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जज बोले- कोर्ट में भ्रष्टाचार, 11 जजों की बेंच ने आदेश निलंबित किया

पटना उच्च न्यायालय की 11 न्यायाधीशों की एक बेंच ने गुरुवार को साथी न्यायाधीश जस्टिस राकेश कुमार के उस आदेश को निलंबित कर दिया जिसमें उन्होंने एक अग्रिम ज़मानत मामले पर फ़ैसला सुनाते हुए न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का आरोप लगाया था। बेंच ने कहा कि इस आदेश से न्यायपालिका की गरिमा और प्रतिष्ठा गिरी है, संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति से ऐसी अपेक्षा नहीं होती है। बता दें कि न्यायमूर्ति राकेश कुमार ने एक फ़ैसले में लिखा था, ‘लगता है हाईकोर्ट प्रशासन ही भ्रष्ट न्यायिक अधिकारियों को संरक्षण देता है।’

बेंच ने कहा कि न्यायमूर्ति कुमार का आदेश, ‘न्यायपालिका में जनता के विश्वास को डिगाने वाला है और इसके सम्मान को उस हद तक कम करने वाला है जिसे अवमानना भी माना जा सकता है’।

न्यायमूर्ति कुमार बुधवार को सरकारी पैसे के दुरुपयोग करने के आरोपी पूर्व आईएएस अधिकारी केपी रमैया की अग्रिम ज़मानत याचिका की सुनवाई कर रहे थे। इस दौरान न्यायमूर्ति कुमार ने कहा कि वह ‘मूकदर्शक’ नहीं बने रहेंगे। उन्होंने कहा कि वह अपने आदेश को उच्चतम न्यायालय, प्रधानमंत्री कार्यालय और क़ानून मंत्रालय को पंजीकृत डाक से भेजना चाहते हैं।

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60 वर्षीय न्यायमूर्ति कुमार को 25 दिसंबर 2009 को पटना उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया और 24 अक्टूबर 2011 को उन्होंने स्थायी न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। उच्च न्यायालय की वेबसाइट के अनुसार, उन्होंने पटना उच्च न्यायालय में आपराधिक और संवैधानिक मामलों में क़रीब 26 साल तक वकालत की है। उन्होंने क़रीब 12 साल तक सीबीआई के लिए पैरवी की।

अँग्रेज़ी अख़बार 'इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार, गुरुवार को न्यायमूर्ति कुमार के आदेश को लेकर 11 न्यायाधीशों ने अपने आदेश में कहा, ‘कोर्ट मास्टर ने यह भी कहा कि माननीय न्यायाधीश ने कुछ दिनों पहले अध्ययन के लिए फ़ाइल तलब की थी और उसका अध्ययन किया था। इसलिए, यह साफ़ है कि आदेश के पारित होने से कुछ दिनों पहले ही इसकी तैयारी शुरू हो गई थी।’

अख़बार के अनुसार, 11 जजों वाली बेंच ने कहा, ‘... उन्होंने अपने सहकर्मी जजों के ख़िलाफ़ तीखी टिप्पणी की है, जो वर्ष 1986 में लॉ कॉलेज से पास हुए थे। विवाद से इसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है और फिर एक क़दम आगे बढ़कर उन्होंने मुख्य न्यायाधीश की संगति में कुछ न्यायाधीशों के लिए अभद्र भाषा में टिप्पणी की है जिसका कोई आधार नहीं है। यह उस आदेश के बारे में पूरी व्याख्या है जिसने हमें इस मामले में आगे बढ़ने के लिए मजबूर किया है।’

बेंच ने कहा, ‘इस तरह की बात निश्चित रूप से कुछ निजी पूर्वाग्रहों का नतीजा है।’ बेंच ने यह भी टिप्पणी की कि यह आदेश देने का उद्देश्य एकाएक प्रसिद्धि पाना भी हो सकता है। 

बेंच ने कहा कि न्यायाधीश का पूरा आदेश ‘धर्मयुद्ध’ के नाम पर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन का एक ज्वलंत उदाहरण है। इसने यह भी टिप्पणी की कि न्यायाधीश ने ख़ुद को दूसरों के दृष्टिकोण के शिष्टाचार का ख़याल किए बिना सिर्फ़ अपनी सभी धारणाओं को सही माना है। बेंच ने कहा, ‘आदेश को देखने से लगता है कि विद्वान न्यायाधीश के व्यक्तिगत इंप्रेशन ही एकमात्र सच्चाई है और बाक़ी दुनिया समाज की बुराइयों से बेख़बर है।’ 

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सिंगल बेंच की सुनवाई पर रोक

इस पूरे मामले के बाद हाईकोर्ट के चीफ़ न्यायमूर्ति एपी शाही ने न्यायमूर्ति राकेश कुमार की सिंगल बेंच की सभी केसों की सुनवाई पर रोक लगा दी। मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि अगले आदेश तक न्यायमूर्ति कुमार सिंगल बेंच केसों की सुनवाई नहीं कर सकेंगे। चीफ़ न्यायमूर्ति ने उन्हें नोटिस भी जारी किया है।

न्यायमूर्ति कुमार ने क्या कहा था फ़ैसले में?

न्यायमूर्ति राकेश कुमार ने रमैया की अग्रिम ज़मानत की अर्जी खारिज की थी। उन्होंने आश्चर्य जताया कि हाईकोर्ट से अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी खारिज होने और सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिलने के बावजूद उन्हें निचली अदालत से बेल कैसे मिल गई? उन्होंने अपने आदेश में राज्य की निचली अदालतों और हाईकोर्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। ‘दैनिक भास्कर’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति कुमार ने कहा, ‘लगता है कि भ्रष्ट न्यायिक अधिकारियों को संरक्षण देने की परिपाटी हाईकोर्ट की बनती जा रही है। यही कारण है कि निचली अदालत के न्यायिक अधिकारी रमैया जैसे भ्रष्ट अफ़सर को जमानत देने की धृष्टता करते हैं।’

मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि न्यायमूर्ति कुमार ने कहा कि पटना सिविल कोर्ट में हुए स्टिंग ऑपरेशन के दौरान सरेआम घूस माँगते कोर्ट कर्मचारियों को पूरे देश ने देखा, लेकिन ऐसे भ्रष्टाचार में लिप्त कर्मियों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर तक दर्ज नहीं हुई। न्यायमूर्ति कुमार ने स्टिंग ऑपरेशन मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए पूरे प्रकरण की जाँच करने का निर्देश सीबीआई को दिया। उन्होंने जजों के सरकारी बंगले के रखरखाव पर होने वाले खर्च पर भी सवाल खड़े किए।

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