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कृष्णानंद राय के मर्डर केस में कैसे छूटा मुख़्तार अंसारी?

2005 में यूपी के ग़ाज़ीपुर में विधायक कृष्णानंद राय की हत्या हुई थी और उनके साथ छह और लोग मारे गए थे। राय और उनके काफ़िले पर क़रीब पाँच सौ राउंड गोलियाँ चलाई गईं थीं। इस लोमहर्षक सामूहिक नरसंहार से तहलका मच गया था। लेकिन 14 साल बाद आए सीबीआई कोर्ट के फ़ैसले से लोग हैरान हैं क्योंकि मामले में अभियुक्त बीएसपी विधायक मुख़्तार अंसारी, उनके भाई और सांसद अफ़ज़ाल अंसारी और बाक़ी अन्य अभियुक्तों को अदालत ने बरी कर दिया है। अब सवाल यह है कि आख़िर कैसे अभियुक्त बरी हो गए?
शीतल पी. सिंह

क्या कृष्णानंद राय के पैरोकारों ने ज़्यादा चतुर, ज़्यादा समर्थ और ज़्यादा जानकार होने की क़ीमत चुकाई जिससे कि राय व अन्य की हत्या के सारे अभियुक्त सीबीआई कोर्ट से बरी हो गये। वह भी तब जब केंद्र और राज्य में उस दल (बीजेपी) का प्रचंड बहुमत है जिसके राय विधायक थे। 29 नवम्बर 2005 को ग़ाज़ीपुर में मोहम्मदाबाद के विधायक कृष्णानंद राय की हत्या हुई थी और उनके साथ छह और लोग मारे गए थे। तब राय अपने क्षेत्र में एक क्रिकेट मैच का उद्घाटन करने गये थे और वहाँ से लौट रहे थे। वह और उनके सहयोगी दो क्वालिस गाड़ियों में सवार थे। सियारी गाँव के पास उनके सामने से एक टाटा सूमो कार आई जिसने उनका रास्ता रोक लिया। 
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सूमो कार में से कुछ लोग स्वचालित हथियारों के साथ बाहर निकले और राय की गाड़ी पर गोलियों की बारिश कर दी। क़रीब पाँच सौ राउंड गोलियाँ बरसाई गईं। पहली गाड़ी में सवार राय और उनके सारे सहयात्री मारे गये। पिछली गाड़ी में बैठे लोग जान बचाने के लिये गाड़ी छोड़कर भागे पर उनमें से एक  व्यक्ति भाग न सके और गोलियों से छलनी हो गये जिनकी बाद में अस्पताल में मौत हो गई।
इस लोमहर्षक सामूहिक नरसंहार से तहलका मच गया था। राजनैतिक तौर पर भी और सामाजिक तौर पर भी। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव सत्ता में थे और कृष्णानंद राय तब विपक्ष में बैठी बीजेपी के विधायक थे, साथ ही वह अगड़ों की एक प्रमुख जाति भूमिहार समाज के प्रतिनिधि भी थे। जो उत्तर प्रदेश में तो बहुत सीमित इलाक़े में है लेकिन बिहार में, राष्ट्रीय मीडिया में, देश की नौकरशाही व न्यायिक जगत में उसका बहुत प्रभाव है। 
दिल्ली स्थित सीबीआई की एक विशेष अदालत में चले इस सनसनीख़ेज़ और हाई प्रोफ़ाइल मुक़दमे का फ़ैसला सुनाया गया। अतिरिक्त सेशन जज अरुण भारद्वाज ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया। आरोपियों में से अफ़ज़ाल अंसारी सांसद हैं और मुख़्तार अंसारी विधायक, जिन पर इस हत्याकांड का षड्यंत्र रचने का आरोप था।
सांप्रदायिक आधार पर ज़बरदस्त और ख़तरनाक ढंग से विभाजित उत्तर भारत के लिये यह फ़ैसला समाज के बहुमत वाले हिस्से के लिये सदमे की तरह आया जो क्रिकेट समेत किसी भी मामले में यह बर्दाश्त करने की क्षमता खो चुका है कि कोई भी नतीजा उसकी इच्छा के विरुद्ध हो!
इसलिये बहुत ज़रूरी था कि क़रीब पौने पाँच सौ पृष्ठों में पसरे इस मुक़दमे के न्यायिक नतीजे को गंभीरता से बाँचा जाए। इस मामले की पहले थाने के स्तर पर फिर वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर उत्तर प्रदेश की पुलिस ने और बाद में न्यायालय के आदेश पर सीबीआई ने जाँच की। शुरू की चार्जशीट्स उत्तर प्रदेश पुलिस ने दाख़िल की थीं और बाद की सीबीआई ने। कृष्णानंद राय की पत्नी व अन्य परिजनों की अपील पर मामले की सुनवाई उत्तर प्रदेश की जगह दिल्ली में हुई।
मामले में कुल तेरह अभियुक्त बनाये गये थे। जिनमें से अफ़ज़ाल अंसारी और उनके भाई मुख़्तार अंसारी 2005 से जेल में ही रहे। संजीव माहेश्वरी उर्फ़ जीवा बीच में पकड़ा गया था लेकिन वह भी जेल में ही है। मुन्ना बजरंगी भी जेल में ही था और वहीं उसकी हत्या हुई। दो अभियुक्त पूरे मुक़दमे के दौरान फ़रार रहे। एक अभियुक्त अफ़रोज़ ख़ान पर क्लोजर रिपोर्ट लगी और बाक़ियों को ज़मानत मिल गई थी। 
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हत्या के मामलों में मोटिव यानि मंतव्य बहुत महत्वपूर्ण अवयव होता है। इस मामले में भी सीबीआई की टीम को ख़ासी मशक़्क़त करनी पड़ी। कहा गया कि राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता मुख्य कारक थी। मोहम्मदाबाद विधानसभा क्षेत्र से अफ़ज़ाल अंसारी लंबे समय तक विधायक रहे जिन्हें कृष्णानंद राय ने हराया था। अफ़ज़ाल के भाई मुख़्तार का क्रिमिनल गैंग है। दोनों के बीच 2004 में लखनऊ में गोलीबारी भी हुई थी जिसमें क्रास एफ़आईआर दर्ज हुईं थीं।

बचाव पक्ष के तर्क 

इस मामले के जवाब में बचाव पक्ष ने तर्क रखा कि 2004 में अफ़ज़ाल अंसारी ग़ाज़ीपुर से सांसद चुन लिये गये थे तो वह एक विधायक से हिंसक प्रतिद्वंद्विता में क्यों पड़े रहेंगे (उत्तर प्रदेश के एक संसदीय क्षेत्र में पाँच विधायकों के क्षेत्र सम्मिलित होते हैं)? अफ़ज़ाल इस चुनाव के पहले तमाम चुनाव लड़ चुके हैं जिनमें जीत-हार हुई ही है। उनमें से किसी प्रतिद्वंद्वी से कहीं कोई विवाद नहीं चल रहा है। यह भी तर्क रखा गया कि लखनऊ में मुख़्तार अंसारी के साथ हुई गोलीबारी में कृष्णानंद राय ही चार्जशीट हुए हैं जबकि अभियोजन ने मुख़्तार अंसारी के ख़िलाफ़ राय की शिकायत को ग़लत पाकर रद्द कर दिया है। 

बचाव पक्ष ने कोर्ट को बताया कि कृष्णानंद राय का आपराधिक अतीत है और वह हत्या के कम से कम तीन मामलों में अभियुक्त रहे थे।
बचाव पक्ष ने कहा कि 1974 में तीन लोगों की हत्या में राय मुख्य अभियुक्त रहे और जेल गये। इसके बाद रामनरायन राय उर्फ़ डब्लू पहलवान की हत्या में मुख्य अभियुक्त बने और 2005 में भी रमाकान्त भारती और अमरकान्त भारती हत्याकांड में भी मुख्य अभियुक्त थे। तुलनात्मक रूप से इन मामलों के पीड़ित पक्षों से कृष्णानंद राय की जान को ख़तरा होने की ज़्यादा संभावना है!

सीबीआई ने पेश किया गवाह

सीबीआई ने षड्यंत्र करने के सबूत के तौर पर प्रेमचंद राय नामक गवाह पेश किया था। जिसने अपनी गवाही में कहा था कि 25/10/2005 को वह ग़ाज़ीपुर कोर्ट में मौजूद था। जहाँ वह पारसनाथ राय के साथ गया था और विजय शंकर पांडेय नामक वकील से मिला था। वहाँ पर मीडिया से जुड़े व कई अन्य लोग मौजूद थे। मुख़्तार अंसारी किसी मामले में सरेंडर कर रहे थे, अफ़ज़ाल अंसारी भी वहाँ मौजूद थे। मुख़्तार ने वहाँ सबके सामने कहा था कि वह जेल इसीलिये जा रहे हैं कि कृष्णानंद राय को निबटाना है, अफ़ज़ाल अंसारी ने इस पर उनको हर तरह की मदद का भरोसा दिया था।

बचाव पक्ष ने जवाब में उस वकील विजय शंकर पांडेय को कोर्ट में पेश किया जिससे कोर्ट में मुलाक़ात की बात गवाह प्रेमचंद राय ने कही थी। पांडेय ने उस दिन प्रेमचंद से किसी मुलाकात को झूठ बताया। प्रेमचंद राय ने जिस पारसनाथ राय के साथ जाने की बात की थी, उसने बचाव पक्ष की ओर से कोर्ट में आकर गवाही दी कि उस तारीख़ को तो वह ग़ाज़ीपुर जेल में निरुद्ध था। जेल के जेलर ने भी इस बात की कोर्ट में पुष्टि कर दी। 
अफ़ज़ाल अंसारी ने सीबीआई द्वारा हासिल किये गये उनके सीडीआर का हवाला देकर बताया कि उस दिन वे ग़ाज़ीपुर नहीं बल्कि लखनऊ में थे। उन्होंने वहाँ अपने रक्त की जाँच करवाई थी। उस लैब के टैक्नीशियन ने भी इसकी पुष्टि की। उनके सरकारी गनर ने भी इसे सही बताया और सीबीआई ने माना कि सीडीआर के हिसाब से उनका फ़ोन उस दिन लखनऊ में ही उपयोग में था।
कृष्णानंद राय के भाई राम नरायन राय ने पुलिस में इस मामले की रिपोर्ट लिखाई थी। वह वकील भी हैं। उनके एक दूसरे भाई ब्रजेश कुमार राय ने भी गवाही दी कि घटना के समय वह और उनके वकील भाई राम नरायन राय पीछे वाली कार में थे और उन्होंने हमलावरों को कहते सुना था कि “मारो साले को, मुख़्तार भाई और अफ़ज़ाल भाई को बहुत तंग करता है!’’
पर इन दोनों के अलावा मामले के बाक़ी सभी गवाहों की गवाही और परिस्थितिजन्य सबूतों से यह तथ्य प्रकाश में आया कि वारदात के वक़्त ये दोनों भाई बनारस में थे। यह वारदात ढाई बजे दिन की है और ये लोग क़रीब नौ बजे शाम को गाँव लौट पाये, जहाँ शव रखे गए थे। इन्होंने मनोज सिन्हा (पूर्व केंद्रीय मंत्री) की प्रतीक्षा की और बाद में तमाम लोगों से पूरी रात सलाह-मशविरा कर अगले दिन एफ़आईआर दर्ज करवाई।
गवाहों की पूरी श्रृंखला ने इन दोनों भाइयों की मौक़े पर नामौजूदगी सिद्ध कर दी और केस धराशायी हो गया। जिरह के दौरान सीबीआई को दो गवाहों को होस्टाइल (विरोधी) घोषित करना पड़ा। 
बचाव पक्ष ने छोटी से छोटी कड़ी का ध्यान रखा। रिटायर हो चुके तब के एसडीएम, जेलर, थानाध्यक्ष, सीओ आदि की गवाही करवाई और केस का रुख़ ही बदल दिया।
मामले में एक सबूत उत्तर प्रदेश की एसटीएफ़ का था, जो ज़बरदस्त हो सकता था पर सीबीआई जैसी एजेंसी ने इसके साथ जाँच में न्याय नहीं किया। एसटीएफ़ तमाम अपराधियों पर नज़र रखती है, इसलिए वह ग़ाज़ीपुर जेल में तब बंद मुख़्तार अंसारी के फ़ोन को सुनती थी जिसका सिम उसके अनुसार किसी मोहम्मद ख़ान के जाली दस्तावेज पर लिया गया था। वारदात के दिन इस फ़ोन से 15.34 बजे (दोपहर 3.34) पर एक दूसरे माफ़िया सरगना अभय सिंह को फ़ोन गया जिसमें कहा गया कि काम हो गया। दुर्भाग्य से सीबीआई इस टेप की प्रापर सीडी कोर्ट में नहीं पेश कर सकी और न ही इस फ़ोन की उस दिन ग़ाज़ीपुर जेल में लोकेशन साबित कर सकी। इन सारे तथ्यों की रोशनी में पौने पाँच सौ पेज के इस आर्डर को पढ़ने के बाद आप वह नहीं कह सकते जो आपने अब तक कहा/ सोचा होगा!
शीतल पी. सिंह
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