पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने पंचकुला प्लॉट मामले में हरियाणा के पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा और नेशनल हेराल्ड की प्रकाशक कंपनी एजेएल को बरी कर दिया है। अदालत को साजिश या नुकसान का कोई सबूत नहीं मिला।
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पूर्व हरियाणा मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) को पंचकूला में प्लॉट पुनः आवंटन मामले में बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने सीबीआई द्वारा लगाए गए आरोपों को खारिज कर दिया और दोनों पक्षों को सभी आरोपों से डिस्चार्ज कर दिया।
जस्टिस त्रिभुवन दहिया की बेंच ने बुधवार को फैसला सुनाते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से आरोपों के अपराध की सामग्री भी प्रथम दृष्टया नहीं बनती। कोर्ट ने सीबीआई की जांच और दृष्टिकोण को गैर-कानूनी और असंगत बताते हुए कहा कि आगे की कार्यवाही अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगी।
यह मामला सेक्टर-6, पंचकूला में प्लॉट नंबर C-17 से जुड़ा है, जो मूल रूप से 1982 में एजेएल (नेशनल हेराल्ड अखबार से जुड़ी कंपनी) को संस्थागत इस्तेमाल के लिए आवंटित किया गया था। निर्माण न करने के कारण 1992 में प्लॉट वापस ले लिया गया और अपील-रिवीजन 1995-96 में खारिज हो गई।
2005 में भूपेंद्र सिंह हुड्डा के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्लॉट को मूल दरों पर ही एजेएल को दोबारा आवंटित किया गया। यह आवंटन 16 मई 2006 को सक्षम अथॉरिटी द्वारा पूर्व प्रभाव से मंजूर (रैटिफाई) किया गया। एजेएल ने पूरी राशि जमा की और अगस्त 2014 में ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट भी प्राप्त कर लिया।
2014 में हरियाणा में बीजेपी सरकार आने के बाद इस पर कार्रवाई शुरू हुई। राज्य सतर्कता ब्यूरो ने एफआईआर दर्ज की, जिसे बाद में सीबीआई ने अपने हाथ में ले लिया। आरोप थे कि नियमों का उल्लंघन कर साजिश, धोखाधड़ी, पद का दुरुपयोग आदि किया गया और HUDA यानी हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण को वित्तीय नुकसान हुआ। अप्रैल 2021 में स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने आरोप तय किए थे, लेकिन हुड्डा की डिस्चार्ज याचिका खारिज कर दी गई थी।
हाई कोर्ट ने इन तमाम आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि कोई प्रथम दृष्टया सबूत नहीं है कि कोई साजिश थी या गलत लाभ-हानि हुई। प्लॉट का पुनः आवंटन सक्षम अथॉरिटी द्वारा सर्वसम्मति से मंजूर था और किसी अदालत या ट्रिब्यूनल ने इसे कभी अवैध घोषित नहीं किया। सरकारी ऑडिटरों ने भी वित्तीय नुकसान के आपत्ति को वापस ले लिया था।
कोर्ट ने कहा, "यह समझ से परे है कि जांच एजेंसी अपने आप प्लॉट आवंटन को अवैध मानकर आपराधिक मामला दर्ज कर ले। यह पूरी तरह गैर-कानूनी है।" फैसले में स्पष्ट किया गया कि हुड्डा ने आधिकारिक सलाह पर स्वतंत्र रूप से फैसला लिया और एजेएल के साथ किसी साजिश का कोई सबूत नहीं है।
वरिष्ठ अधिवक्ता आरएस चीमा, सरतेज सिंह नरूला और अरशदीप सिंह चीमा ने हुड्डा का पक्ष रखा। इस फैसले से हुड्डा को राजनीतिक रूप से संवेदनशील इस मामले में बड़ी जीत मिली है और उन पर लगे आरोपों का बोझ हल्का हो गया है।