असम में भी चुनाव से पहले बीजेपी ने वही ट्रिक चल अपना ली है जो उसने और नीतीश ने बिहार में महिलाओं के खाते में 10 हजार रुपये डालकर वोटों की लॉटरी लगाने का खेल किया था! असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने ऐलान किया है कि ओरुनोदोई योजना के तहत राज्य की करीब 40 लाख महिलाओं के बैंक खाते में 9 हजार रुपये सीधे ट्रांसफर हो गए। वह भी चुनाव से ऐन पहले। माना जा रहा है कि चुनाव आयोग इसी हफ़्ते राज्य में चुनाव की तारीखों की घोषणा कर सकती है। पहले बिहार में भी ऐसा ही हुआ था, जब नीतीश कुमार ने चुनाव से ऐन पहले महिलाओं के खातों में 10-10 हज़ार रुपये डाले थे।
तो असम में महिलाओं को यह राशि 10 मार्च को भेजी गई। कुल मिलाकर एक दिन में 3800 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड ट्रांसफर किया गया। यह राशि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर यानी डीबीटी के ज़रिए सीधे लाभार्थी महिलाओं के खाते में पहुंची। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा ने कहा कि यह सरकार की महिलाओं के प्रति संवेदनशील और दयालु नीति का प्रमाण है। मुख्यमंत्री कार्यालय ने एक्स पर पोस्ट किया कि राज्य भर में महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा और सम्मान मजबूत हुआ।
यह ट्रांसफर गुवाहाटी में केंद्रीय कार्यक्रम के दौरान हुआ। राज्य भर में 3800 से ज्यादा सार्वजनिक कार्यक्रमों में लाभार्थी महिलाएं वर्चुअली जुड़ीं। ये कार्यक्रम गांव पंचायतों, ऑटोनॉमस काउंसिल क्षेत्रों, गांव विकास समितियों और शहरी वार्ड कमेटियों में आयोजित किए गए। यानी इसका ख़ूब प्रचार भी किया गया।

ओरुणोदोई योजना क्या है?

ओरुणोदोई असम की बीजेपी सरकार की प्रमुख गरीबी उन्मूलन योजना है, जो 2020 में शुरू हुई। इस योजना के तहत हर पात्र परिवार की एक महिला को हर महीने 1250 रुपये मिलते हैं। यह राशि सीधे महिला के बैंक खाते में जाती है। योजना का मकसद आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को मजबूत बनाना, गरीबी कम करना और सामाजिक-आर्थिक समावेश सुनिश्चित करना है।
मुख्यमंत्री ने पहले घोषणा की थी कि चार महीनों- जनवरी से अप्रैल की राशि 5000 रुपये के साथ असमिया नववर्ष बोहाग बिहू के लिए अतिरिक्त राशि मिलाकर कुल 9000 रुपये मार्च में एक साथ दिए गए। इस बार बिहू बोनस 4000 रुपये का था। कुल मिलाकर राज्य में एक दिन में 3800 करोड़ रुपये ट्रांसफर हुए, जो असम में अब तक का सबसे बड़ा एकल दिवस डीबीटी है।

मुख्यमंत्री ने चुनावी पैंतरे से इनकार किया

कार्यक्रम के बाद पत्रकारों से बातचीत में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा ने कहा कि ओरुणोदोई योजना आगामी विधानसभा चुनाव से जुड़ी नहीं है। उन्होंने कहा, 'अन्य राज्यों की तरह यहां सामूहिक ट्रांसफर नहीं होता। यह योजना नियंत्रित है और सिर्फ खास श्रेणी की महिलाओं के लिए है। अगर चुनाव के लिए होती तो सभी को कवर किया जाता।'
उन्होंने आगे कहा, 'हम छह साल से बहुत संवेदनशीलता के साथ यह योजना चला रहे हैं। चुनाव हम नरेंद्र मोदी जी और बीजेपी की वजह से जीतते हैं, योजनाओं की वजह से नहीं। ये योजनाएं चलती रहती हैं। शायद कांग्रेस शासित राज्यों में भी ऐसी योजनाएं हैं।'

विपक्ष ने इसे चुनावी पैंतरा बताया है, लेकिन सरकार का कहना है कि यह महिलाओं की आर्थिक मदद और सम्मान के लिए है। असम में विधानसभा चुनाव जल्द होने वाले हैं, ऐसे में इस ट्रांसफर को चुनाव के लिए लुभावनी कोशिश क़रार दिया जा रहा है।

असम जैसी ही घोषणा बिहार और महाराष्ट्र में भी चुनाव से पहले हुई थी और इसके लिए काफी तीखी आलोचना हुई थी। बिहार और महाराष्ट्र में महिलाओं को पैसे देने वाली योजनाओं का मुद्दा काफी विवादास्पद रहा है, क्योंकि इन्हें चुनावी हथकंडा माना गया।

नीतीश ने 10 हजार रुपये क्यों बाँटे?

2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुमार सरकार ने मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत 1 करोड़ से ज्यादा महिलाओं के बैंक खातों में 10000 रुपये ट्रांसफर किए। यह योजना महिलाओं को अपना छोटा-मोटा बिजनेस शुरू करने के लिए लोन जैसी मदद देने के नाम पर थी, और यह पहली किस्त थी। लेकिन ट्रांसफर चुनाव की तारीखों के ऐलान के ठीक पहले या दौरान हुए, जिससे हंगामा मच गया। आरोप लगे कि यह महिलाओं के उत्थान के लिए नहीं, असल में यह चुनावी रणनीति का हिस्सा था। महिलाओं का वोटर टर्नआउट ज्यादा होता है और एनडीए को लगा कि इससे महिलाओं का समर्थन मिलेगा। चुनाव में एनडीए की बड़ी जीत को इसी से जोड़ा गया, क्योंकि महिलाओं ने ज्यादा वोट दिए।

नीतीश कुमार

महाराष्ट्र में लाडकी बहिन योजना में पैसे क्यों दिए गए?

महाराष्ट्र की महायुति सरकार ने मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना शुरू की, जिसमें गरीब महिलाओं को हर महीने 1500 रुपये मिलते हैं। बाद में 2100 रुपये बढ़ाने का वादा किया गया। यह 2024-25 में लॉन्च हुई और चुनावों से पहले बड़े पैमाने पर पैसे ट्रांसफर किए गए। दावा है कि यह महिलाओं की आर्थिक मदद के लिए है, जैसे घर चलाने में सहारा। लेकिन टाइमिंग चुनावी थी- विधानसभा चुनाव 2024 से पहले महिलाओं को लुभाने के लिए। योजना में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी भी सामने आयी और अयोग्य लोगों को करोड़ों रुपये बाँट दिए गए। पैसे वसूलने की बात भी सरकार ने कही। बाद में योजना की राशि नहीं बढ़ाए जाने पर भी विवाद हुआ। योजना से महाराष्ट्र में महिलाओं के वोट महायुति को मिले, लेकिन अब राज्य का कर्ज 9.3 लाख करोड़ तक पहुंच गया है और योजना पर खर्च बढ़ने से दूसरे विभागों में फंड की कमी हो रही है।

बीजेपी-चुनाव आयोग की आलोचना क्यों?

बिहार और महाराष्ट्र दोनों जगहों पर योजनाओं को 'स्टेट-स्पॉन्सर्ड ब्राइबरी' कहा गया- यानी टैक्स के पैसे से वोटरों को रिश्वत। बिहार में प्रशांत किशोर ने कहा कि महिलाएं डर से पैसे लेती हैं। महाराष्ट्र में भी फ्रॉड केस मिले, जैसे गलत लोग योजना में शामिल हो गए, और पैसा रिकवर करना पड़ रहा है।
तो चुनाव से ऐन पहले ये ट्रांसफर किए गए। बिहार में मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट लागू होने के बाद भी पैसे बांटे गए। महाराष्ट्र में हाल के सिविक पोल्स से एक दिन पहले 3000 रुपये देने का प्लान था, जो वोटरों को प्रभावित करने जैसा लगता है।
कुल मिलाकर आरोप लग रहे हैं कि ये योजनाएँ महिलाओं की मदद का नाम लेकर चुनावी फायदे के लिए इस्तेमाल हुईं। इसी वजह से चुनावी आचार संहिता उल्लंघन और पैसे के दुरुपयोग से विवाद बढ़ा। चुनाव आयोग पर सवाल उठे कि सत्ताधारी पार्टियों को फायदा क्यों दिया जाता है। हालाँकि, चुनाव आयोग ने इन आरोपों से इनकार किया।