कोर्ट को जब बताया गया कि स्वतंत्र भारद्वाज के ख़िलाफ़ SC/ST एक्ट और POCSO एक्ट के तहत दो FIR दर्ज हैं तो बंद कमरे में सुनवाई हुई। एससी-एसटी एक्ट में गिरफ़्तारी हुई थी। पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने भारद्वाज की 'हेबियस कॉर्पस' याचिका को खारिज कर दिया था।
जंतर मंतर प्रकरण का बढ़ता घेरा
सीजेपी एक्टिविस्ट के पिता के साथ मारपीट करने और एससी-एसटी एक्ट में गिरफ़्तार स्वतंत्र भारद्वाज को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने तीन हफ्ते की अंतरिम जमानत दे दी है। भारद्वाज की गिरफ्तारी जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान कॉकरोच जनता पार्टी के एक नाबालिग प्रदर्शनकारी के पिता पर कथित हमले के मामले में हुई थी। इस मामले में दिल्ली पुलिस ने एससी-एसटी एक्ट की धाराएं भी जोड़ी थीं। भारद्वाज के ख़िलाफ़ POCSO एक्ट में भी मुक़दमा दर्ज किया गया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले भारद्वाज की 'हेबियस कॉर्पस' याचिका को खारिज कर दिया था।
हिंदुत्व एक्टिविस्ट स्वतंत्र भारद्वाज की गिरफ़्तारी तब हुई जब उसने एक पॉडकास्ट में मारपीट की बात खुलेआम कबूल की। भारद्वाज का दुस्साहस देखिए। एक पॉडकास्ट में खुलेआम कह रहा है कि एक प्रोटेस्टर के पिता का सिर फोड़ा, 60 टांके लगे थे। वह कह रहा है कि बंदा एंबुलेंस में मरने की स्थिति में था और धारा 307 के तहत हाफ मर्डर का मामला बनता था, फिर भी जेल नहीं गया। भारद्वाज यहाँ तक कहता है कि 'कपिल मिश्रा का कॉल आ गया तो छोड़ दिया गया। कपिल मिश्रा मेरे भाई हैं, चिराग पासवान भाई हैं, मोदी बड़े भाई हैं। ...हम बिना फॉर्म भरे दिल्ली पुलिस बनकर चलते हैं, हमारे पास सब है दिल्ली पुलिस का।'
बंद कमरे में सुनवाई
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि स्वतंत्र भारद्वाज के खिलाफ दो अलग-अलग एफ़आईआर दर्ज हैं। इनमें से एक एससी-एसटी एक्ट के तहत और दूसरी POCSO एक्ट के तहत दर्ज की गई है। इस जानकारी के बाद अदालत ने मामले की सुनवाई बंद कमरे में करने का फ़ैसला किया।
अदालत को यह भी बताया गया कि भारद्वाज की गिरफ्तारी एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज एफ़आई में हुई है, न कि POCSO मामले में। POCSO बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण देने वाला कानून है। चूँकि इस कानून से जुड़े मामलों में नाबालिगों की पहचान और मामले की संवेदनशील जानकारी की सुरक्षा अहम होती है, इसलिए अदालत ने बंद कमरे में कार्यवाही की।
हाई कोर्ट ने खारिज की थी हेबियस कॉर्पस याचिका
स्वतंत्र भारद्वाज ने अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की थी। हाई कोर्ट ने हाल ही में उनकी याचिका खारिज कर दी थी। हेबियस कॉर्पस ऐसी कानूनी याचिका होती है जिसके ज़रिए किसी व्यक्ति की हिरासत या गिरफ्तारी की वैधता को अदालत के सामने चुनौती दी जाती है।
हाई कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद भारद्वाज की ओर से निचली अदालत में जमानत की कार्यवाही आगे बढ़ी। अब पटियाला हाउस कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सौरभ प्रताप सिंह ललेर ने भारद्वाज को तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत देने का आदेश दिया।
हालाँकि, अदालत के विस्तृत आदेश का अभी इंतजार है। खास बात यह है कि भारद्वाज की ओर से अदालत में नियमित जमानत की मांग की गई थी, लेकिन अदालत ने फिलहाल उन्हें अंतरिम जमानत दी है।
गिरफ्तारी क्यों हुई?
स्वतंत्र भारद्वाज का यह पूरा मामला जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए एक प्रदर्शन से जुड़ा है। सीजेपी की ओर से प्रदर्शन एक नाबालिग कार्यकर्ता के पिता पर कथित हमले के मामले में स्वतंत्र भारद्वाज की गिरफ्तारी की मांग को लेकर किया गया था।
सीजेपी ने इस मामले में पुलिस से भारद्वाज के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने संबंधित एफ़आईआर में एससी-एसटी एक्ट और आपराधिक धमकी से जुड़ी धाराएं भी जोड़ीं। सीजेपी के मुताबिक़ प्रदर्शनकारी के पिता पर हमला किया गया था। इस मामले में भारद्वाज पर आरोप लगाए गए। बाद में उनके ख़िलाफ़ पोक्सो एक्ट के तहत भी एक मामला दर्ज किए जाने की जानकारी अदालत के सामने रखी गई।बुलंदशहर से हुई थी गिरफ्तारी
सीजेपी के प्रदर्शन के कुछ घंटों बाद स्वतंत्र भारद्वाज को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से हिरासत में लिया गया था। सीजेपी ने संसद मार्ग पुलिस स्टेशन के बाहर प्रदर्शन कर उनकी गिरफ्तारी की मांग की थी। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया और एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामले में गिरफ्तारी की।
भारद्वाज के खिलाफ कार्रवाई उस समय और ज्यादा चर्चा में आई जब उसका एक वीडियो पॉडकास्ट सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। इस वीडियो में उसने कथित तौर पर सीजेपी प्रदर्शनकारी के पिता पर हमला करने की बात कही थी। वीडियो में उसने राजनीतिक संपर्क होने का दावा भी किया था।
पॉडकास्ट में खुद को हिंदुत्व कार्यकर्ता बताने वाले स्वतंत्र भारद्वाज ने दावा किया था कि उसने नाबालिग प्रदर्शनकारी के पिता के सिर पर हमला किया था, लेकिन उसे जेल तक नहीं जाना पड़ा। उसने यह भी दावा किया कि उसे कुछ बीजेपी नेताओं का 'आशीर्वाद' और समर्थन प्राप्त है। वीडियो वायरल होने के बाद उसके खिलाफ कार्रवाई की मांग तेज हुई और मामला राजनीतिक तथा सोशल मीडिया बहस का हिस्सा बन गया।वकील ने जेल में हमले का ख़तरा बताया था
स्वतंत्र भारद्वाज की गिरफ्तारी के बाद उनके वकील पीयूष जैन ने उनके लिए जेल में सुरक्षा का मुद्दा उठाया था। उन्होंने एएनआई से बातचीत में दावा किया था कि भारद्वाज को जेल में कुछ 'राष्ट्र-विरोधी तत्वों' से हमले का खतरा है। जैन के मुताबिक़ पुलिस ने भारद्वाज को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत में पेश किया था और एक दिन की पुलिस हिरासत हासिल की थी।
उन्होंने कहा था कि इसके बाद मामला ड्यूटी मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के सामने था, जिनके पास इस मामले में जमानत याचिका पर सुनवाई करने का अधिकार नहीं था। उनके अनुसार, इसके बाद भारद्वाज को न्यायिक हिरासत में भेजा जाना था और एससी-एसटी मामलों के लिए निर्धारित विशेष अदालत में मामले की सुनवाई होनी थी।
सरकार से सुरक्षा की मांग
भारद्वाज के वकील ने केंद्र सरकार और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से भी जेल के भीतर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की थी। वकील ने दावा किया था कि उन्हें जानकारी मिली है कि जेल में भारद्वाज पर हमला किया जा सकता है और कुछ लोग सरकार को संदेश देने के लिए उन्हें निशाना बनाना चाहते हैं।हालांकि, इस तरह के सुरक्षा संबंधी दावों की स्वतंत्र पुष्टि की जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें भारद्वाज के वकील द्वारा लगाए गए दावे के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
अभी अदालत के सामने आरोपों की न्यायिक जांच जारी है। अंतरिम जमानत का मतलब यह नहीं है कि अदालत ने आरोपों को सही या गलत घोषित कर दिया है। भारद्वाज के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर अंतिम फैसला आगे की न्यायिक प्रक्रिया में ही होगा।