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हाफ़िज़ के मंच पर मंत्री, इमरान आतंकियों पर मेहरबान!

पाकिस्तान सरकार आतंकवादियों के साथ इस तरह खड़ी है कि उसके मंत्री खुले आम हाफ़िज़ सईद के कार्यक्रम में शिरक़त करते हैं और कहते भी हैं कि वे प्रधानमंत्री के कहने पर वहां गए थे। दूसरी ओर, भारत सरकार इस पर अड़ी है कि जब तक आतंकवादियों के ख़िलाफ़ क़ार्रवाई नहीं होती, कोई बातचीत नहीं हो सकती। ज़ाहिर है, फिलहाल नई दिल्ली को बातचीत की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए। 

जब इमरान ख़ान सरकार के एक मंत्री हाफ़िज़ सईद के साथ बेधड़क उनकी सभा में जाते हों, तो पाकिस्तान से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह आतंकवादियों के ख़िलाफ़ कभी कोई कार्रवाई करेगा? हाफ़िज़ सईद लश्कर-ए-तय्यबा और जमात-उद-दावा जैसे आतंकवादी संगठनों का संस्थापक है।

इमरान ख़ान के कहने पर गए थे मंत्री

ताज़ा मामला 30 सितम्बर का है। पाकिस्तान के धार्मिक मामलों के मंत्री नूरुल हक़ क़ादरी उस दिन हाफ़िज़ सईद के साथ एक सभा में मौजूद थे। सभा का आयोजन किया था पाकिस्तान के क़रीब 40 धार्मिक समूहों की संस्था 'दिफ़ा-ए-पाकिस्तान काउंसिल' (दिफ़ा का अर्थ होता है रक्षा करना) ने। यह संस्था भी ख़ुद हाफ़िज़ सईद ने 2011 में बनायी थी। और सभा में  अपने भाषण में क़ादरी साहब ने साफ़-साफ़ बताया कि वह प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के निर्देश पर ही ही वहाँ आये हैं।

'दिफ़ा-ए-पाकिस्तान काउंसिल' है क्या?

अब बताइए, क्या पाकिस्तान में हाफ़िज़ सईद के ख़िलाफ़ कभी कोई कार्रवाई हो सकती है? अमेरिका ने सईद की गिरफ़्तारी पर एक करोड़ डालकर का इनाम घोषित कर रखा है। लेकिन ज़ाहिर है कि पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेन्सियों को, पुलिस को कभी हाफ़िज़ सईद नहीं मिल पायेगा। कारण अब आपको पता चल गया होगा!अब ज़रा यह जान लीजिए कि यह 'दिफ़ा-ए-पाकिस्तान काउंसिल' है क्या? और यह संस्था क्यों बनी? पाकिस्तान के तमाम धार्मिक चरमपंथी गुटों को एकजुट करने के लिए ही यह संस्था बनवायी गयी थी। और इसका मुख्य मक़सद था कि भारत के साथ पाकिस्तान के रिश्ते न सुधरें। इसका दूसरा बड़ा मक़सद था अमेरिका का विरोध। यह तब की बात है, जब पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार भारत-पाकिस्तान के बीच वीसा को उदार बनाने और भारत को 'मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन' (MFN) का दर्जा देने की सोच रही थी। लेकिन अन्तत: इन संगठनों के दबाव में पाकिस्तान सरकार ने अपने हाथ खींच लिये।

अहमदियाओं के नरसंहार के लिए ज़िम्मेदार

अब जान लीजिए कि इस 'दिफ़ा-ए-पाकिस्तान काउंसिल' में कौन-कौन हैं? इसके अध्यक्ष हैं जमायते उलेमा इसलामी के समी-उल-हक़, जो दारुल उलेमा हक़्क़ानिया नाम का मदरसा चलाते हैं। यह मदरसा 'तालिबान फ़ैक्ट्री' के नाम से भी मशहूर है। यहाँ से मुल्ला उमर जैसे तालिबानी निकले हैं। इसके अलावा कुख्यात हक़्क़ानी नेटवर्क के जलालुद्दीन हक़्क़ानी भी यहीं के प्रोडक्ट हैं। इस काउंसिल में एक और संगठन शामिल है, अहले सुन्नत वल जमात। पहले इसका नाम सिपह-ए-सहाबा पाकिस्तान था। लश्कर-ए-झाँगवी इसी संगठन की देन है, जो शिया और अहमदिया मुसलमानों के नरसंहार के लिए कुख्यात है। 
हाफ़िज़ सईद के जिस संगठन 'दिफ़ा-ए-पाकिस्तान काउंसिल' में शिरक़त करने इमरान के मंत्री गए थे, उसके अध्यक्ष जमायते उलमा इसलामी के समी-उल-हक़ हैं। वे दारुल उलेमा हक़्क़ानिया नाम का मदरसा चलाते हैं। यह मदरसा 'तालिबान फ़ैक्ट्री' के नाम से भी मशहूर है। यहाँ से मुल्ला उमर जैसे तालिबानी निकले हैं। इसके अलावा कुख्यात हक़्क़ानी नेटवर्क के जलालुद्दीन हक़्क़ानी भी यहीं के प्रोडक्ट हैं।
इस काउंसिल में एक और संगठन शामिल है, अहले सुन्नत वल जमात। पहले इसका नाम सिपह-ए-सहाबा पाकिस्तान था। लश्कर-ए-झाँगवी इसी संगठन की देन है, जो शिया और अहमदिया मुसलमानों के नरसंहार के लिए कुख्यात है। अभी पाकिस्तान में हुए चुनावों के पहले पेशावर में हुई 'दिफ़ा-ए-पाकिस्तान काउंसिल' की रैली में ख़ैबर पख़्तूनख़वा प्रान्त के मुख्यमंत्री और इमरान की तहरीक-ए-इनसाफ़ पार्टी के नेता परवेज़ खटक शामिल हुए थे।

मक़्की के साथ ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के मंत्री

 इस रैली में हाफ़िज़ सईद ने तो फ़ोन के ज़रिये भाषण किया था, लेकिन जमात-उद-दावा में दूसरे नम्बर के नेता और हाफ़िज़ सईद के साले अब्दुल रहमान मक्की रैली में मौजूद थे। मक्की पर भी अमेरिका ने बीस लाख डॉलर का इनाम घोषित कर रखा है। 
अब्दुल रहमान मक्की
30 सितम्बर को 'दिफ़ा-ए-पाकिस्तान काउंसिल' की जिस रैली में क़ादरी साहब गये थे, उसमें जमायते उलेमा इसलामी के नेता और काउंसिल के अध्यक्ष समी-उल-हक़ के अलावा पूर्व आईएसआई प्रमुख असद दुर्रानी भी मौजूद थे। पाकिस्तानी उर्दू दैनिक 'जंग' के मुताबिक़ समी-उल-हक़ ने वहाँ साफ़-साफ़ कहा कि 'कश्मीर का मुद्दा जिहाद के बिना सुलझ ही नहीं सकता।और पाकिस्तान सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए कि भारत उसे धमका न सके।' बाद में रैली में प्रस्ताव पास किया गया कि 'भारत को आतंकवादी देश घोषित किया जाना चाहिए।'  
ज़ाहिर है कि ऐसा सोचने की कोई गुंजाइश ही नज़र नहीं आती कि पाकिस्तान कभी अपने घरेलू आतंकवादियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई करेगा। कार्रवाई तो दूर, मौजूदा इमरान सरकार तो उनसे अपने रिश्ते भी नहीं छिपाती। वह तो खुल कर उनका समर्थन कर रही है। इससे पहले की किसी पाकिस्तानी सरकार ने आतंकवादियों से ऐसी नज़दीकियों का खुला इज़हार नहीं किया था। लेकिन इमरान ख़ान तो इन आतंकवादियों को 'मुख्यधारा' में लाने की बात करते हैं। और वह भी अपनी सरकार के आधिकारिक नज़रिये के तौर पर!  
अभी हाल में अमेरिकी विदेश सचिव माइक पॉम्पिओ की पाकिस्तान यात्रा के दौरान तो इमरान ख़ान ने उनसे यहाँ तक कह दिया कि लश्कर-ए-तय्यबा तो इतना शक्तिशाली हो चुका है कि अब पाकिस्तानी सेना भी उससे नहीं निबट सकती। इसलिए उसे 'मुख्यधारा' में लाना ही पड़ेगा। और कोई चारा नहीं है।
इसीलिए 'अल्लाहो अकबर' पार्टी के बैनर तले लश्कर के लोगों को चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया गया, क्योंकि यह उन्हें 'मुख्यधारा' में लाने की दिशा में पहला क़दम था।इस बातचीत के दौरान पाकिस्तान के सेना प्रमुख क़मर जावेद बाजवा और आईएसआई प्रमुख नावीद मुख़्तार भी मौजूद थे। यहाँ याद दिला दें कि पाकिस्तान में हुए हाल के चुनाव में आतंकवादी संगठनों को चुनाव मैदान में उतारने की पूरी योजना सेना की थी, ऐसी रिपोर्टें छपी थीं। जब पाकिस्तान सरकार इस तरह खुल कर आतंकवादियों के साथ हो, तो भारत के साथ उसकी बातचीत दुबारा कैसे शुरू हो पायेगी? साफ़ है कि निकट भविष्य में पाकिस्तान से रिश्ते सुधरने की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए। क्योंकि जब इस मामले में पाकिस्तान को अपनी दरकती अर्थ-व्यवस्था और अन्तरराष्ट्रीय दबावों तक की कोई परवाह नहीं है, तो वह भला इसकी क्यों परवाह करेगा कि भारत के साथ उसकी बातचीत शुरू हो और रिश्ते सुधरें।वित्तीय रूप से आतंकवाद की कमर तोड़ने के लिए वैश्विक अभियान चलाने वाली फ़ाइनेन्शियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (FATF) ने पाकिस्तान को पहले ही 'संदिग्ध सूची' में डाल रखा है। एफ़एटीएफ़ के प्रतिनिधि फ़िलहाल पाकिस्तान में हैं और सरकार से जानकारी ले रहे हैं कि आतंकवादियों के वित्तीय संसाधनों पर शिकंजा कसने के लिए पाकिस्तान ने कुछ महीनों पहले जो वादे, किये थे, उनका क्या हुआ। ज़ाहिर है कि 'दिफ़ा-ए-पाकिस्तान काउंसिल' की रैली में क़ादरी साहब की मौजूदगी पर भी पाकिस्तान से सफ़ाई माँगी जायगी। बहरहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि 14 से 19 अक्तूबर को होने वाली एफ़एटीएफ़ की बैठक में इस मुद्दे पर क्या होता है।
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