सैन डिएगो के इस्लामिक सेंटर पर हुए भयावह हमले ने अमेरिका का सबसे अच्छा और सबसे बुरा- दोनों चेहरे सामने ला दिए। सबसे बुरा चेहरा घरेलू आतंकवाद, उग्र इस्लाम-विरोध (इस्लामोफोबिया) और मुसलमानों के खिलाफ नफ़रत फैलाने वाली भाषा के घातक परिणामों के रूप में सामने आया। वहीं सबसे अच्छा चेहरा उन पीड़ितों के साहस में दिखाई दिया जिन्होंने दूसरों को बचाने के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी, उन आपातकालीन कर्मियों की वीरता में दिखा जो मस्जिद की सुरक्षा के लिए तुरंत वहाँ पहुँचे, और उस समुदाय के धैर्य में झलका जो लगातार नफ़रत का सामना करने के बावजूद टूटने से इनकार करता है।
यह कोई सामान्य या आकस्मिक हिंसा की घटना नहीं थी। यह एक भयावह चेतावनी थी कि मुसलमानों के खिलाफ नफ़रत और इस्लामोफोबिया अमेरिकी राजनीति में गहराई तक जड़ें जमा चुके हैं और अब हिंसा तथा रक्तपात के घातक स्तर तक पहुँच चुके हैं।
18 मई को दो किशोरों ने सैन डिएगो के इस्लामिक सेंटर पर गोलियाँ चलाईं, जिसमें तीन लोगों की मौत हो गई और पूरे धार्मिक समुदाय में दहशत फैल गई। अधिकारी इस घटना की जाँच हेट क्राइम के रूप में कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार हमलावरों को इंटरनेट पर दूर-दराज़ के दक्षिणपंथी, श्वेत वर्चस्ववादी विचारों और इस्लाम तथा मुसलमानों के प्रति गहरी नफ़रत ने कट्टरपंथी बना दिया था।
अमेरिकी मुस्लिम समुदाय इस घटना से स्तब्ध और गहरे आतंक में है। बहुत से लोग पूछ रहे हैं—क्या यह एक अकेली घटना है या फिर अमेरिका में इस्लामोफोबिया के एक नए और अधिक हिंसक दौर की शुरुआत?
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मस्जिद परिसर में एक स्कूल भी था, जहाँ लगभग 140 बच्चे मौजूद थे। यह राहत की बात है कि वे सुरक्षित हैं, लेकिन उनकी असुरक्षा की कल्पना मात्र ही रोंगटे खड़े कर देती है। उन माता-पिताओं के भय की कल्पना करना कठिन नहीं है जो अपने बच्चों को इबादतगाह में शिक्षा पाने के लिए भेजते हैं और फिर यह महसूस करते हैं कि इतनी पवित्र और मासूम जगह भी नफ़रत का निशाना बन सकती है। दुखद यह है कि अमेरिका में धार्मिक स्थलों को निशाना बनाने की घटनाएँ बढ़ रही हैं। इस ख़तरे से निपटने के लिए एफबीआई को विशेष कार्यक्रम तक चलाने पड़ रहे हैं।
मृतकों की पहचान 51 वर्षीय सुरक्षा कर्मी अमीन अब्दुल्ला, 78 वर्षीय बुज़ुर्ग मंसूर काज़िहा और 57 वर्षीय पड़ोसी तथा उबर चालक नादिर अवाद के रूप में हुई है। तीनों को समुदाय के नायकों के रूप में याद किया जा रहा है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार संदिग्ध हमलावर 17 वर्षीय केन ली क्लार्क और 18 वर्षीय केलिब लियाम वाज़क्वेज़ थे, जो बाद में कथित रूप से स्वयं को गोली मारकर मृत पाए गए। मुझे आश्चर्य है कि मीडिया ने उन्हें आत्मघाती आतंकवादी क्यों नहीं कहा। स्पष्ट है कि वे अपने कृत्य के परिणामों का सामना करने के लिए तैयार नहीं थे।

उनकी कम उम्र इस भयावहता को और भी विचलित करने वाली बना देती है। सोशल मीडिया के कुछ एक्टिविस्ट और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों द्वारा इस्लाम के खिलाफ फैलाई जा रही नफ़रत युवा अमेरिकियों के मन में ज़हर की तरह काम कर रही है। यह उन्हें अमेरिकी सपने की तलाश से भटका कर आतंकवाद की राह पर धकेल रही है।

यह हमला केवल सैन डिएगो के मुस्लिम समुदाय की त्रासदी नहीं है; यह पूरे अमेरिका के लिए चेतावनी है कि जब नफ़रत भरी भाषा को सामान्य बना दिया जाता है, उसे बढ़ावा दिया जाता है और उसका प्रतिरोध नहीं किया जाता, तो उसके परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं।
यह त्रासदी मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से भी अत्यंत पीड़ादायक है। कई वर्ष पहले मैंने इसी इस्लामिक सेंटर में शुक्रवार का ख़ुत्बा (धार्मिक प्रवचन) दिया था। आज भी मुझे ऊँचे मंच से दिखाई पड़ने वाला मस्जिद का दृश्य स्पष्ट रूप से याद है। वह 11 सितंबर 2001 के हमलों के कुछ वर्षों बाद का समय था और मेरे प्रवचन का एक हिस्सा अमेरिका में बढ़ते इस्लामोफोबिया का मुकाबला करने पर केंद्रित था।
मुझे याद है कि कार्यक्रम के बाद समुदाय के कई लोग मुझसे मिले थे। उन्होंने इस मुद्दे को उठाने के लिए मेरा धन्यवाद किया था, लेकिन साथ ही यह भी कहा था कि उन्हें गहरी चिंता है कि इस्लामोफोबिया अमेरिका में तेज़ी से फैल रहा है।
सन् 2006 में, जब मैं ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन में था, तब मैंने अमेरिका में इस्लामोफोबिया के खिलाफ संघर्ष पर पहले बड़े राष्ट्रीय सम्मेलनों में से एक का आयोजन किया था। उस समय अमेरिकी सरकार के प्रतिनिधि इस बात से ही इनकार करते थे कि इस्लामोफोबिया जैसी कोई समस्या मौजूद है। आज शायद ही कोई सरकारी प्रतिनिधि इसके अस्तित्व से इनकार करे, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कुछ लोग स्वयं इस प्रवृत्ति का प्रतीक बन गए हैं।
कांग्रेस के कुछ सदस्य- रैंडी फाइन, चिप रॉय, एंडी ओग्ल्स, ब्रैंडन गिल और कीथ सेल्फ—इस्लाम और मुसलमानों के बारे में अश्लील, अपमानजनक, घृणित और अमानवीय टिप्पणियाँ कर चुके हैं या उनका प्रचार कर चुके हैं। वे केवल पूर्वाग्रह व्यक्त नहीं करते, बल्कि उसे वैधता प्रदान करते हैं।
टेक्सास के गवर्नर ग्रेग एबॉट पर भी अमेरिकी मुसलमानों ने इस्लामोफोबिक वक्तव्य देने के आरोप लगाए हैं, जिसके कारण मुक़दमेबाज़ी और राज्य सरकार तथा मुस्लिम समुदाय के बीच तनाव पैदा हुआ। ऐसा प्रतीत होता है कि इन नेताओं को न तो मतदाताओं का और न ही क़ानून का डर है। जब निर्वाचित नेता इतने खुले तौर पर और लगातार नफ़रत भरी भाषा का प्रयोग करते हैं, तो इस्लामोफोबिया का ज़हर पूरे देश में फैलता है।
हालाँकि कुछ अपवाद भी हैं। कैलिफ़ोर्निया के गवर्नर गैविन न्यूज़म और सैन डिएगो के मेयर टॉड ग्लोरिया सहित कई निर्वाचित नेताओं ने इस हमले की निंदा की। लेकिन ये प्रतिक्रियाएँ घटना के बाद आईं। इलिनॉय के सीनेटर डिक डर्बिन का उल्लेख न करना मेरे लिए अनुचित होगा, जिन्होंने अमेरिका में बढ़ते इस्लामोफोबिया पर सीनेट की सुनवाई आयोजित की थी। मुझे उस सुनवाई में अपनी गवाही प्रस्तुत करने का सम्मान मिला था।
मध्य पूर्व के संकट की छाया में अमेरिका के मुसलमान अब केवल छिटपुट घृणा-जनित घटनाओं का सामना नहीं कर रहे हैं; वे बढ़ते हुए संस्थागत और संरचनात्मक इस्लामोफोबिया का भी सामना कर रहे हैं।
काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस (सीएआईआर) के अनुसार देश भर में दर्ज शिकायतों की संख्या बढ़कर 8,683 के अभूतपूर्व स्तर पर पहुँच गई है। इनमें कार्यस्थलों पर भेदभाव, विचारों के आधार पर भेदभाव, तथा मुस्लिम समुदायों और फ़िलिस्तीन समर्थक आवाज़ों को निशाना बनाने वाली क़ानूनी कार्रवाइयों में 71.5 प्रतिशत की वृद्धि प्रमुख कारण हैं। ये आँकड़े दिखाते हैं कि इस्लामोफोबिया अमेरिकी सार्वजनिक जीवन का सामान्य हिस्सा बनता जा रहा है।
ट्रम्प प्रशासन ने हमले की निंदा तो की, लेकिन उसने उस व्यापक इस्लामोफोबिक माहौल का सामना नहीं किया जिसे उसके आंदोलन से जुड़े राजनेताओं और प्रभावशाली व्यक्तियों ने वर्षों से पोषित किया है। हिंसा की सामान्य निंदा आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं। नेताओं को उस नफ़रत भरी भाषा की भी निंदा करनी चाहिए जो हिंसा की ज़मीन तैयार करती है।
सैन डिएगो कोई अकेली घटना नहीं थी। इलिनॉय में 2023 में छह वर्षीय फ़िलिस्तीनी-अमेरिकी मुस्लिम बालक वादी अल-फ़यूमे की हत्या को याद कीजिए, जिसे जोसेफ़ ज़ुबा ने नफ़रत से प्रेरित उन्माद में 26 बार चाकू मारा था। इसी तरह 2015 में नॉर्थ कैरोलाइना के चैपल हिल में तीन मुस्लिम छात्रों की हत्या ने भी राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया था, लेकिन उसके बाद भी अधिकारियों की ओर से कोई स्थायी और गंभीर प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली।
2020 के चुनाव में अमेरिकी मुस्लिम समुदाय ने जो बाइडेन को उल्लेखनीय समर्थन दिया था। उनके प्रशासन ने इस्लामोफोबिया से लड़ने की बात भी की। 2023 में यहूदी-विरोध (एंटीसेमिटिज़्म) से निपटने की राष्ट्रीय रणनीति शुरू की गई और 2024 में इस्लामोफोबिया के खिलाफ रणनीति घोषित की गई।
लेकिन अंतर स्पष्ट था। एंटीसेमिटिज़्म के खिलाफ रणनीति समय रहते शुरू की गई, उसे ज़ोरदार राजनीतिक समर्थन मिला और उसे लागू भी किया गया। इसके विपरीत इस्लामोफोबिया-विरोधी रणनीति देर से आई, उसे अपेक्षाकृत कम राजनीतिक महत्व मिला और वह बड़े पैमाने पर प्रतीकात्मक तथा अधूरी ही बनी रही।
मुसलमान भी क़ानून के तहत समान सुरक्षा के अधिकारी हैं। जिस तरह इस देश में यहूदी-विरोध बढ़ रहा है, उसी तरह इस्लामोफोबिया भी बढ़ रहा है। अमेरिकी मुसलमानों का प्रश्न सीधा है—क्या इस्लामोफोबिया के पीड़ितों को भी वही तत्परता, सहानुभूति और सुरक्षा मिल रही है जो एंटीसेमिटिज़्म के पीड़ितों को मिलनी चाहिए और मिलती है?
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हमारे नेता नफ़रत के एक रूप के खिलाफ इतनी दृढ़ता से लड़ सकते हैं, लेकिन दूसरे रूप के प्रति इतने नरम क्यों दिखाई देते हैं कि वह समर्पण जैसा लगने लगता है?
कोई भी लोकतंत्र अपनी नैतिक संवेदनशीलता में चयनात्मक नहीं हो सकता। यदि अमेरिका वास्तव में नफ़रत से लड़ने के प्रति गंभीर है, तो मुसलमान-विरोधी घृणा का मुकाबला भी उसी गंभीरता, संसाधनों और सार्वजनिक संकल्प के साथ किया जाना चाहिए, जिस तरह हर अन्य प्रकार के भेदभाव और कट्टरता का किया जाता है।
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं)