तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसफ विजय की जीत के रणनीतिकार माने जाने वाले प्रशांत किशोर अब ख़ुद पहली बार चुनाव मैदान में उतर गए हैं। वे बिहार के बांकीपुर से विधानसभा का उप चुनाव लड़ेंगे। यह सीट बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन नवीन के इस्तीफ़े से ख़ाली हुई है। तमिलनाडु में चमत्कारी ढंग से विजय की पार्टी टीवीके की जीत के बाद प्रशांत किशोर ने खूब वाहवाही लूटी। 

वैसे इस तरह का चमत्कार वो बिहार, बंगाल, पंजाब और कई अन्य राज्यों में दिखा चुके हैं। उनकी रणनीति को क्षेत्रिय पार्टियों की जीत की गारंटी माना जाता है लेकिन उनकी अपनी जन सुराज पार्टी का रिकॉर्ड कुछ अच्छा नहीं रहा है। 2025 के विधान सभा चुनावों में उनकी पार्टी बड़े जोश खरोस के साथ पहली बार बिहार विधानसभा चुनाव में उतरी और बुरी तरह पराजित हुई। प्रशांत अब उप चुनाव में कौन कोई कमाल दिखा पाएंगे?
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दांव पर राजनीति

बांकीपुर उप चुनाव में प्रशांत किशोर के मैदान में आने से मुक़ाबला दिलचस्प ज़रूर हो गया है। क़रीब 35 वर्षों से इस सीट पर नितिन नवीन परिवार का कब्जा है। नितिन नवीन 5 बार और उनसे पहले उनके पिता 4 बार इस क्षेत्र से जीत चुके हैं। बीजेपी ने इस बार एक नया चेहरा अभिषेक कुमार को मैदान में उतारने की घोषणा की है। अभिषेक कुमार कायस्थ हैं और नितिन नवीन के करीबी माने जाते हैं। वे बीजेपी युवा मोर्चा के महानगर अध्यक्ष रह चुके हैं। आरजेडी ने अपने पुराने उम्मीदवार रेखा कुमारी गुप्ता को फिर टिकट दिया है जो 2025 के चुनाव में दूसरे नंबर पर रही थीं। 

2025 के चुनाव में बीजेपी के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन को इस क्षेत्र में 98,299 वोट मिले थे। उनका वोट शेयर लगभग 62.66% था। आरजेडी की रेखा कुमारी 46,363 के साथ दूसरे नंबर पर रही। लेकिन प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी की उम्मीदवार वंदना कुमारी को सिर्फ़ 7,717 वोट मिले थे। उनका वोट शेयर लगभग 4.9% था। ऐसे में चर्चा हो रही है कि जन सुराज के लिए अत्यंत कमज़ोर साबित सीट पर प्रशांत किशोर ख़ुद को दांव पर क्यों लगा रहे हैं। 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2025 के विधान सभा चुनावों में बुरी तरह हार के बाद प्रशांत किशोर का राजनीतिक भविष्य हाशिए पर जा चुका है। ऐसे में ख़ुद को रेलिवेंट बनाए रखना प्रशांत की सबसे बड़ी चुनौती है।

किंग मेकर सीट!

बांकीपुर, जिसका नाम पहले पटना वेस्ट था, बिहार का राजनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण सीट मानी जाती है। कहते हैं कि इस सीट से जीतने वाले के सिर पर ताज जरूर सजता है। नितिन नवीन इस सीट से विधायक बने। उसी से उनके बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष का रास्ता खुला। 1962 में इस सीट से कांग्रेस के कृष्ण बल्लभ सहाय जीते और बाद में मुखमंत्री बने। 1967 में इसी सीट से महामाया प्रसाद सिन्हा जीते और मुख्यमंत्री बने। 1977 में इस सीट पर बीजेपी के ठाकुर प्रसाद जीते, बाद में उन्हें राज्य में मंत्री बनने का मौक़ा मिला। वे बीजेपी के बड़े नेताओं में शुमार किए जाते हैं और उनके बेटे रविशंकर प्रसाद को भी केंद्र में मंत्री बनने का मौक़ा मिला। 

यह अलग बात है कि 2020 में मशहूर अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा के बेटे लव सिन्हा ने भी कांग्रेस का दामन थाम कर जीत की कोशिश की लेकिन वो असफल रहे। इस सीट पर कायस्थों का बोल बाला रहा है। अनुमान है कि इस क्षेत्र में कायस्थ क़रीब 13% के आसपास है लेकिन राजपूत: 8%, भूमिहार: 7%, ब्राह्मण: 5% मिलाकर सवर्ण आबादी करीब 35 प्रतिशत हो जाती है। 1995 के बाद से बीजेपी की जीत में सवर्ण मतदाता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं। दलित आबादी करीब 8%, मुस्लिम 8% और यादव 12% हैं। इसलिए आज कल मुक़ाबला बीजेपी और आरजेडी के बीच ही होता है। कुल मतदाता करीब 3.80 लाख हैं लेकिन 2025 के चुनाव में एक लाख 55 हजार यानी लगभग 41% ने ही मतदान किया।

जीत बनाम रणनीति

प्रशांत किशोर कई राज्यों में क्षेत्रीय नेताओं को रणनीतिकार के रूप में चुनाव जीतने में मदद कर चुके हैं। 2012 में गुजरात में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विधान सभा चुनाव से उनका रणनीतिकार का सफर शुरू हुआ। 2014 में उन्होंने नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय चुनाव अभियान का मोर्चा संभाला और देश भर में चर्चित हुए। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की चुनाव की रणनीति 2015 में प्रशांत किशोर ने ही बनायी थी। तब नीतीश बीजेपी का दामन छोड़ कर आरजेडी गठबंधन के साथ चुनाव लड़े थे। 

सबसे ताज़ा उदाहरण तमिलनाडु का है जहां नयी नवेली पार्टी टीवीके की जीत का सेहरा भी प्रशांत किशोर के सिर पर बांधा गया। प्रशांत अब तक नौ चुनावों की बागडोर संभाल चुके हैं जिसमें आठ में जीत मिली। लेकिन 2025 बिहार विधान सभा के चुनाव में प्रशांत किशोर की पार्टी को मतदाताओं ने नकार दिया। उसके बाद भी प्रशांत ने ऐसे क्षेत्र से चुनाव लड़ने का फ़ैसला लिया जिसे उनके अनुकूल नहीं कहा जा सकता है। इस सीट को बिहार में बहुत भाग्यशाली माना जाता है। कहा जा रहा है कि इस सीट के ज़रिये प्रशांत किंग मेकर से किंग बनने की तरफ़ कदम बढ़ाना चाहते हैं।