फिल्म केरला स्टोरी 2 का विवाद सामने आने के बाद लव जिहाद पर फिर से लोगों का ध्यान गया है। लेकिन केरल में जहां से इस शब्द की शुरुआत हुई थी, देखते देखते देश में बीजेपी-संघ ने इसे मुद्दा बना दिया। लव जिहाद पर ज़मीनी हकीकत जानिएः
लव जिहाद के फर्जी अभियान को केरल की हादिया (दाएं) ने ध्वस्त किया था
केरला स्टोरी 2 ने लव जिहाद को अपनी फिल्म का आधार बनाया है। यानी केरल में गैर मुस्लिम लड़कियों को बरगला कर मुस्लिम लड़के उनसे शादियां कर रहे हैं। इसी को दूसरे शब्दों में लव जिहाद नाम दिया गया। लव जिहाद के खिलाफ बीजेपी शासित राज्यों ने कड़े कानून बनाए। वहां धर्मांतरण विरोधी कानून में इससे जुड़े पहलू जोड़े गए। लेकिन इन्हें हवा देने वाले निराश हैं। क्योंकि देशव्यापी हवा नहीं बन पा रही है। इसलिए अब फिल्म का सहारा लिया गया। द केरला स्टोरी की कहानी भी लव जिहाद और धर्मांतरण पर थी। अब केरला स्टोरी 2 में भी इसी का सहारा लिया गया। लेकिन तथ्य तो बोलते हैं। तथ्य सामने आते हैं तो लव जिहाद की सारी मुहिफ फर्जी साबित हो जाती है।
लव जिहाद की जमीनी हकीकत जानने के लिए तथ्यात्मक पड़ताल जरूरी है।
जनवरी 2020 में, राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने केरल सरकार को चेतावनी दी थी कि 'लव जिहाद' एक "टाइम बम" की तरह है जो केरल सरकार द्वारा कार्रवाई न किए जाने पर "फट" जाएगा। उन्होंने दावा किया कि हिंदू और ईसाई दोनों महिलाएं इस साजिश का शिकार हैं। भारत के सबसे पढ़े लिखे राज्य केरल में पिछले विधानसभा चुनाव में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया। बीजेपी को एक सीट भी नहीं मिली। अब केरल में फिर से विधानसभा चुनाव 2026 होने वाला है। उससे पहले प्रोपेगेंडा फिल्म केरला स्टोरी 2 फिर तैयार है। बीजेपी को लगता है कि लव जिहाद के खिलाफ फिल्म से केरल में हवा बदल जाएगी।
विडंबना ये है कि केरला स्टोरी 2 में जिन महिलाओं को लव जिहाद का शिकार बताकर पेश किया गया है, उनमें से एक भी केरल की नहीं है। सारी की सारी उत्तर भारत के हिन्दीभाषी राज्यों की हैं। फिल्म बनाने वाले ने डिसक्लेमर भी लगा रखा है कि कहानी काल्पनिक है। लेकिन मकसद तो लव जिहाद का संदेश देना है कि किस तरह देश में मुस्लिम लव जिहाद फैला रहे हैं।
तथ्य है कि केरल पुलिस और NIA ने 2009 से अब तक कई जांचें कीं। केरल पुलिस और बाद में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने विस्तृत जांच के बाद स्पष्ट किया कि उन्हें ऐसे किसी "संगठित अभियान" या "साजिश" का कोई सबूत नहीं मिला जिसे 'लव जिहाद' कहा जा सके।
केरल में शुरू हुआ यह नैरेटिव उत्तर भारत के बीजेपी शासित राज्यों के लिए एक मॉडल बन गया है। जिसे बीजेपी और आरएसएस तूल देने पर तुल गए हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों ने "धर्मांतरण विरोधी कानून" पारित किए। इन कानूनों का उपयोग अक्सर सहमति से बने अंतरधार्मिक संबंधों को निशाना बनाने के लिए खुलेआम किया जा रहा है। अंतरधार्मिक संबंधों को लव जिहाद का नाम देकर प्रचारित किया जा रहा है। अदालत बार-बार कह रही है कि आपसी सहमति से अंतरधार्मिक विवाह में ज़रा भी गलत नहीं है। लेकिन दक्षिणपंथी संगठन अदालत की भी सुनने को तैयार नहीं।
2020 में मोदी सरकार ने संसद को बताया था कि केंद्रीय एजेसियों द्वारा ‘लव जिहाद’ का कोई मामला दर्ज नहीं किया गया है। इसके बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए का बयान आया कि उसने लव जिहाद के 11 मामलों की जांच की, सारे मामले फर्जी पाए गए। 2020 में ही कानपुर में कथित ‘लव जिहाद’ मामलों की जांच कर रही एक विशेष जांच टीम (SIT) ने पाया कि 14 जोड़ों में से तीन एडल्ट थे जिन्होंने आपसी सहमति से विवाह किया था, जबकि बाकी 11 जोड़ों में लड़के अपने नाम, उम्र या धर्म छिपा रहे थे। 2021 में मुजफ्फरनगर एक सिख युवती से झूठी शिकायत लेकर लव जिहाद का मामला फर्जी साबित हो चुका है।
केरल की हादिया का दिलचस्प मामला
इस मामले की शुरुआत 2017 में हुई जब एर्नाकुलम के सामाजिक कार्यकर्ता राहुल ईश्वर ने एक वीडियो जारी किया। यह वीडियो मूल रूप से अगस्त 2017 में कोट्टायम की एक युवती का था। जो उनकी मुलाकात के दौरान रिकॉर्ड किया गया था। उसका नाम अखिला था। वो मेडिकल की पढ़ाई कर रही थी। 26 अक्टूबर 2017 को ईश्वर द्वारा सार्वजनिक किए गए इस वीडियो में युवती कहती हैं: "मुझे जल्द ही मारा जा सकता है, मेरे पिता मुझे मारते हैं। क्योंकि मैं एक मुस्लिम लड़के से शादी करना चाहती हूं।"
इसके बाद अखिला अशोकन कहलाने वाली इस युवती ने अपने माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध इस्लाम धर्म अपना लिया और मुस्लिम युवक से शादी कर ली। उसे हादिया नाम मिला। अब वो इसी नाम से जानी जाती है। हादिया उर्फ अखिला के मामले को आधार बनाकर बीजेपी और आरएसएस ने केरल सहित पूरे देश में संगठित रूप से लव जिहाद आरोप का अभियान चलाया। इसके लिए मुस्लिम युवकों को कटघरे में खड़ा किया गया।
इस मामले ने 2016-18 में एक तीखे राजनीतिक विवाद को जन्म दिया और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने एनआईए को जांच का आदेश दिया। अदालत ने एक कमेटी भी बनाई। इस टीम को केरल का दौरा करने और "पीड़िता से, समाज के विभिन्न वर्गों से और जहां उचित समझा जाए, संबंधित अधिकारियों से बातचीत करने" के लिए भेजा गया ताकि तथ्यों और परिस्थितियों का पता लगाया जा सके।
बिना सबूत के आरोप
6 नवंबर 2017 को हादिया से मिलने के बाद, कमेटी ने मीडिया को बताया कि हादिया सुरक्षित है और अपनी ससुराल में उसे किसी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ रहा है। उसे जबरन इस्लाम स्वीकार नहीं कराया गया। 8 नवंबर 2017 को 'द न्यूज मिनट' को दिए एक इंटरव्यू में सुप्रीम कोर्ट की कमेटी ने भी कहा कि हादिया के मामले में कोई 'लव जिहाद' नहीं है। सिर्फ लव है। जिसकी पुष्टि एनआईए जांच में भी हुई।
महाराष्ट्र की श्रद्धा वालकर का मामला
2022 में श्रद्धा वालकर की उनके लिव-इन पार्टनर आफताब अमीन पूनावाला द्वारा कथित हत्या के बाद से भाजपा इस मुद्दे पर मुखर रही है। सख्त कानूनों की मांग को लेकर सकल हिंदू समाज के बैनर तले महाराष्ट्र में लगभग 40 रैलियां आयोजित की गईं। भाजपा नेता मंगल प्रभात लोढ़ा ने कहा कि महाराष्ट्र में 1,00,000 से अधिक ‘लव जिहाद’ के मामले हैं। लेकिन उनके दावे की पुष्टि महारष्ट्र पुलिस या किसी अन्य एजेंसी नहीं की। स्पष्टता के अभाव के बावजूद, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में महाराष्ट्र सरकार ने इस मुद्दे का अध्ययन करने और अन्य भाजपा शासित राज्यों के समान कानूनों का आकलन करने के लिए एक समिति गठित की। ‘लव जिहाद’ के खिलाफ कानून बनाने के प्रस्ताव को सत्तारूढ़ गठबंधन के सहयोगी एनसीपी या केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले का समर्थन नहीं मिला।
यूपी में लव जिहाद के मामले
लव जिहाद के देशव्यापी आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे फर्जी मामलों की संख्या हजारों में हो सकती है। अकेले उत्तर प्रदेश में ही, पिछले साल जुलाई तक धर्मांतरण विरोधी कानून का इस्तेमाल करते हुए 835 मामले दर्ज किए गए, जिसके परिणामस्वरूप 1,682 गिरफ्तारियां हुईं। फिर भी, दोषसिद्धि यानी सजा किसी में भी नहीं हुई। सैकड़ों मामले अभी भी विचाराधीन थे। बहुत साफ है कि कथित धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के बहाने, यह कानून अंतरधार्मिक संबंधों विशेषकर मुस्लिम पुरुषों और हिंदू महिलाओं के बीच संबंधों पर निगरानी रखने का एक उपकरण बन गया है।
कई मामलों में, उत्तर प्रदेश पुलिस को प्रारंभिक जांच के बाद आरोप वापस लेने पड़े हैं, क्योंकि यह पाया गया कि मामले अतिरंजित या निराधार दावों पर आधारित थे। सुप्रीम कोर्ट ने भी धर्मांतरण विरोधी कानूनों के पक्षपातपूर्ण और अनुचित इस्तेमाल के लिए यूपी पुलिस की कई बार कड़ी आलोचना की है। मार्च 2025 में, तत्कालीन चीफ जस्टिस संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली एक बेंच ने एक असंबंधित मामले में इस कानून का इस्तेमाल करने के लिए राज्य अधिकारियों को फटकार लगाई थी।
अप्रैल 2025 में सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में कहा गया था कि उत्तर प्रदेश के कानून का इस्तेमाल अंतरधार्मिक जोड़ों - मुख्य रूप से हिंदू महिलाओं से शादी करने वाले मुस्लिम पुरुषों - को परेशान करने के लिए "हथियार" के रूप में किया गया है। कई मामले तीसरे पक्ष द्वारा दायर किए गए हैं, न कि स्वयं महिलाओं द्वारा।
स्पष्ट रूप से, ‘लव जिहाद’ एक अवैध, निराधार और आपत्तिजनक शब्द से अधिक कुछ नहीं है, जिसका उद्देश्य अंतरधार्मिक संबंधों को निशाना बनाना है। जबरदस्ती के बहुत कम साबित मामलों के चलते इसके लिए अलग कानून की शायद ही आवश्यकता बनती है। इसके बावजूद कई भाजपा शासित राज्यों को इस तथाकथित ‘समस्या’ से निपटने के लिए कानून लाने से नहीं रोका जा सका है।