चिंतक और लेखक सच्चिदानंद सिन्हा अपनी पुस्तक ‘द अनआर्मड प्राफेट’ ( निहत्था पैगंबर) के आखिरी अध्याय में एक महत्त्वपूर्ण सवाल उठाते हैः- क्या गांधी कामयाब होंगे? यह सवाल न तो गांधी का निजी सवाल है, न ही उनके परिवार से जुड़ा है और न ही महज गांधीवादियों या गांधीजनों के विश्वास से। यह सवाल महज भारत का भी नहीं है। वे इस सवाल को मानव प्रजाति के अस्तित्व के सवाल से जोड़ते हैं और कहते हैं कि अगर मानव जाति को बचना है तो एकमात्र गांधी ही हैं जो यह बताते हैं कि उसे कैसे बचना है। वे मानते हैं कि मानव सभ्यता में बहुत हठधर्मिता है, संगठित मानव समूहों ने हिंसा के नए नए तरीके ईजाद किए हैं। लेकिन आखिरकार मनुष्य गांधी द्वारा बताए गए अहिंसा और शांति के रास्ते को अपनाएगा।
गांधी की यह स्वीकार्यता सीमित अर्थों में हो सकती है और उसके तहत सिर्फ राष्ट्रीय विवाद और सामाजिक विवादों को हल किया जा सकता है। पर सभी नैतिक उपदेशों का भविष्य इसी तरह की सीमित सफलता में ही निहित है। कुछ नए बुनियादी मूल्य स्थापित होंगे और फिर लोग हमेशा की तरह जीने लगेंगे। लेकिन उससे कुछ शांतिपूर्ण और समझदारी वाली दुनिया बनेगी। अगर ऐसा हुआ तो गांधी सही साबित होंगे।
दरअसल सच्चिदानंद सिन्हा की यह पुस्तक पंद्रहवी और सोलहवीं सदी के इटली के दार्शनिक निकोलो मैकेवेली के इस कथन पर आधारित है कि अतीत में जितने भी पैगंबर आए उन्होंने अगर अपने नियमों को शक्ति के साथ न लागू किया होता तो कोई भी उनके नियमों और और संस्थाओं का पालन न कर रहा होता। मैकेवेली इस श्रेणी में हजरत मूसा, साइरस, थीसस, रोमुलस को रखते हैं। हालांकि इनमें हजरत मूसा के अलावा किसी को पैगंबर नहीं कहा जा सकता। लेकिन लोगों के दिमाग में यह बात आती है कि हजरत मूसा ने ताकत के बल पर अपने कानूनों को लागू करवाया। दुनिया में आज भी राजनीतिज्ञों का बड़ा तबका है जो बल प्रयोग के मैकेवेली के दर्शन को ही अपना आदर्श मानता है। क्योंकि उन्होंने कहा था कि दुनिया में जो भी पैगंबर हाथ में हथियार लेकर आए वे कामयाब हुए और जिनके हाथ में हथियार नहीं थे वे तबाह हो गए।
उनकी दलील है कि लोगों को कुछ समय के लिए किसी विचार से सहमत किया जा सकता है लेकिन उनसे उस विश्वास को लंबे समय तक मनवाना मुश्किल होता है। इसीलिए पैगंबरों को शक्ति के उपयोग के लिए तैयार रहना चाहिए। यहीं से क्रांति के लिए हथियार प्रयोग करने का तर्क भी निकलता है। क्योंकि लोग क्रांति के लिए होने वाले प्रयासों से थक जाते हैं इसलिए नेताओं को बल प्रयोग करना पड़ता है। लेकिन बल प्रयोग का आकर्षण इतना अधिक हो जाता है कि क्रांति अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती है और हिंसा के माध्यम से क्रांति के आदर्शों को कुछ समय के लिए टिकाए रखना उस व्यवस्था का मूल उद्देश्य हो जाता है। यह प्रणाली भी कुछ समय बाद सोवियत संघ और दूसरे साम्यवादी देशों की तरह से बिखर जाती है।
गांधी के साधनों की पवित्रता और उससे निर्मित होने वाली नैतिक मूल्यों की इस व्यवस्था की कामयाबी की बहस खत्म नहीं हुई है। शायद यह कभी खत्म भी नहीं होगी। लेकिन उस समय गांधी मजबूत होंगे जब नैतिक साधनों के माध्यम से एक नैतिक व्यवस्था निर्मित हो पाएगी।
वैसे समय की कल्पना दुरुह लगती है लेकिन वह मार्ग मानव समाज और राष्ट्रों के समक्ष बंद नहीं हुआ है। शायद कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी दावोस में नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के टूटने का जिक्र करते हुए उसी की तलाश की बात कर रहे थे।
तो क्या गांधी इसीलिए मारे गए क्योंकि वे शक्ति के आधार पर निर्मित होने वाली व्यवस्था के समक्ष नैतिकता के आधार पर बनने वाली एक व्यवस्था खड़ी करना चाहते थे? यानी क्या गांधी ने शक्ति आधारित व्यवस्था को अपनी नैतिक शक्ति के आधार पर मजबूर कर दिया था कि वह अपना रास्ता बदले? क्या गांधी अपने द्वारा खड़े किए गए उस राष्ट्र के समक्ष ही एक मुसीबत बन गए थे जो सेना, जमींदारों और पूंजीपतियों के दमन और शोषण के सहारे अपना मार्ग तय करना चाहता था?
अमेरिकी सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक जेम्स डब्ल्यू डगलस अपनी चर्चित पुस्तक ‘ गांधी एंड द अनस्पीकेबलः हिज फाइनल एक्सपेरीमेट विथ ट्रुथ’ में यही कहते हैं। उनका मानना है कि दुनिया में जान एफ कैनेडी से लेकर, मार्टिन लूथर किंग जूनियर तक जिसने भी शांति के प्रयास किए उसका हश्र यही होना है। इसलिए सवाल सिर्फ गांधी की सफलता का नहीं है, सवाल शांतिपूर्ण विश्व और उसकी सफलता का है? इसका एक अर्थ यह भी है अहिंसक शक्तियां हिंसक शक्तियों के प्रभाव से उतनी भयभीत नहीं होतीं जितनी कि हिंसक शक्तियां अहिंसक शक्तियों के प्रभाव और चमत्कार से भयभीत होती हैं।
इसी बात को अपनी पुस्तक ‘मजबूती का नाम महत्मा गांधी’ में प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल अंतिम निष्कर्ष के तौर पर रखते हैं। वे कहते हैं, “ गांधी जी की हत्या की ही उनके विचित्र ‘जादुई’ प्रभाव के कारण गई थी। उनके अंतिम उपवास, उसके पहले सितंबर में कोलकाता उपवास का असर सचमुच जादुई था। कोलकाता में एक आदमी के नैतिक प्रभाव ने उतना कर दिखाया जितना पंजाब में पचास हजार लोगों की टास्क फोर्स न कर सकी।” गांधी हत्या के प्रसंग पर चर्चा करते हुए वे लिखते हैं कि जनवरी में तो कट्टर हिंदुत्ववादियों ने यह दर्शाया था कि वे गांधी के अनशन करके मरने का पाप अपने सिर पर नहीं लेना चाहते हैं। इसीलिए उन्होंने यह वायदा भी किया था कि वे वैसा कुछ भी नहीं करेंगे जिससे महात्मा जी का दिल दुखे।
लेकिन प्रोफेसर अग्रवाल यह सवाल करते हैं कि क्या गांधी अपने नैतिक प्रभाव का दुरुपयोग कर रहे थे? क्या उन्हें सिर्फ मुसलमानों की चिंता थी? गोडसे और उनके साथियों को ऐसा ही लगा था। उन्होंने सोचा कि इस आदमी के विचित्र जादुई प्रभाव की कोई काट हमारे पास नहीं, इसे रास्ते से हटाने के लिए हम मजबूर हैं। हालांकि गांधी के अंतिम उपवास के बारे में जब उनसे पूछा गया था कि किसके विरुद्ध है यह उपवास? तो उनका कहना था, “ हिन्दुस्तान के हिंदुओं और सिखों के विरुद्ध और पाकिस्तान के मुसलमानों के......”
प्रोफेसर अग्रवाल कहते हैं कि क्या गांधी सुकरात की तरह अपरिभाषेय हैं? क्या वे महज एक राजनेता हैं? क्या वे एक गैरपारंपरिक राजनेता हैं? क्या वे एक निहत्थे पैगंबर हैं? या वे एक आदर्शवादी दार्शनिक राजनेता हैं जिनके सपने कल्पना में ही रहने वाले हैं? या वे एक तपस्वी हैं जो एक नई मानवता के लिए अपनी हड्डियां गला कर अपने प्राणों की बलि चढ़ाने को आतुर हैं? सचमुच इस निहत्थे पैगंबर की व्याख्या करना आसान नहीं है। इसीलिए पराए लोग उसके आगे नमन करते हैं और अपने ही लोग उसकी हत्या कर उसे वध की संज्ञा देते हैं। प्रोफेसर अग्रवाल कहते हैं, “ ये अभिव्यक्तियां हैं गांधी की तपस्या की, जिसका अंधानुकरण या अंधविध्वंस नहीं विवेकपूर्ण अनुसंधान किया जाना चाहिए।”
इसलिए गांधी की शहादत कोई निजी शहादत नहीं एक नई सभ्यता के विचार की शहादत है और उससे सहज होना न हिंदुत्ववादियों के लिए संभव है, न भारत के लिए संभव है और न ही इस विश्व के लिए।