अमेरिका में अडानी ग्रुप पर लंबे समय से मंडरा रहा कानूनी संकट काफी हद तक खत्म हो सकता है। अडानी ने अमेरिकी न्याय विभाग के मुक़दमे से लड़ने के लिए डोनाल्ड ट्रंप के निजी वकील को हायर किया और अमेरिका में 10 अरब डॉलर का निवेश का वादा किया है।
अमेरिकी जस्टिस डिपार्टमेंट यानी न्याय विभाग अडानी के ख़िलाफ़ लगाए गए धोखाधड़ी और रिश्वत के आरोप वापस लेने जा रहा है। अमेरिका के प्रतिष्ठित अख़बार
न्यूयॉर्क टाइम्स ने यह रिपोर्ट दी है। यह बड़ा फ़ैसला बाइडेन प्रशासन के आखिरी दिनों में लगाए गए आरोपों को पलटने वाला है। गौतम अडानी ने जस्टिस डिपार्टमेंट के मुक़दमे को लड़ने के लिए उस वकील को हायर किया जो डोनाल्ड ट्रंप के निजी वकीलों में से एक हैं। आरोपों को खारिज करने के लिए जो दलीलें दी गईं उसमें से एक दलील यह भी है कि अडानी अमेरिकी अर्थव्यवस्था में 10 अरब डॉलर यानी क़रीब 9 लाख 56 हज़ार करोड़ रुपये का निवेश और 15000 रोज़गार के अवसर पैदा करेंगे।
अमेरिकी न्याय विभाग में मुक़दमे को वापस लेने से जुड़ी न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में क्या कहा गया है, यह जानने से पहले यह जान लें कि आख़िर पूरा मामला क्या है। 2024 के नवंबर में अमेरिका के ब्रुकलिन के संघीय अभियोजकों ने गौतम अडानी, उनके भतीजे सागर अडानी और अडानी ग्रीन के एक अधिकारी पर आरोप लगाया था। आरोप था कि उन्होंने 25 करोड़ डॉलर यानी क़रीब 2650 करोड़ रुपये की रिश्वत देकर भारत में सोलर पावर प्रोजेक्ट्स हासिल किए। इसके साथ ही इस साज़िश को छिपाकर अमेरिकी निवेशकों से 17.5 करोड़ डॉलर जुटाए। अमेरिकी अभियोजकों ने इसे 'भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी' का मामला बताया था।
ट्रंप प्रशासन में अडानी केस कैसे बदला?
हालाँकि अब ट्रंप प्रशासन के आने के बाद पूरा माहौल बदल गया है। गौतम अडानी ने भी इस दिशा में एक क़दम उठाया और ट्रंप के एक निजी वकील की लॉ फर्म को हायर किया। इसका नतीजा अब सामने है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी है कि न्याय विभाग जल्द ही सभी आपराधिक आरोप वापस लेने की घोषणा कर सकता है। सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन यानी SEC भी नागरिक मामले में सेटलमेंट की ओर बढ़ रहा है, जिसमें कुछ जुर्माना लग सकता है।
ट्रंप के वकील का असर!
इस उलटफेर के पीछे अडानी की नई क़ानूनी टीम का कमाल बताया जा रहा है। इसका नेतृत्व कर रहे हैं रॉबर्ट जे. गुइफ्रा जूनियर। वह खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निजी वकीलों में से एक हैं। रिपोर्ट है कि पिछले महीने वाशिंगटन में न्याय विभाग के मुख्यालय में एक अहम बैठक हुई। गुइफ्रा ने क़रीब 100 स्लाइड्स की प्रस्तुति दी, जिसमें उन्होंने साबित करने की कोशिश की-
- अभियोजकों के पास पर्याप्त सबूत नहीं हैं।
- अमेरिका को इस मामले में सुनवाई करने का अधिकार ही नहीं है।
प्रस्तुति में एक और अहम बात बताई गई- अगर आरोप वापस लिए जाते हैं तो गौतम अडानी अमेरिकी अर्थव्यवस्था में 10 बिलियन डॉलर का निवेश करेंगे और 15000 नौकरियां पैदा होंगी। यह वादा ट्रंप के चुनाव जीतने के बाद अडानी पहले ही कर चुके थे।
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार हालाँकि अभियोजकों ने बाद में कहा कि निवेश का वादा मामले के फैसले में कोई भूमिका नहीं निभाएगा, लेकिन बैठक में एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस ऑफर का सकारात्मक स्वागत किया।
रिपोर्ट के अनुसार अडानी के मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने बताया कि प्रॉसिक्यूटर अडानी पर से केस इसलिए वापस नहीं ले रहे हैं क्योंकि वे उन्हें कोई राजनीतिक फ़ायदा पहुँचाना चाहते हैं; जिनका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ काफ़ी करीबी संबंध हैं। इसके बजाय, उनमें से एक व्यक्ति ने कहा कि केस को खारिज करने का यह फ़ैसला, विदेशी रिश्वतखोरी के मामलों से ट्रंप प्रशासन के पीछे हटने की व्यापक नीति को दिखाता है।
रिपोर्ट के अनुसार इस मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने बताया कि भले ही अडानी के खिलाफ़ आपराधिक आरोप खारिज हो जाएँ, फिर भी उन पर आर्थिक जुर्माना लगने की संभावना है।
अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन करते हुए ईरानी गैस की शिपिंग के मामले में अडानी की कंपनियों की अलग से जांच कर रहा ट्रेजरी डिपार्टमेंट भी उन पर जुर्माना लगाने की तैयारी में है।
हालांकि यह डील अभी भी टूट सकती है, लेकिन इस डील से जुड़े लोगों के अनुसार, जस्टिस डिपार्टमेंट आने वाले दिनों में इन आरोपों को खारिज करने की दिशा में कदम उठा सकता है।
अडानी ग्रुप ने शुरू से ही सभी आरोपों से इनकार किया है। ग्रुप का कहना है कि वह कानूनी प्रक्रिया में पूरा सहयोग कर रहा है और आरोप निराधार हैं।
इसका क्या मतलब है?
अडानी ग्रुप पर लंबे समय से मंडरा रहा कानूनी संकट काफी हद तक खत्म हो सकता है। अमेरिकी बाजार में अडानी कंपनियों के शेयरों में तेजी आई है। यह घटनाक्रम भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों और ट्रंप प्रशासन की व्यापार नीति को भी दिखाता है।यह मामला अब पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। विशेषज्ञ कह रहे हैं कि कानूनी सबूतों की कमी और नई प्रशासनिक प्राथमिकताओं ने इस फैसले में बड़ी भूमिका निभाई है। हालाँकि, अभी तक न्याय विभाग की तरफ से आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन कई विश्वसनीय मीडिया संस्थान इस खबर की पुष्टि कर रहे हैं।