असम विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले, चुनाव आयोग (ECI) ने राज्य की मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर सफाई अभियान चलाया है। विशेष संशोधन (Special Revision) के बाद जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची में 10 लाख 56 हजार 291 नाम हटा दिए गए हैं। अब राज्य में कुल रजिस्टर्ड मतदाताओं की संख्या 2 करोड़ 51 लाख 9 हजार 754 है। इसमें 93 हजार 21 'डी-वोटर्स' (संदिग्ध मतदाता) शामिल नहीं हैं, जिनकी नागरिकता पर सवाल उठाए गए हैं और उन्हें वोट डालने का अधिकार नहीं है।

आयोग के अधिकारियों के अनुसार, नाम हटाने के मुख्य कारण तीन हैं - मृत्यु, पता बदलना और डुप्लीकेट प्रविष्टियां। इनमें से करीब 4 लाख 78 हजार 992 नाम मृतकों के कारण हटाए गए, 5 लाख 23 हजार 680 मतदाता अपने पंजीकृत पते से कहीं और चले गए पाए गए, जबकि 53 हजार 619 प्रविष्टियां जनसांख्यिकीय समानता के कारण डुप्लीकेट मानकर सुधार या हटाई गईं।

यह विशेष संशोधन 22 नवंबर से 20 दिसंबर तक घर-घर सत्यापन अभियान के बाद पूरा हुआ। चुनाव कर्मियों ने राज्य भर में 61 लाख से अधिक घरों का दौरा किया और मतदाता विवरण की जांच की। अब ड्राफ्ट सूची जारी होने के बाद मतदाता 22 जनवरी 2026 तक दावे या आपत्तियां दर्ज करा सकते हैं। अंतिम मतदाता सूची 10 फरवरी 2026 को प्रकाशित की जाएगी।

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असम में अब कुल 31,486 मतदान केंद्र हैं, जो हालिया प्रक्रिया के बाद तय किए गए हैं। अन्य चुनावी राज्यों जैसे केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision - SIR) चल रहा है, लेकिन असम में अलग से विशेष संशोधन कराया गया। अधिकारियों का कहना है कि यह प्रक्रिया वार्षिक संक्षिप्त संशोधन और पूर्ण SIR के बीच की है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने पहले कहा था कि असम में नागरिकता संबंधी अलग प्रावधान हैं और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में नागरिकता सत्यापन प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है।

असम में विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) को लेकर विवाद मुख्य रूप से इसलिए है क्योंकि विपक्षी दल इसे अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर मुस्लिमों को मताधिकार से वंचित करने का एक माध्यम मानते हैं। असम में पूर्ण एसआईआर नहीं, बल्कि एक विशेष संशोधन (एसआर) लागू किया गया, जो चुनाव आयोग ने एनआरसी की अधर में लटकी प्रक्रिया का हवाला देकर चुना। विपक्ष का आरोप है कि यह प्रक्रिया सत्ताधारी दल को लाभ पहुंचाने के लिए की जा रही है, जैसा कि बिहार में एसआईआर के दौरान 68.6 लाख नाम हटाने पर हुआ था, जहां मार्जिनलाइज्ड समुदायों को निशाना बनाया गया। असम में भी, नागरिकता की चिंताओं के बीच यह संशोधन राजनीतिक फॉल्टलाइन्स को उजागर कर रहा है, जहां विपक्ष ने चुनाव आयोग के यू-टर्न पर सवाल उठाए हैं।

यह विवाद इसलिए और गहरा है क्योंकि असम की मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया नागरिकता सत्यापन से जुड़ी है, जो 1985 के असम समझौते से उपजी है। 93,021 डी-वोटर्स (संदिग्ध मतदाता) को मतदान का अधिकार नहीं है, हालांकि उनके नाम सूची में बने रहते हैं।

विपक्ष का दावा है कि यह अभियान मतदाता बहिष्कार का कारण बन रहा है, विशेषकर बंगाली मूल के हिंदू और मुस्लिम समुदायों को प्रभावित कर रहा है, जो पारंपरिक रूप से विपक्ष को वोट देते हैं। दिसंबर 2025 में घर-घर सत्यापन के बाद हटाए गए नामों में मृत्यु (4.78 लाख), पता बदलना (5.23 लाख) और डुप्लीकेट (53 हजार) शामिल हैं, लेकिन विश्लेषक इसे अधिकारों का उल्लंघन मानते हैं, क्योंकि कई मामलों में साक्ष्य की कमी या अनुपस्थिति के आधार पर नाम हटाए गए हैं।

93 हजार से अधिक डी-वोटर्स को मताधिकार से वंचित करना कई मानवाधिकार संगठनों और विपक्ष द्वारा अन्यायपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह प्रक्रिया 1997 से चली आ रही है और व्यक्ति पर नागरिकता साबित करने का बोझ डालती है। फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में मामलों की सुनवाई में देरी, असंगतियां और पूर्वाग्रह के आरोप लगते हैं, जिससे हजारों लोग सामाजिक कलंक, सरकारी लाभों से वंचित और कभी-कभी हिरासत का सामना करते हैं।

उदाहरणस्वरूप, असम विधानसभा के पहले डिप्टी स्पीकर मुहम्मद अमीरुद्दीन के 11 परिवार सदस्यों को भी डी-वोटर घोषित किया गया, जो प्रक्रिया की मनमानियों को दर्शाता है। विश्लेषक इसे लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाने वाला कदम बताते हैं, क्योंकि यह असम के नागरिकता संकट को बढ़ाता है, जहां एनआरसी की 19 लाख बहिष्कृत लोगों की स्थिति अभी अनिश्चित है।

सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में नागरिकता सत्यापन प्रक्रिया लगभग पूरी होने का दावा किया जा रहा है, लेकिन डी-वोटर्स के मामलों में न्याय की कमी विवादास्पद बनी हुई है। यह मुद्दा असम के 2026 विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक तनाव बढ़ा रहा है, जहां विपक्ष इसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ साजिश बताता है, जबकि सरकार इसे मतदाता सूची की शुद्धता के लिए आवश्यक मानती है। 

SIR क्या है?

विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision - SIR) एक गहन अभियान है जिसमें बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) द्वारा सभी पंजीकृत मतदाताओं का सत्यापन किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य डुप्लीकेट, मृत, स्थानांतरित और अवैध मतदाताओं को हटाना है। भारत में आखिरी बार ऐसा गहन संशोधन दो दशक पहले हुआ था।

इस साल बिहार में SIR को लेकर बड़ा विवाद हुआ था, जहां अंतिम सूची में 68.6 लाख नाम हटाए गए। विपक्ष ने आरोप लगाया कि यह मार्गिनलाइज्ड समुदायों को मताधिकार से वंचित करने की साजिश थी। SIR का दूसरा चरण नवंबर में अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, पुडुचेरी, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में शुरू हुआ। असम के लिए अलग से घोषणा की गई।

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चुनाव अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि संशोधन का लक्ष्य एक साफ-सुथरी और सटीक मतदाता सूची तैयार करना है, जिसमें पात्र नागरिकों को शामिल किया जाए, त्रुटियां सुधारी जाएं और अपात्र या डुप्लीकेट प्रविष्टियां हटाई जाएं। यह कदम आगामी चुनावों से पहले मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।