को सही ठहरा रहे हैं।
अमेरिका ने क्यों किए नए हमले?
अमेरिकी सेना ने मंगलवार रात ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए। अमेरिकी सेंट्रल कमांड CENTCOM के अनुसार इन हमलों में ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम, तटीय निगरानी केंद्र, एंटी-शिप मिसाइल लॉन्चर, ड्रोन लॉन्चिंग साइट और रिवॉल्यूशनरी गार्ड यानी आईआरजीसी की कई नौकाओं को निशाना बनाया गया। अमेरिका का कहना है कि यह कार्रवाई हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तीन वाणिज्यिक जहाजों पर हुए हमलों के जवाब में की गई।
ईरान का पलटवार
अमेरिकी कार्रवाई के कुछ घंटों बाद ईरानी सेना इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आईआरजीसी ने जवाबी हमला किया। ईरान ने दावा किया कि उसने बहरीन में अमेरिकी नौसैनिक अड्डे, कुवैत के अली अल सलेम एयरबेस, और अमेरिकी MQ-9 ड्रोन को निशाना बनाया। बहरीन और कुवैत में एयर रेड सायरन बजने लगे और दोनों देशों की वायु रक्षा प्रणाली सक्रिय कर दी गई।
तनाव की शुरुआत मंगलवार को हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तीन तेल टैंकरों पर हुए हमलों से हुई। इनमें कतर का LNG जहाज अल रेकैय्यात, सऊदी अरब का तेल टैंकर वेदयान और एक अन्य वाणिज्यिक जहाज शामिल हैं। कतर ने टैंकर पर इन हमलों के लिए सीधे ईरान को जिम्मेदार ठहराया है। हालाँकि ईरान ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि वह संघर्ष कम करने की अपनी प्रतिबद्धता निभा रहा है।
ईरान के तेल निर्यात पर मिली विशेष छूट ख़त्म
सैन्य कार्रवाई के साथ ही अमेरिका ने ईरान को दी गई वह विशेष छूट भी ख़त्म कर दी, जिसके तहत ईरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल बेच सकता था। इस फ़ैसले के बाद वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तीन प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
ईरान का आरोप- अमेरिका ने समझौता तोड़ा
ईरान के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी हमलों और तेल प्रतिबंधों को युद्धविराम समझौते का उल्लंघन बताया। ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकर क़ालिबाफ ने कहा, 'दबाव और धमकियों का दौर खत्म हो चुका है। ईरान किसी के सामने झुकेगा नहीं।' ईरान ने चेतावनी दी है कि वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाएगा।
इधर, नीदरलैंड के प्रधानमंत्री ने कहा कि यदि ईरान युद्धविराम तोड़ता है तो उसे साफ़ संदेश देना ज़रूरी है कि ऐसे क़दम स्वीकार नहीं किए जाएंगे। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ कूटनीतिक बातचीत जारी रहनी चाहिए ताकि स्थायी समाधान निकाला जा सके।यूएस-ईरान में बढ़ सकता है तनाव
हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है। यहां लगातार बढ़ते हमले वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, तेल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर बड़ा असर डाल सकते हैं।
ऐसे समय में नाटो प्रमुख मार्क रुटे का अमेरिका के सैन्य अभियान का खुला समर्थन इस पूरे संकट को और अधिक अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक महत्व दे रहा है। वहीं अमेरिका, ईरान और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों के बीच तनाव फिर से गहराने के संकेत मिल रहे हैं।