चुनाव से ऐन पहले मोदी सरकार ने केरल का नाम ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी क्यों दी? फैसले के राजनीतिक और सांस्कृतिक निहितार्थ क्या हैं, और क्या इससे बीजेपी को चुनावी लाभ मिलेगा? पढ़िए पूरा विश्लेषण।
पिनराई विजयन और नरेंद्र मोदी
चुनाव से पहले केरल के लिए भी एक बड़ा फ़ैसला ले लिया गया। केंद्रीय कैबिनेट ने केरल राज्य का नाम आधिकारिक तौर पर 'केरल' से बदलकर 'केरलम' करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। यह फ़ैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में नई पीएमओ बिल्डिंग 'सेवा तीर्थ' में हुई कैबिनेट बैठक में लिया गया। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसकी जानकारी दी। यह लंबे समय से चली आ रही मांग को पूरा करने की दिशा में बड़ा क़दम है। कहा जा रहा है कि यह राज्य की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को मज़बूत करेगा। इसी वजह से इस फ़ैसले को चुनाव से भी जोड़कर देखा जा रहा है। तो क्या इस फ़ैसले का असर चुनाव पर भी पड़ सकता है?
वैसे, केरल का नाम बदलकर केरलम करने की मांग लंबे समय से की जा रही है, लेकिन यह मांग राजनीतिक स्तर पर ही रही है, कभी आंदोलन जैसा कुछ नहीं हुआ। केरल विधानसभा ने 2023 और 2024 में दो बार प्रस्ताव पास करके केंद्र सरकार से नाम बदलने की मांग की थी। दोनों प्रस्ताव मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने पेश किए थे।
विधानसभा के प्रस्ताव में क्या था?
24 जून 2024 को सर्वसम्मति से पास हुए दूसरे प्रस्ताव में कहा गया कि मलयालम भाषा में राज्य का नाम 'केरलम' है। 1 नवंबर 1956 को भाषाई आधार पर राज्यों का गठन हुआ था, जिसे 'केरल पिरावी' यानी केरल स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता है। लेकिन संविधान की पहली अनुसूची में नाम 'केरल' लिखा है। इसलिए संविधान में बदलाव की ज़रूरत है।
पहले प्रस्ताव में आठवीं अनुसूची की सभी भाषाओं में बदलाव की मांग थी, लेकिन बाद में पता चला कि सिर्फ़ पहली अनुसूची में ही बदलाव ज़रूरी है। इसलिए दूसरा प्रस्ताव पास किया गया।
केरल बीजेपी अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने भी पिछले महीने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर समर्थन दिया था।
'केरल' राज्य कैसे बना?
'केरल' या 'केरलम' नाम की जड़ें बहुत पुरानी हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार सबसे पुराना ज़िक्र अशोक के शिलालेख में 257 ईसा पूर्व में 'केरलपुत्र' के रूप में मिलता है, जो चेरा वंश के संदर्भ में है। ऐतिहासिक रूप से मलयालम बोलने वाले इलाक़े अलग-अलग मालाबार, कोचीन और ट्रावणकोर रियासतों में बँटे थे। 1920 के दशक में 'ऐक्य केरल' आंदोलन शुरू हुआ, जिसमें मलयालम भाषी लोगों के लिए एक अलग राज्य की मांग की गई। स्वतंत्रता संग्राम से प्रेरित होकर लोगों ने भाषा, संस्कृति और रीति-रिवाजों के आधार पर एकजुट होने की कोशिश की।स्वतंत्रता के बाद 1 जुलाई 1949 को ट्रावणकोर और कोचीन मिलकर ट्रावणकोर-कोचीन राज्य बने। फिर 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग ने मालाबार जिले और कासरगोड तालुक को शामिल करके केरल राज्य बनाने की सिफारिश की। दक्षिणी तालुक तमिलनाडु में चले गए।
राज्य का नाम बदलने की प्रक्रिया क्या है?
शहरों के नाम बदलने से अलग, राज्य का नाम बदलने के लिए संविधान संशोधन ज़रूरी है। राज्य सरकार प्रस्ताव भेजती है। गृह मंत्रालय जांच करता है और रेलवे, खुफिया ब्यूरो, डाक विभाग, सर्वे ऑफ इंडिया आदि से एनओसी लेता है। मंजूरी मिलने पर संसद में बिल पेश होता है। दोनों सदनों से पास होने और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद नाम बदल जाता है।
बीजेपी को कितना फायदा मिलेगा?
राज्य का नाम बदलने का यह फ़ैसला केरल विधानसभा चुनाव से पहले आया है, जो राज्य की सांस्कृतिक पहचान को मज़बूत करने वाला माना जा रहा है। लोग इसे अपनी भाषा और इतिहास से जुड़ाव का प्रतीक बता रहे हैं। तो इसका कितना फायदा बीजेपी को मिल सकता है? हालाँकि, यह बहुत बड़ा या निर्णायक फायदा नहीं होगा। यह फैसला सांस्कृतिक और भाषाई पहचान से जुड़ा है, जो मलयाली लोगों के लिए महत्वपूर्ण है, और बीजेपी इसे अपनी 'सांस्कृतिक सम्मान' वाली छवि के साथ जोड़ सकती है। बीजेपी को फायदा कैसे मिल सकता है?
केरल में मलयालम भाषा और संस्कृति बहुत मजबूत है। नाम 'केरलम' मलयालम में सही उच्चारण है, जो अशोक काल से जुड़ा है। बीजेपी इसे 'मलयाली गौरव' के रूप में प्रचारित कर सकती है। बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने समर्थन दिया था, और वे नेमोम सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं।
केरल में बीजेपी की पहले कोई सीट नहीं थी, लेकिन 2021 चुनाव में नेमोम में करीब से हार गई। हाल में तिरुवनंतपुरम, पलक्कड़ और त्रिपुनिथुरा में स्थानीय निकाय चुनावों में जीत मिली। तेलंगाना में भी हाल की जीत से 'साउथ सर्ज' का नैरेटिव बन रहा है । नाम बदलने का फैसला बीजेपी को 'केंद्र की ताकत' दिखाने का मौका देता है जो हिंदू वोटर्स और युवाओं को आकर्षित कर सकता है।
चुनाव से पहले यह फैसला बीजेपी को एलडीएफ़ और यूडीएफ़ के खिलाफ पॉजिटिव पॉइंट देता है। वे कह सकते हैं कि केंद्र ने केरल की मांग पूरी की, जबकि राज्य सरकार सिर्फ प्रस्ताव पास करती रही।
फिर भी बीजेपी की राह आसान नहीं?
केरल की राजनीति में बीजेपी की पकड़ कमजोर है। 2021 में सिर्फ 11% वोट मिले, कोई सीट नहीं। एलडीएफ़ और यूडीएफ़ का दबदबा है। नाम बदलना बड़ा मुद्दा नहीं बनेगा, क्योंकि यह सभी पार्टियों की सहमति से हुआ था।
सीपीएम और कांग्रेस कह सकती हैं कि यह उनकी मांग थी, केंद्र ने देर से मंजूरी दी। सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट्स में इसे 'नो चेंज स्टोरी' कहा गया, यानी कोई बड़ा बदलाव नहीं।
अन्य मुद्दे ज़्यादा अहम
चुनाव में बेरोजगारी, उद्योगों की हालत ख़राब, युवाओं का पलायन जैसे मुद्दे हावी रहेंगे। नाम बदलना सिम्बॉलिक है, लेकिन आर्थिक मुद्दों से ज़्यादा असर नहीं डाल सकता है।