मोदी सरकार ने 18 दिसंबर को पर्यावरण नीति में बदलाव कर दिया। इसमें गैर कोयला क्षेत्र के लिए खनन नीति बदल गई। इसका सीधा संबंध अरावली पहाड़ से भी है। इस नीति ने देश में पर्यावरण अभिमान (Environmental Impact Assessment) को कमजोर कर दिया।
ये अरावली पहाड़ है, जिसका दोहन कई दशक से हो रहा है। इसके जंगल खत्म किए जा रहे हैं
केंद्र की मोदी सरकार ने पर्यावरण संरक्षण के नियमों को और भी ढीला करते हुए गैर-कोयला खनन परियोजनाओं के लिए बड़ा बदलाव कर दिया। 18 दिसंबर 2025 को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने एक कार्यालय ज्ञापन (ऑफिस मेमोरैंडम) जारी कर ऐलान किया कि अब गैर-कोयला खनन परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय मंजूरी (एनवायरनमेंटल क्लीयरेंस) लेने से पहले भूमि अधिग्रहण का प्रमाण दिखाना अनिवार्य नहीं रहेगा। पहले की नीति के तहत कानून के अनुसार भूमि अधिग्रहण पूरा होने के बाद ही पर्यावरण मंजूरी मांगी जा सकती थी। इस बदलाव का सीधा असर अरावली के अलावा उन संवेदनशील प्रोजेक्ट पर पड़ेगा, जिनमें खनन की अनुमति अभी तक नहीं थी।
यह बदलाव प्रमुख खनिज खनन, स्लरी पाइपलाइन, वन्यजीव अभयारण्यों या संरक्षित वनों से गुजरने वाली परियोजनाओं, कोस्टल और तटीय तेल-गैस खोज, राजमार्गों और रेत, पत्थर जैसे लघु खनिजों की खुदाई जैसी परियोजनाओं पर लागू होगा। मंत्रालय का तर्क है कि विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी) की सिफारिशों पर यह कदम उठाया गया है, क्योंकि कई खनन परियोजनाओं में मंजूरी के बाद चरणबद्ध तरीके से भूमि अधिग्रहण होता है और भूमि मालिकों की सहमति को मंजूरी से जोड़ना व्यावहारिक नहीं है।
लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों और विपक्षी दलों का कहना है कि यह बदलाव पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (ईआईए) प्रक्रिया को पूरी तरह कमजोर कर देगा। कैसे कोई सार्थक पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन किया जा सकता है, जब परियोजना के लिए कवर की जाने वाली पूरी भूमि क्षेत्र की जानकारी ही उपलब्ध न हो? बिना सटीक भूमि विवरण के ईआईए रिपोर्ट अधर में लटक जाएगी, जो वनों की कटाई, जल स्रोतों के प्रदूषण, जैव विविधता के नुकसान और स्थानीय समुदायों के विस्थापन जैसे गंभीर मुद्दों को नजरअंदाज कर देगी। पर्यावरण नीति विश्लेषक चेतन अग्रवाल ने चिंता जताई है कि इससे भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया और लंबी हो सकती है, क्योंकि अब मंजूरी के बाद ही इसे शुरू किया जाएगा।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद जयराम रमेश ने इसे "मोदी शासन द्वारा जिम्मेदार पर्यावरण शासन को एक और झटका" करार दिया है। यह बदलाव मोदी सरकार की उस प्रवृत्ति का हिस्सा लगता है, जिसमें 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' के नाम पर पर्यावरण नियमों को लगातार कमजोर किया जा रहा है। हाल के वर्षों में ईआईए अधिसूचना 2006 में कई संशोधनों से परियोजनाओं को छूट दी गई, जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के लिए सार्वजनिक सुनवाई से छूट और छोटे खनन क्षेत्रों के लिए नियमों में ढील। अरावली क्षेत्र में खनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी यह कदम उठाया गया, जो संवेदनशील पारिस्थितिकी क्षेत्रों में खनन को बढ़ावा दे सकता है।
अरावली में खनन और मौजूदा बदलाव
अरावली पर्वत श्रृंखला दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है, जो दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक फैली हुई है। यह थार मरुस्थल के पूर्व की ओर फैलने को रोकती है, भूजल रिचार्ज करती है, जैव विविधता को संरक्षण देती है और दिल्ली-एनसीआर की हवा की गुणवत्ता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में अवैध और वैध खनन, शहरीकरण और पत्थर-रेत खुदाई से यह गंभीर खतरे में है।
लंबे समय से अरावली की परिभाषा अस्पष्ट थी, जिससे अलग-अलग राज्यों में खनन नियमों का दुरुपयोग हो रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने मई 2024 में एक समिति गठित की, जिसने अक्टूबर 2025 में रिपोर्ट सौंपी। 20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने समिति की सिफारिश स्वीकार की: अरावली पहाड़ी को "स्थानीय स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली भूमि" और अरावली रेंज को "500 मीटर के दायरे में दो या अधिक ऐसी पहाड़ियां" माना। कोर्ट ने नए खनन पट्टों पर रोक लगाई, जब तक सस्टेनेबल माइनिंग प्लान (MPSM) तैयार न हो।
पर्यावरणविदों और कार्यकर्ताओं का कहना: यह परिभाषा बहुत संकुचित है। इससे 90% से अधिक अरावली क्षेत्र (खासकर छोटी पहाड़ियां, ढलान और घाटियां) संरक्षण से बाहर हो जाएगा, जिससे बड़े पैमाने पर खनन संभव हो जाएगा। इससे थार के रेगिस्तान की बढ़ोतरी होगी।भूजल स्तर गिरेगा, दिल्ली की हवा और खराब होगी और जैव विविधता नष्ट होगी। राजस्थान में 12,081 पहाड़ियों में से सिर्फ 1,048 ही 100 मीटर से ऊंची हैं। नए घटनाक्रम से दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में बड़े पैमाने पर विरोध हो रहा है। सोशल मीडिया कैंपेन भी हो रहा है। विरोध बढ़ने पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसले पर रोक लगा दी। इसके बाद 24 दिसंबर 2025 को केंद्र ने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि अरावली में कोई नई खनन लीज नहीं दी जाएगी। संरक्षित क्षेत्र का विस्तार होगा।
बहरहाल, अरावली में अवैध खनन अभी भी समस्या है। राजस्थान और हरियाणा में अवैध खनन के हजारों मामले दर्ज हैं। कई पहाड़ियां पूरी तरह गायब हो चुकी हैं।
सरकार का नीति बदलाव खनन कंपनियों को फायदा पहुंचाएगा, लेकिन देश की पर्यावरणीय सुरक्षा और स्थानीय आदिवासी-ग्रामीण समुदायों के अधिकारों पर भारी पड़ सकता है। क्या विकास के नाम पर पर्यावरण को बलि चढ़ाना जारी रहेगा?