कांग्रेस ने कहा है कि ट्रंप प्रशासन भारत के ख़िलाफ़ 100% टैरिफ़, H1b वीजा पर सख्त कदम उठा रहा है, जबकि मोदी सरकार यूपीआई पर शुल्क लगाकर अमेरिकी कंपनियों से जुड़े पेमेंट प्लेटफॉर्म- फोन पे, गूगल पे और अमेज़न पे को फायदा पहुँचा रही है।
कांग्रेस का यूपीआई शुल्क के लिए मोदी सरकार पर हमला
कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने अमेरिकी दबाव में यूपीआई भुगतान पर शुल्क लगाया है। पार्टी ने कहा है कि अमेरिकी कंपनियाँ पहले ही मुफ्त यूपीआई भुगतान पर आपत्ति जताती रही हैं और अमेरिकी ट्रेड प्रतिनिधियों ने हाल के महीनों में ही भारतीय अधिकारियों के सामने इसे व्यापार बाधा के रूप में पेश किया था। पार्टी का कहना है कि एक तरफ़ ट्रंप प्रशासन भारत के ख़िलाफ़ 100% टैरिफ़ लगाने की तैयारी में है और H1b वीजा पर सख्त कदम उठा रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ मोदी सरकार यूपीआई पर शुल्क लगाकर अमेरिकी कंपनियों से जुड़े पेमेंट प्लेटफॉर्म- फोन पे, गूगल पे और अमेज़न पे को फायदा पहुँचा रही है। कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया है कि फोन पे और गूगल पे की ही यूपीआई में 86 फीसदी हिस्सेदारी है।
राहुल गांधी ने यूपीआई भुगतान को लेकर आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री मोदी 'सीधे लेट गए हैं' और भारत के लोगों को 'यूपीआई टैक्स' लगाकर अमेरिकी कंपनियों को मुनाफ़ा कमाने का रास्ता खोल दिया है। राहुल ने कहा है कि 'मोदी जी, UPI टैक्स वापस लें। अभी।'
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पोस्ट में अमेरिकी कार्रवाई को मोदी सरकार की विदेश और आर्थिक नीति से जोड़ते हुए हमला किया। उन्होंने कहा कि अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में ऐसा विधेयक आगे बढ़ रहा है जिसमें भारत पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का रास्ता खुल सकता है। उनके मुताबिक, यह भारत के लिए गंभीर व्यापारिक खतरा है। रमेश ने इसके साथ भारतीय प्रवासियों और H-1B वीजा का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रंप प्रशासन भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए वीजा व्यवस्था को कठिन बना रहा है और नौकरी जाने की स्थिति में वीजा धारकों पर सख्ती बढ़ाई जा रही है।
इन आरोपों के साथ कांग्रेस ने सवाल उठाया कि जब अमेरिका भारत के खिलाफ व्यापार और आव्रजन संबंधी नीतियां कड़ी कर रहा है, तब भारत सरकार यूपीआई जैसे देश के अहम डिजिटल भुगतान ढांचे में बदलाव क्यों कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिकी कंपनियां लंबे समय से भारत की ज़ीरो-एमडीआर UPI व्यवस्था का विरोध करती रही हैं। उनके मुताबिक, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधियों की ओर से भी यूपीआई और RuPay के मुफ्त होने को लेकर आपत्ति जताई गई थी।
जयराम रमेश ने सवाल उठाया कि यूपीआई पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर क्यों तय किया गया है। उन्होंने इसकी तुलना डेबिट कार्ड के एमडीआर से करते हुए पूछा कि क्या यह अमेरिकी Visa और Mastercard जैसी कार्ड कंपनियों को यूपीआई के साथ मुकाबला करने का अवसर देने के लिए किया जा रहा है।
अमेरिकी कंपनियों को फायदा: सुप्रिया श्रीनेत
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सवाल उठाया कि नए एमडीआर से सबसे ज़्यादा फ़ायदा किन कंपनियों को होगा। उन्होंने फोनपे और गूगल पे का नाम लेते हुए दावा किया कि दोनों का यूपीआई बाजार में लगभग 86 प्रतिशत हिस्सा है। उनका तर्क है कि अगर एमडीआर से भुगतान इकोसिस्टम में अतिरिक्त राजस्व आएगा तो इसका फायदा बड़े पेमेंट प्लेटफॉर्मों की कमाई और वैल्यूएशन को हो सकता है। उन्होंने अमेजन पे का भी उल्लेख किया और इन प्लेटफॉर्मों को अमेरिकी कंपनियों से जुड़े पेमेंट कारोबार के रूप में पेश करते हुए आरोप लगाया कि भारतीयों से शुल्क के रास्ते अमेरिकी कंपनियों को फायदा पहुंचाया जा रहा है।यूपीआई के लिए संचालन पर आने वाले ख़र्च को लेकर सरकार के तर्क के जवाब में सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि "यूपीआई को चलाने के लिए हर साल 20700 करोड़ रुपये चाहिए। ऐसे में कई भक्त कह रहे हैं कि यूपीआई को चलाने के लिए पैसा नहीं है। लेकिन वित्त वर्ष 2025-26 में आरबीआई ने मोदी सरकार को 3 लाख करोड़ रुपये सरप्लस ट्रांसफर किए। देश के लिस्टेड बैंकों का मुनाफा 4.11 लाख करोड़ रुपये से ऊपर है। यूपीआई को चलाने वाली NPCI का Pre tax 1,888 करोड़ रुपये है। यानी आरबीआई जो पैसा सरकार को दे रहा है, उसके महज़ 7.2% हिस्से से पूरा यूपीआई चल जाएगा।"
UPI शुल्क में ट्रंप फैक्टर का आरोप क्यों?
सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि अमेरिकी पेमेंट कंपनियां भारत की ज़ीरो-एमडीआर नीति का विरोध करती रही हैं और अब मोदी सरकार ने उनके सामने 'सरेंडर' कर दिया है। कांग्रेस का कहना है कि इन घटनाओं से मोदी सरकार की अमेरिकी नीति पर सवाल उठते हैं। पार्टी का आरोप है कि सरकार अमेरिका के सामने सख्त रुख अपनाने के बजाय उसकी मांगों के अनुरूप नीतिगत बदलाव कर रही है।
देश में UPI भुगतान पर शुल्क लगाने को अमेरिका से जोड़कर इसलिए आरोप लगाया जा रहा है क्योंकि यह मुद्दा काफी पहले से अमेरिका उठता रहा है। यह भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता और Visa और Mastercard जैसी अमेरिकी कंपनियों की भारतीय बाजार में पहुँच का सवाल भी जुड़ा हुआ है।
यूपीआई पर अमेरिका की आपत्ति क्या?
2020 से भारत में यूपीआई पर ज़ीरो-एमडीआर व्यवस्था थी, यानी मर्चेंट से कोई शुल्क नहीं लिया जाता था। इससे यूपीआई और RuPay का तेजी से विस्तार हुआ। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय यानी USTR ने मार्च 2026 में भारत की डिजिटल पेमेंट नीतियों को विदेशी व्यापार बाधा करार दिया। उनका कहना था कि ये नीतियां UPI/RuPay जैसे घरेलू सिस्टम को फायदा पहुंचाती हैं और अमेरिकी कंपनियों को यूपीआई इकोसिस्टम में बराबर मौक़ा नहीं मिलता।
अमेरिका की यह आपत्ति तब थी जब अमेरिकी कंपनियों के यूपीआई प्लेटफॉर्म PhonePe और Google Pay ही UPI के 80% से ज्यादा ट्रांजैक्शन प्रोसेस कर रही थीं, फिर भी अमेरिका भारत में घरेलू नेटवर्क को प्राथमिकता दिए जाने पर आपत्ति जताता रहा।
व्यापार समझौते से जुड़ाव
भारत-अमेरिका व्यापार डील की बातचीत के दौरान डिजिटल क्षेत्र अमेरिकी मांगों में शामिल रहा। भारत ने पहले भी कुछ अमेरिकी मांगें मान ली थीं। इसी बीच यूपीआई पर एमडीआर की अनुमति देने वाला क़ानूनी बदलाव भी अहम हो जाता है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इसे अमेरिकी दबाव बताया था, जबकि सरकार ने किसी बाहरी दबाव से इनकार किया।अमेरिका ने सिर्फ भारत पर ही दबाव नहीं डाला। UPI जैसी कम लागत वाली ब्राजील की Pix व्यवस्था पर भी आपत्ति जताई और जुलाई 2026 में ब्राजील पर 25% टैरिफ लगाया। इंडोनेशिया, वियतनाम, तुर्की और चीन की घरेलू पेमेंट व्यवस्थाओं पर भी USTR ने इसी तरह के सवाल उठाए हैं। इन्हीं कारणों से अब मोदी सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि क्या यूपीआई पर शुल्क अमेरिका के दबाव में लगाया गया है।
2000 रुपये से ज्यादा के UPI भुगतान पर क्या बदला है?
एनपीसीआई के नए फ्रेमवर्क के मुताबिक़, 15 अक्टूबर 2026 से UPI से मर्चेंट भुगतान 2000 रुपये से अधिक होने पर 0.4 प्रतिशत शुल्क यानी एमडीआर लागू होगा। इसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये प्रति लेनदेन रखी गई है। यानी 75000 रुपये के भुगतान पर 300 रुपये एमडीआर बनता है और इससे ऊपर की राशि पर भी अधिकतम शुल्क 300 रुपये ही रहेगा। रेलवे, फ्यूल, टेलीकॉम और इंश्योरेंस जैसी कुछ श्रेणियों के लिए अलग फ्लैट पाँच रुपये शुल्क व्यवस्था रखी गई है। यह ग्राहक से सीधे लिया जाने वाला शुल्क नहीं है। सरकार के अनुसार, ग्राहक यूपीआई भुगतान के लिए कोई ट्रांजैक्शन शुल्क नहीं देगा। एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के बीच यूपीआई भुगतान भी मुफ्त रहेगा।
कांग्रेस का सबसे बड़ा राजनीतिक आरोप यही है कि यूपीआई पर एमडीआर लगाना भुगतान व्यवस्था की आर्थिक ज़रूरत नहीं है, बल्कि इसके पीछे अमेरिकी भुगतान कंपनियों के हित जुड़े हैं।पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन ने किया विरोध
ऑल इंडिया पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन ने यूपीआई भुगतान पर लगाए गए शुल्क का विरोध किया है। पेट्रोल पंपों पर 2000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर से पूरी छूट की मांग की है। एसोसिएशन के अध्यक्ष अजय बंसल ने बुधवार को इसको लेकर वित्त मंत्री को पत्र लिखा है।
एसोसिएशन ने कहा कि यूपीआई भुगतान पर लगाए जाने वाले शुल्क डीलरों की कमाई को सीधे प्रभावित करते हैं। डीलरों का मार्जिन लेनदेन मूल्य के प्रतिशत के बजाय निर्धारित होता है। पत्र में कहा गया, 'डीलर मार्जिन ऑयल मार्केटिंग कंपनियों द्वारा पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के मार्गदर्शन में तय किए जाते हैं और मुख्य रूप से प्रति लीटर आधार पर होते हैं, न कि लेनदेन मूल्य के प्रतिशत के रूप में। इसलिए डीलरों के पास लेनदेन मूल्य के अनुपात में अपनी कमाई बढ़ाने का कोई तंत्र नहीं है।' एसोसिएशन ने उल्लेख किया कि अक्टूबर 2017 के बाद से इन कमीशनों में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है, जबकि बिजली, मजदूरी और नियामक अनुपालन जैसे परिचालन खर्च लगातार बढ़ रहे हैं। तेल विपणन कंपनियों के साथ जारी बातचीत के बावजूद यह मुद्दा अनसुलझा है, जिससे डीलरों की कमाई बहुत कम रह गई है।
पत्र में कहा गया, 'डिजिटल भुगतान ने ईंधन खुदरा व्यापार में ग्राहक सुविधा, लेनदेन पारदर्शिता और परिचालन दक्षता को काफी बढ़ाया है। इसलिए पेट्रोलियम डीलरों को ऐसे डिजिटल लेनदेन को सुविधाजनक बनाने और प्रोत्साहित करने के लिए आर्थिक रूप से दंडित नहीं किया जाना चाहिए।'