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फ़ेसबुक हेट-स्पीच नियम विवादों में फँसी आँखी दास कौन हैं, धमकी क्यों मिली?

फ़ेसबुक इंडिया की पब्लिक पॉलिसी डायरेक्‍टर आँखी दास ने पुलिस से शिकायत की है कि उन्हें धमकियाँ मिल रही हैं और उनकी जान को ख़तरा है। द वाल स्ट्रीट जर्नल के इस ख़ुलासे के बाद आँखी दास विवादों में घिर गयी हैं कि उन्होंने बीजेपी के कुछ नेताओं की ऐसी पोस्ट को हटाने से मना कर दिया था, जो घृणा फैलाने वाली थीं। आँखी दास ने पुलिस को दी अपनी शिकायत में कुछ ट्विटर और फ़ेसबुक हैंडल का ज़िक्र किया है, जिनसे उन्हें कथित तौर पर धमकियाँ मिली हैं। हालाँकि पुलिस का कहना है कि शिकायत मिल गई है, लेकिन एफ़आईआर दर्ज नहीं की गई है और जाँच की जा रही है। 

आख़िर ये आँखी दास चर्चा में क्यों हैं? जिनका कल तक अधिकतर लोग नाम तक नहीं जानते होंगे वह आज राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में कैसे आ गईं? देश के मीडिया से लेकर अमेरिका के प्रतिष्ठित अख़बार ‘द वाल स्ट्रीट जर्नल’ तक उन पर लंबी-लंबी रिपोर्टें छाप रहा है। 

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वैसे तो आँखी दास 2011 से फ़ेसबुक इंडिया सहित दक्षिण और मध्य एशिया की पब्लिक पॉलिसी डायरेक्‍टर हैं, लेकिन सुर्खियों में इसलिए हैं कि एक रिपोर्ट में उनका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी बीजेपी से संबंध बताया गया है। ‘द वाल स्ट्रीट जर्नल’ की रिपोर्ट में यह कहा गया है कि दास ने पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को चुनावी मुद्दों पर सहयोग दिया। आँखी दास एक प्रसिद्ध वक्ता और स्तंभकार हैं। उन्होंने 12 मार्च 2017 को नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करते हुए एक लेख, 'प्रधान मंत्री मोदी और लोक प्रशासन की नई कला' लिखा। लेख प्रधानमंत्री मोदी की निजी वेबसाइट पर प्रकाशित है। अब आरोप लग रहे हैं कि आँखी दास की बहन रश्मि दास बीजेपी के छात्र संगठन एबीवीपी से जुड़ी रही थीं। इस पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कांग्रेस के प्रवक्ता अजय माकन ने भी कहा है कि 'हम भाजपा से पूछना चाहते हैं कि हमें बताएँ कि रश्मि दास, जो एबीवीपी की जेएनयू इकाई की अध्यक्ष थीं, उनका फ़ेसबुक इंडिया की सार्वजनिक निदेशक आँखी दास के साथ क्या संबंध हैं।'

आँखी दास के काम में फ़ेसबुक के लिए भारत सरकार से लॉबी करना भी शामिल है। यूज़र की संख्या के हिसाब से भारत फ़ेसबुक का सबसे बड़ा बाज़ार है। भारत में फ़ेसबुक के सबसे ज़्यादा 280 मिलियन यूज़र हैं जबकि अमेरिका में 190 मिलियन, इंडोनेशिया में 130 मिलियन, ब्राज़ील में 120 मिलियन और मेक्सिको में 86 मिलियन यूज़र हैं। भारत में फ़ेसबुक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 45 मिलियन लाइक्स हैं। यह दूसरे नेताओं से कहीं ज़्यादा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को भी 28 मिलियन ही लाइक्स हैं। 

आँखी दास इसलिए चर्चा में आई हैं क्योंकि 'द वाल स्ट्रीट जर्नल' की एक रिपोर्ट में उनका नाम उछला है। अख़बार की रिपोर्ट में साफ़-साफ़ लिखा है कि आँखी दास बीजेपी और हिंदुत्व समूहों से जुड़े नेताओं की नफ़रत वाली पोस्ट के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं होने देती थीं।

'द वाल स्ट्रीट जर्नल' की रिपोर्ट के अनुसार, आँखी दास की भूमिका उस टीम की निगरानी करने की थी जो यह तय करती है कि फ़ेसबुक पर कौन सी सामग्री की अनुमति दी जाए और कौन सी की नहीं। रिपोर्ट में फ़ेसबुक के पूर्व और वर्तमान कर्मचारियों के हवाले से कहा गया है कि इसी के दम पर दास ने बीजेपी और हिंदुत्व समूहों से जुड़े नेताओं की नफ़रत वाली पोस्ट के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में बाधा डाली। 

अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में उन नेताओं की पोस्ट का ज़िक्र भी किया है जिनमें कथित तौर पर फ़ेसबुक के कर्मचारियों ने आपत्ति की थी, लेकिन इन आपत्तियों को दरकिनार कर दिया गया था। ‘द वाल स्ट्रीट जर्नल’ के अनुसार, फ़ेसबुक के कर्मचारियों ने टी. राजा सिंह द्वारा भड़काऊ पोस्ट का मामला उठाया। राजा सिंह तेलंगाना में बीजेपी के विधायक हैं और वह अक्सर भड़काऊ बयान देने के लिए सुर्खियों में रहे हैं। 

‘द वाल स्ट्रीट जर्नल’ ने लिखा, 'फ़ेसबुक पोस्ट में टी. राजा सिंह ने कहा कि रोहिंग्या मुसलिम प्रवासियों को गोली मार दी जानी चाहिए, उन्होंने मुसलिमों को देशद्रोही बताया और मसजिदों को तोड़ने की धमकी दी।' अख़बार ने लिखा कि इस वर्ष के मार्च तक उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि सिंह ने न केवल कंपनी के हेट-स्पीच नियमों का उल्लंघन किया है, बल्कि वह फ़ेसबुक के डेंजेरस इंडिविजुअल यानी ख़तरनाक व्यक्ति बन गए हैं। यह वह स्थिति है जब फ़ेसबुक ऐसे व्यक्तियों पर प्रतिबंध लगाता है।

रिपोर्ट के अनुसार हालाँकि, आँखी दास ने राजा सिंह और तीन अन्य हिंदू राष्ट्रवादियों पर हेट-स्पीच नियमों को लागू करने का विरोध किया। फ़ेसबुक के कर्मचारियों ने आंतरिक तौर पर इन लोगों की पोस्ट को हिंसा भड़काने को लेकर आपत्तियाँ की थीं।

‘द वाल स्ट्रीट जर्नल’ की रिपोर्ट में पूर्व और वर्तमान कर्मचारियों के हवाले से दावा किया गया है कि आँखी दास ने फ़ेसबुक स्टाफ़ से कहा कि उल्लंघन करने वाले बीजेपी सदस्यों को दंडित करने पर 'देश में कंपनी की व्यावसायिक संभावनाओं को नुक़सान पहुँचेगा।' 

‘द वाल स्ट्रीट जर्नल’ की रिपोर्ट के अनुसार, 'फ़ेसबुक के एक प्रवक्ता एंडी स्टोन ने माना कि राजा सिंह को एक ख़तरनाक व्यक्ति के रूप में नामित करने के बाद जो राजनीतिक नतीजे आते उनकी चिंताओं को दास ने उठाया था। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि उनका विरोध ही सिंह के फ़ेसबुक पर बने रहने देने के लिए कंपनी के निर्णय के लिए एकमात्र कारण नहीं था।' प्रवक्ता ने यह भी कहा कि फ़ेसबुक अभी भी विचार कर रहा है कि राजा सिंह पर प्रतिबंध लगाना ज़रूरी है या नहीं। 

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उस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ‘द वाल स्ट्रीट जर्नल’ के सवालों के बाद राजा सिंह के अकाउंट से कुछ विवादास्पद पोस्टों को हटा लिया गया और उनके वेरिफ़ाइड ब्लू टिक को भी रद्द कर दिया गया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि फ़ेसबुक ने कुछ अन्य बीजेपी नेताओं की भी विवादास्पद पोस्ट हटाई हैं। इसमें कर्नाटक के सांसद और बीजेपी नेता अनंत कुमार हेगड़े शामिल हैं। ‘द वाल स्ट्रीट जर्नल’ ने हेगड़े के 'कोरोना जिहाद' वाली पोस्ट पर फ़ेसबुक से प्रतिक्रिया माँगी थी। 

फ़ेसबुक के एक पूर्व कर्मचारी ने 'द वाल स्ट्रीट जर्नल' को बताया, 'दास के नेतृत्व में टीम ने बीजेपी नेताओं की उन पोस्टों पर कोई कार्रवाई नहीं की जिनमें मुसलिमों पर जानबूझकर कोरोना वायरस फैलाने, राष्ट्र के ख़िलाफ़ साज़िश रचने और हिंदू से शादी कर 'लव जिहाद' अभियान चलाने का आरोप लगाया गया था।' 

चुनाव में भी हस्तक्षेप?

अख़बार ने यह भी कहा है कि दास ने पिछले साल चुनाव में बीजेपी का सहयोग किया था। फ़ेसबुक के एक पूर्व कर्मचारी के हवाले से ‘द वाल स्ट्रीट जर्नल’ ने लिखा है, 'पिछले साल अप्रैल में भारत के आम चुनाव में मतदान शुरू होने से कुछ दिन पहले, फ़ेसबुक ने घोषणा की कि उसने पाकिस्तान की सेना और बीजेपी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टी कांग्रेस से जुड़े अप्रमाणिक पेजों को हटा लिया है। लेकिन इसने यह नहीं बताया कि बीजेपी से जुड़े झूठी ख़बरें देने वाले पेजों को भी हटाया गया है, क्योंकि दास ने हस्तक्षेप किया था।'

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