बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर अब दो-चार दिन के मेहमान नीतीश कुमार और उनकी पार्टी के हमदर्दों के लिए यह शेर पेश किया जा सकता है:

वाए-नाकामी! मता-ए-कारवाँ जाता रहा,
कारवाँ के दिल से एहसास-ए-ज़ियाँ जाता रहा।
मोटे तौर पर इसका मतलब यह है कि बड़े अफसोस की बात है कि काफिले की सारी धन-दौलत लुट गई लेकिन उससे भी बड़े दुख की बात यह है कि काफिले के लोगों के दिल से अपनी बर्बादी का एहसास भी खत्म हो गया।
इस शेर को याद करने की फौरी वजह तो यह है कि जिस समय नीतीश कुमार राज्यसभा के सदस्य के रूप में शपथ लेने वाले थे, उससे ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने उस व्यक्ति को राष्ट्रपति की ओर से राज्यसभा के लिए मनोनीत करने की घोषणा की जिसके बारे में यह समझा जाता है कि उनसे नीतीश कुमार और उनकी पार्टी के लोग खुश नहीं थे। 2016 में जब मोदी सरकार ने नोटबंदी की घोषणा की थी तो जदयू इसके खिलाफ था लेकिन हरिवंश ने इसके समर्थन में लिखा था। इसके अलावा कई नीतिगत मामले ऐसे रहे हैं जिसमें हरिवंश भाजपा के ज्यादा नजदीक नजर आए हैं।
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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से पूर्व संपादक और दो बार नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड से राज्यसभा सदस्य चुने जाने वाले हरिवंश को मनोनीत सदस्य के रूप में नामित करने की घोषणा की गई। हरिवंश के बारे में यह माना जाता है कि बतौर संपादक उन्होंने नीतीश कुमार की तारीफ में कसीदे छापे और उनके हर अच्छे-बुरे काम का समर्थन किया। इसके बदले में नीतीश कुमार ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य बना कर नवाजा। नीतीश कुमार ने ऐसा एक बार नहीं बल्कि दो बार किया।
इस बीच हरिवंश राज्यसभा के उपसभापति भी बने और उन्होंने नीतीश कुमार से ज्यादा भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक समर्थक के रूप में काम किया। कहा जाता है कि यह बात नीतीश कुमार को नागवार लगी और इसलिए उनकी पार्टी ने उन्हें अब राज्यसभा नहीं भेजने का फैसला किया था जो उनका तीसरा कार्यकाल हो सकता था। ध्यान रहे कि हरिवंश का कार्यकाल 9 अप्रैल को खत्म हुआ। 10 अप्रैल को नीतीश कुमार राजसभा की सदस्यता की शपथ लेने वाले थे और उसी दिन राज्यसभा के मनोनीत सदस्य के रूप में हरिवंश के नाम की अधिसूचना जारी की गई। यह माना जाता है कि हरिवंश ने भारतीय जनता पार्टी के मुश्किल समय में इस तरह मदद की जो विपक्ष को बिल्कुल नापसंद थे।
पहले जदयू की ओर से यह तर्क दिया गया था कि उनकी पार्टी में किसी को लगातार तीन बार राज्यसभा भेजने की परिपाटी नहीं रही है, लेकिन यह तर्क इसलिए सही नहीं माना जा सकता क्योंकि उनकी ही पार्टी के रामनाथ ठाकुर को तीसरी बार राज्यसभा का सदस्य बनाया गया।
इससे साफ तौर पर यह माना जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी ने नीतीश कुमार और उनकी पार्टी की नागवारी की बिल्कुल परवाह नहीं की। वैसे तो भारतीय जनता पार्टी इस बात का दम भरने के लिए मशहूर है कि वह चौंकाने वाले फैसले लेती है लेकिन नीतीश की राज्यसभा सदस्यता की शपथ और हरिवंश को नामित करने की घोषणा केवल संयोग नहीं हो सकता।
हरिवंश का पूरा नाम हरिवंश नारायण सिंह है और वह उत्तर प्रदेश के राजपूत समाज से आते हैं लेकिन वह बिहार में पत्रकार और उससे भी ज़्यादा नीतीश कुमार के प्रशंसक के रूप में ही मशहूर रहे हैं। वैसे तो वह खुद को जातिवाद के खिलाफ बताते हैं लेकिन यह भी इत्तेफाक की बात है कि राजपूत समुदाय से आने वाले ही प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के वह मीडिया सलाहकार भी रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि जब जदयू ने उन्हें राज्यसभा नहीं भेजने का फैसला किया तो बिहार में यह चर्चा होने लगी कि राज्य से राजपूत जाति का कोई सदस्य राज्यसभा में नहीं होगा। कहा जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी ने इस शिकायत को दूर कर राजपूत समुदाय को खुश करने की कोशिश की है।
इस सिलसिले में और चर्चा से पहले यह बताना जरूरी है कि नीतीश कुमार कैसे अपनी सेहत से जूझ रहे हैं हालांकि आधिकारिक तौर पर यह बात नहीं मानी जाती। 10 अप्रैल को राज्यसभा सदस्य की शपथ लेने के बाद नीतीश ने जिस तरह का व्यवहार किया वह भी चर्चा का विषय है। उन्होंने कहा, “आपका नमन। प्रणाम सबको।” बाहर निकलने पर मीडियाकर्मियों से किन्हीं की तरफ इशारा करते हुए बोले, “तीन गो हैं आप। आपको प्रणाम कर रहे हैं। सुन नहीं रहे हैं। अरे, पहले तो हम यहीं न थे।”
कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधी टक्कर लेने वाले और भाजपा आरएसएस की विचारधारा के विरोधी रहे नीतीश कुमार की इन बातों से ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी और दुनिया में खोए हुए हैं। उन्हें इस बात का बिल्कुल एहसास नहीं है कि उन्होंने कैसे अपनी प्रतिष्ठा गंवा दी है। इसीलिए उनके प्रशंसक और विरोधी दोनों उनकी आलोचना करने से ज्यादा उनसे हमदर्दी जताते हैं।
यह मामला केवल हरिवंश के राज्यसभा सदस्य मनोनीत किए जाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह कई बातों का एक सिलसिला है जिसमें यह भी हुआ है। उदाहरण के लिए यह समझ जा रहा था कि नीतीश कुमार सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं लेकिन संभवतः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह इसके लिए तैयार नहीं हुए। साफ तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री नहीं ही बनेंगे लेकिन जिस तरह 10 अप्रैल को भाजपा कोर कमेटी की होने वाली बैठक टल गई उससे तो यही लगता है कि उनके नाम पर नीतीश कुमार की मुहर को भाजपा ने अब तक नहीं माना है।
नीतीश कुमार की प्रतिष्ठा पर आंच आने वाली एक बात यह भी रही कि कि वह अपने बारे में खुद कम बोलते हैं और उन्हें चुप कराकर उनके कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा बात करते हैं। 9 अप्रैल को दिल्ली पहुंचे नीतीश कुमार से जब पत्रकारों ने बिहार के अगले मुख्यमंत्री के बारे में पूछना चाहा तो संजय झा ने उन्हें बोलने से रोकते हुए पत्रकारों से कहा, चलिए-चलिए। अब से कुछ साल पहले नीतीश कुमार के सामने संजय झा इस तरह की बात करने के बारे में सोच भी नहीं सकते होंगे। ध्यान रखने की बात यह है कि संजय झा भारतीय जनता पार्टी से जनता दल यूनाइटेड में आए थे और अब भी वह भाजपा की विचारधारा और नेताओं के करीब माने जाते हैं।
वैसे यह मामला केवल नीतीश कुमार की सेहत से नहीं जुड़ा है बल्कि उनके राजनीतिक पराभव में इसका ज़्यादा बड़ा रोल रहा है। 2020 के विधानसभा चुनाव में रामविलास पासवान की मौत के बाद उनके पुत्र चिराग पासवान ने जिस तरह अपने उम्मीदवार खड़े कर जदयू के उम्मीदवारों को हराने में बड़ी भूमिका निभाई, उस वक्त से ही नीतीश कुमार की प्रतिष्ठा धूल धूसरित हीनी शुरू हो गई थी। यह माना गया था कि चिराग पासवान को तब भारतीय जनता पार्टी का वरद हस्त प्राप्त था। नतीजा यह हुआ कि उस साल विधान विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार को केवल 43 सीटें मिलीं। इसके बाद नीतीश कुमार हर मामले में भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक विचारधारा के सामने हथियार डालते चले गए। ऐसा लगता है कि नीतीश कुमार अब पूरी तरह भारतीय जनता पार्टी की स्क्रिप्ट के अनुसार ही अपने कदम उठा रहे हैं।