बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करने के साथ ही राजनीति का एक अध्याय ख़त्म हो रहा है। वो मुख्यमंत्री का पद अगले कुछ दिनों में छोड़ देंगे और एक नया मुख्यमंत्री आ जाएगा। बिहार के लिए ये एक सामान्य घटना नहीं है। ये सिर्फ़ नीतीश कुमार के क़रीब 19 साल पुराने शासन का अंत नहीं है, बल्कि इसके साथ ही राज्य से 1974 के छात्र आंदोलन से उपजे नेताओं का दबदबा ख़त्म हो जाएगा। 1974 के नेताओं में सिर्फ़ दो- लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँच पाए लेकिन 1990 के बाद क़रीब 35 सालों तक सरकार पर इस आंदोलन से निकले नेताओं का दबदबा रहा।

बिहार आंदोलन से निकले ज्यादातर नेता, जेपी, लोहिया और कर्पूरी ठाकुर के समाजवादी विचारों से प्रभावित थे। बीजेपी के साथ सरकार में रहने के बावजूद नीतीश को समाजवादियों का आख़िरी कड़ी कहा जाता है। जयप्रकाश नारायण उर्फ़ जेपी, डॉ. राम मनोहर लोहिया और कर्पूरी ठाकुर का समाजवादी सोच भी अब बिहार की राजनीति में आख़िरी सांस ले रहा है।

नीतीश कुमार का सुशासन

नीतीश कुमार ने 2005 में ‘सुशासन’ के नारे के साथ मुख्यमंत्री की दूसरी पारी शुरू की थी। इसलिए लंबे समय तक वो प्यार से ‘सुशासन बाबू’ भी पुकारे जाते थे। 1990 से 2005 तक लालू यादव के शासन को नीतीश और बीजेपी ने ‘जंगल राज’ का नाम दिया था। इसके मुक़ाबले नीतीश के राज को साफ़-सुथरा और व्यवस्थित कहा जा सकता है। लालू और नीतीश दोनों ने बिहार में सांप्रदायिक सदभाव क़ायम रखा।
बिहार के सीमा क्षेत्र के जिले जैसे किशनगंज, पूर्णिया और कटिहार मुस्लिम बहुल हैं। नीतीश ने बीजेपी के साथ रह कर भी अल्पसंख्यकों को भयभीत नहीं किया। अब लगभग तय है कि नया मुख्यमंत्री बीजेपी से होगा। सवाल ये है कि क्या नए दौर में बिहार का समाजवादी और धर्म निरपेक्ष सोच क़ायम रहेगा।

चंद्रगुप्त और चाणक्य!

वैसे तो नीतीश सन 2000 में पहली बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनकी पहली सरकार एक सप्ताह में ही गिर गयी। वो विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर पाए। इस पराजय ने नीतीश को एक नयी राजनीति से परिचित करा दिया। वो समझ गए कि लालू यादव की पिछड़ों की एकता पर कायम राजनीति को दो पाट किए बिना बिहार में पैर नहीं जमा सकते। बिहार में पिछड़ों की आबादी क़रीब 60 फ़ीसदी है। लालू उनके एकछत्र नेता थे। उसके साथ दलितों के एक बड़े वर्ग का समर्थन भी उन्हें प्राप्त था। लालू के दौर में यादवों का जबरदस्त दबदबा था।

सन 2000 के आते-आते अन्य पिछड़ी जातियों का लालू से मोह भंग होने लगा था। दलितों के नेता के रूप में राम बिलास पासवान स्थापित हो चुके थे। लेकिन ग़ैर पासवान, दलित जातियां उनसे ख़ुश नहीं थीं। नीतीश ने दलितों और पिछड़ों के बीच इस दरार को पहचाना और अति पिछड़ों और अति दलितों को अलग करके एक नयी राजनीति की शुरुआत कर दी।

नीतीश की राजनीति

2005 आते-आते सवर्ण लालू और उनके यादव राजनीति से परेशान हो चुके थे। क़ानून-व्यवस्था की स्थिति ये हो गयी थी कि शाम होने के बाद लोग राजधानी पटना में भी घर से बाहर निकलने से डरते थे। अति पिछड़ा, अति दलित और सवर्ण जातियों के नए गठजोड़ से 2005 में नीतीश सत्ता में आए तो फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 19 साल के सफ़र में उन्होंने 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। 7 बार बीजेपी और 3 बार बीजेपी विरोधियों के सहयोग से। नीतीश कभी भी अकेले बहुमत लाने की ताक़त नहीं बटोर पाए लेकिन यह तय था कि जिस गठबंधन में नीतीश, उसकी जीत। 2015 के विधान सभा चुनावों में उन्होंने बीजेपी का साथ छोड़ कर लालू के आरजेडी से गठबंधन किया तो मोदी लहर में भी उनका गठबंधन जीता। 

नीतीश ने अति पिछड़ों और अति दलितों को यादव और सवर्ण बहुल शासन में अलग पहचान दिलाई और इस वर्ग के एकछत्र नेता बन गए। 2015 के बाद उन्होंने महिलाओं पर ध्यान केंद्रित किया। एक तरफ़ पंचायती संस्थाओं में महिलाओं को आरक्षण और दूसरी तरफ़ राज्य में शराब बंद करके नीतीश ने जाति और धर्म से ऊपर महिलाओं का एक अलग वोट बैंक बना लिया। नीतीश की सफलता का बड़ा कारण ये था कि चाणक्य की तरह वो अपनी नीति बनाते हैं और चंद्रगुप्त की तरह ख़ुद उन्हें लागू भी कराते हैं। सत्ता में आने के बाद बीजेपी अति पिछड़ा, अति दलित और महिलाओं के वोट बैंक को कैसे संभालेगी ये एक बड़ा सवाल है।

सुशासन का सच!

नीतीश ने बिहार में अपराध पर नियंत्रण किया। उसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है। नीतीश के सत्ता में आने के पहले बिहार अपहरण, दिन-दहाड़े लूटपाट और खुलेआम हत्या के लिए मशहूर हो गया था। चारा घोटाला ने भ्रष्टाचार की सारी सीमाएँ तोड़ दी थीं। शुरू के 10 वर्षों के शासन में नीतीश ने बिहार के विकास को एक नयी दिशा दी। गाँवों तक सड़कें और नालियों का जाल बिछ गया। भ्रष्टाचार में कमी आई। लेकिन नीतीश विकास को उसके आगे नहीं ले जा सके। 2020 तक राज्य में भरपूर बिजली उपलब्ध हो गयी। बेहतर क़ानून व्यवस्था, सड़क, बिजली और उपयुक्त प्रतिभा को औद्योगिक विकास के लिए अनिवार्य माना जाता है। ये सब होने के बाद भी बिहार का विकास भंवर में फँसा हुआ दिखाई देता है।

व्यक्तिगत रूप से ईमानदार होने के बावजूद नीतीश पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान की तरह विकास को गति नहीं दे पाए। बिहार में नए उद्योग नहीं आए। यहाँ तक कि ज़रूरत के हिसाब से शिक्षा का तंत्र भी खड़ा नहीं हो पाया। पुराने उद्योग बंद होते गए। शिक्षा और रोजगार की तलाश में बिहारियों का अन्य राज्यों में पलायन बढ़ता गया। इसका मुख्य कारण ये है कि नीतीश ने राज्य में शिक्षा और उद्योगों के विकास के लिए कोई बड़ी पहल कभी की ही नहीं।

बिहार का विकास

बिहार में इंस्टिट्यूशनल एरिया या औद्योगिक क्षेत्र के विकास की कोई योजना दिखाई नहीं देती है। उत्तर प्रदेश में जैसे नोएडा, कानपुर और लखनऊ में बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बने, वैसा बिहार में कहीं नहीं है। इसका एक कारण तो ये लगता है कि नीतीश कभी भी कृषि आधारित अर्थ व्यवस्था को औद्योगिक अर्थ व्यवस्था में बदलना ही नहीं चाहते थे। 2015 में एक मुलाक़ात में उन्होंने मुझसे कहा था कि वो किसानों की जमीन के अधिग्रहण के ख़िलाफ़ हैं। उनकी सोच थी कि जिन्हें उद्योग लगाना हो वो ख़ुद किसानों से जमीन ख़रीदें। नीतीश की इस सोच के कारण शहरों का सुव्यवस्थित विकास भी नहीं हुआ। राजधानी पटना जैसे शहर भी दिल्ली के अनऑथोराइज़्ड कॉलोनियों की तरह लगते हैं। नयी सरकार के सामने ये एक बड़ी चुनौती होगी। पिछले विधान सभा चुनाव में ये मुद्दे तेज़ी से उभरे थे। यह अलग बात है कि लाभार्थी मतदाताओं, ख़ासकर जीविका दीदियों ने दस दस हज़ार पाने के बाद चुनाव के गणित को बदल दिया था।