जंग हमेशा ज़रूरत की भाषा में शुरू होती है और पछतावे की भाषा में ख़त्म। ईरान के साथ मौजूदा टकराव इन दोनों सच्चाइयों को फिर से साबित करने की ओर बढ़ रहा है।
अमेरिका और इसराइल के हमले अब अदालतों, संसदों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बहस का विषय हैं। वॉशिंगटन में सांसद युद्ध शक्तियों के क़ानून पर भिड़ रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र में विद्वान पूछ रहे हैं कि आत्मरक्षा की सीमा पार हुई या नहीं। मानवीय क़ानून आसमान में किसी सख़्त मगर दूर बैठे अभिभावक की तरह मंडरा रहा है, याद दिलाता हुआ कि युद्ध के भी नियम होते हैं। लेकिन आम लोगों के लिए क़ानून कोई किताब नहीं, बल्कि पेट्रोल की क़ीमत है, भर्ती का नोटिस है, या तेहरान, तेल अवीव और दुबई में कांपते हाथ से भेजा गया वह संदेश है: मैं सुरक्षित हूँ।
समर्थक कहते हैं कि ईरान की मिसाइलें और उसके परछाईं नेटवर्क जवाब माँगते थे। विरोधी कहते हैं कि बिना साफ़ लक्ष्य के रोकथाम केवल बहाव है, रणनीति नहीं। सिर काटने वाले हमले हुक़्मरानों को गिरा सकते हैं, लेकिन मुल्कों को स्थिर नहीं कर पाते। बिना अंत की मंज़िल के युद्ध एक ऐसे दरवाज़े में बदल जाता है जिसमें दाख़िल होना आसान है, निकलना मुश्किल।
अमेरिकी संविधान ने युद्ध का अधिकार कांग्रेस को दिया ताकि राष्ट्रपति की भावनाएँ और महत्वाकांक्षाएँ काबू में रहें। बिना अनुमति के लंबे युद्ध क़ानून ही नहीं, उस ढाँचे को भी खोखला कर देते हैं जो रोकथाम के लिए बनाया गया था। कभी ईरान के साथ परमाणु समझौता हुआ था, निरीक्षण और राहत के ज़रिए। उसे छोड़कर ताक़त का रास्ता चुनना कठोरपंथियों को मज़बूत करता है और नियमों को कमज़ोर। दूसरी ओर, घरेलू आलोचक कहते हैं कि विदेशी युद्ध अक्सर जनता की नहीं, अभिजात वर्ग की सहमति से चलते हैं। यह चिंता लोकतंत्रों में गहरी है: बड़े फ़ैसले आम निगाह से दूर क्यों रहते हैं।
यह थकान केवल अमेरिका की नहीं। इसराइल और ईरान में भी लोग स्थायी आपातकाल से ऊब चुके हैं। जब जनता को लगता है कि युद्ध उनकी इच्छा नहीं बल्कि शासकों की ज़िद है, तो वह धारदार बारूद बन जाता है। दुनिया की अर्थव्यवस्था भाषण नहीं, जहाज़ों की आवाज़ सुनती है। होरमुज़ की खाड़ी से दुनिया का पाँचवाँ हिस्सा तेल गुजरता है। ज़रा सा अड़चन ही बाज़ारों को हिला देती है। अगर क़ीमत 130 डॉलर से ऊपर टिक गई तो मुंबई की थाली, नैरोबी का बस किराया और बर्लिन की हीटिंग सब महँगी हो जाएगी। महँगाई विचारधारा नहीं, गणित है।
संयुक्त राष्ट्र, जिसे कभी युद्ध की रफ़्तार रोकने के लिए बनाया गया था, आज कमज़ोर दिखता है। वीटो से फैसले ठहर जाते हैं। जाँच होती है, अमल नहीं। क़ानून बिना परिणाम केवल सपना है। सुधार संभव है—आपात बैठकें अपने आप बुलें, लोकतंत्रों में स्वतंत्र समीक्षा पैनल हों, हथियारों की बिक्री मानवीय नियमों से जुड़ी हो। ये युद्ध को ख़त्म नहीं करेंगे, पर शायद उसकी रफ़्तार धीमी कर दें। क्योंकि असली ईंधन है गति। सोशल मीडिया ग़ुस्से को सच से पहले फैला देता है। नेता दुश्मनों से नहीं, ट्रेंडिंग हैशटैग से भी जवाब देते हैं। झूठ मिसाइलों से तेज़ दौड़ता है।
ऐसे माहौल में सबसे क्रांतिकारी काम है ठहराव। अगर यह युद्ध सीमित रहा तो इतिहास इसे छोटा अध्याय कहेगा। अगर फैला- अगर परछाईं सेनाएँ भड़क उठीं, जहाज़ी रास्ते बंद हुए, रक्षा ढाल टूटी- तो यह लंबा और नुक़सानदेह हो सकता है। तेल की चोट अर्थव्यवस्था को मंदी में धकेल सकती है। मंदी राजनीति को उग्रता में। यह सिलसिला उतना ही पुराना है जितना भू-राजनीति।
सबसे डरावना है सुरक्षा की गोली नहीं, बल्कि पहरेदारों का गिरना। जब जनता को संविधान पर भरोसा नहीं रहता, जब अंतरराष्ट्रीय क़ानून ऐच्छिक लगता है, जब संस्थाएँ बेजान दिखती हैं, तो “ताक़त ही हक़ है” का मैदान फैलता है। लोकतंत्र इसी फैलाव को रोकने के लिए बना था। उसका वादा था कि युद्ध की क़ीमत जनता तभी चुकाएगी जब जनता की सहमति होगी। उसका भरोसा था कि नेता ताक़त के मालिक नहीं, संरक्षक हैं।
दुर्भाग्य यह है कि अभिजात वर्ग के फ़ैसले जनता और उसकी पीड़ा के बीच दूरी बढ़ा देते हैं। सुरक्षा के नाम पर छोड़ी गई मिसाइल उस मोहल्ले में गिर सकती है जिसने कभी उस रणनीति का नाम भी नहीं सुना। युद्ध नक़्शे, बजट और यादें बदल देता है। लेकिन वह सवाल नहीं मिटाता जो उससे पहले था: क्या यही अकेला रास्ता था? यह सवाल अदालतों में, संसदों में, तेल के बाज़ारों में, शरणार्थी शिविरों में गूँजता है। यह सायरन के बीच की ख़ामोशी में भी ठहरता है। और यह सवाल किसी जेट की आवाज़ में दबा नहीं जाना चाहिए।
(सतीश झा इंडियन एक्सप्रेस समूह और टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह के पूर्व संपादक हैं। उन्होंने फ्लेचर स्कूल ऑफ़ लॉ एंड डिप्लोमेसी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन किया और यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैरीलैंड में फ़ॉरेन पॉलिसी के फ़ोर्ड फ़ेलो रहे।)