मिडिल ईस्ट में तेजी से बदलते हालात के बीच एक बड़ा सवाल उठ रहा है- ईरान के लगातार हमलों के बावजूद खाड़ी और अन्य अरब देश सीधे सैन्य जवाब क्यों नहीं दे रहे? अमेरिका और इसराइल की ओर से जहां अरब देशों पर सख्त रुख अपनाने का दबाव माना जा रहा है, वहीं जमीनी हकीकत कहीं ज्यादा जटिल दिखती है।

ईरान के हमले और बढ़ता तनाव

ईरान ने हाल के दिनों में खाड़ी क्षेत्र में कई जगहों पर बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन से हमले किए हैं।

  • 3 मार्च 2026 को सऊदी अरब की राजधानी रियाध में अमेरिकी दूतावास परिसर पर ड्रोन हमला हुआ, जिसके बाद दूतावास अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा।

  • 2 मार्च को सऊदी अरब के रास तनूरा स्थित आरामको तेल कंपनी और अन्य तेल प्रतिष्ठानों पर ड्रोन हमला हुआ।

  • बहरीन में अमेरिकी सैन्य हवाई अड्डे, तथा क़तर और कुवैत में भी ड्रोन हमलों की रिपोर्ट सामने आई।


ईरान का आधिकारिक रुख यह है कि वह केवल अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहा है, क्योंकि इन अड्डों से उसकी गतिविधियों की निगरानी की जाती है और उसके खिलाफ सैन्य दबाव बनाया जाता है। उसने अभी तक मिडिल ईस्ट के किसी भी देश की आबादी पर मिसाइल नहीं गिराई है। न ही आबादी में कहीं ड्रोन से हमला किया।
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अरब देशों की कड़ी निंदा- लेकिन सैन्य जवाब नहीं

बहरीन, जॉर्डन, कुवैत, क़तर, सऊदी अरब और यूएई ने संयुक्त बयान जारी कर ईरानी हमलों की तीखी आलोचना की है।
इन देशों ने कहा कि:

  • हमले क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा हैं

  • वे अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं

  • अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत उन्हें आत्मरक्षा का अधिकार है

  • फिर भी, सऊदी अरब सहित किसी भी खाड़ी देश ने अब तक प्रत्यक्ष सैन्य पलटवार नहीं किया है, हालांकि रियाद ने संकेत दिया है कि हालात बिगड़ने पर विकल्प खुले हैं।

आखिर क्या है अरब देशों की मजबूरी?

विश्लेषकों के अनुसार, इसके पीछे कई परतों वाली रणनीतिक और राजनीतिक वजहें हैं।

1. क्षेत्रीय युद्ध से बचने की कोशिश

  • खाड़ी देश अच्छी तरह जानते हैं कि ईरान से सीधी लड़ाई पूरे मिडिल ईस्ट को बड़े युद्ध में झोंक सकती है

  • ईरान के पास लंबी दूरी की मिसाइल क्षमता

  • क्षेत्र भर में ईरान के सहयोगी या प्रॉक्सी नेटवर्क (हिजबुल्लाह, हूती, रसिस्टेंस फोर्स)

  • ईरान के पास समुद्री रास्तों को बाधित करने की क्षमता, होर्मुज जलडमरूमध्य उसने बंद कर दिया है

इन सब कारणों से जोखिम बहुत बड़ा है।
2. घरेलू राजनीतिक दबाव का डर
हालांकि शिया-सुन्नी मतभेद ऐतिहासिक रूप से मौजूद रहे हैं, लेकिन मौजूदा माहौल संवेदनशील है। तमाम देशों में यह भेद मिट गया है। दोनों समुदाय एक होकर अमेरिका-इसराइल का विरोध कर रहे हैं। भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश में तो सुन्नी-शिया मुसलमानों ने एकजुट होकर तमाम शहरों में प्रदर्शन किए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि:

  • ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद मुस्लिमों में भावनात्मक माहौल बना हुआ है

  • अगर अरब देश सीधे हमला करते हैं तो इसे “अमेरिका-इसराइल के साथ खड़ा होना” बताया जा सकता है

  • इससे अरब देशों के अंदर जनाक्रोश भड़कने का खतरा है। बहरीन में अपराइजिंग (विद्रोह) के हालात बन गए हैं

यानी मुस्लिम देशों में शासक वर्ग घरेलू स्थिरता को प्राथमिकता दे रहा है।
3. अर्थव्यवस्था और तेल कारोबार की चिंता

खाड़ी देशों की समृद्धि तेल निर्यात, समुद्री व्यापार और विदेशी निवेश पर टिकी है। सीधे युद्ध की स्थिति में खतरे:

  • होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा

  • तेल कीमतों में भारी बढ़ोतरी

  • निवेशकों का पलायन

  • ऊर्जा ढांचे पर हमले

यही वजह है कि वे “कैलिब्रेटेड रिस्पॉन्स” यानी नपी-तुली प्रतिक्रिया की नीति पर चल रहे हैं।
4. अमेरिका पर निर्भरता, लेकिन पूर्ण नियंत्रण नहीं

यह सही है कि खाड़ी देश सुरक्षा के लिए काफी हद तक अमेरिका पर निर्भर हैं, लेकिन वे पूरी तरह वाशिंगटन की रणनीति के अनुसार युद्ध में कूदना नहीं चाहते। उनकी प्राथमिकताएँ हैं:

  • अपनी जमीन पर युद्ध न फैले

  • बुनियादी ढांचा सुरक्षित रहे

  • क्षेत्रीय संतुलन बना रहे

इसलिए वे कूटनीतिक दबाव और रक्षा-तैयारी पर ज्यादा जोर दे रहे हैं।
5. ईरान की प्रतिशोध चेतावनी

ईरान ने खुली चेतावनी दी है कि अगर किसी अरब देश ने उस पर हमला किया तो वह सीधे उन देशों के शीर्ष नेतृत्व और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बना सकता है। अभी उसने इन देशों में सिर्फ अमेरिकी सैन्य सुविधाओं को निशाना बनाया है। यह बयान भी खाड़ी देशों की सावधानी बढ़ाने वाला कारक माना जा रहा है।

फिलिस्तीन फैक्टर भी अहम

मौजूदा युद्ध में फिलिस्तीन का सवाल महत्वपूर्ण हो गया है। ग़ज़ा में इसराइल ने 72 हजार बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की हत्या की। यह यूएन का आंकड़ा है। यूएन की संस्था इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (आईसीसी) ने इसराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू के खिलाफ वारंट जारी कर रखा है। ईरान शुरू से फिलिस्तीन का प्रमुख समर्थक रहा है और क्षेत्र में “रेजिस्टेंस एक्सिस” के समर्थन का दावा करता है। जब ग़ज़ा में नेतन्याहू नरसंहार करा रहे थे तब दुनिया के 56 मुस्लिम देश इसराइल-अमेरिका की निन्दा करने या चुनौती देने से बच रहे थे। उस समय सिर्फ ईरान खड़ा रहा। उसने आज से नहीं, 1979 से अब तक फिलिस्तीन के मुद्दे का समर्थन किया है। पूरी दुनिया के मुसलमानों ने ग़ज़ा नरसंहार के समय इस तथ्य को अपनी आंखों से देखा था। इस नैरेटिव के कारण अरब सरकारें खुलकर सैन्य कदम उठाने से पहले राजनीतिक जोखिम तौल रही हैं, ताकि व्यापक मुस्लिम जनमत उनके खिलाफ न जाए। 
अरब देशों की चुप्पी कमजोरी नहीं बल्कि सोची-समझी रणनीति का हिस्सा लगती है। वे एक ऐसे संतुलन पर चल रहे हैं जहां उन्हें अपनी सुरक्षा, घरेलू स्थिरता, आर्थिक हित और क्षेत्रीय राजनीति सबको साथ लेकर चलना है। अभी के लिए उनकी प्राथमिकता साफ है: युद्ध से बचो, लेकिन तैयार रहो।