क्या डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में भारत ईरान के चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट से बाहर हो गया है? कम से कम एक रिपोर्ट में कहा गया है कि चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट से भारत की दशकों पुरानी साझेदारी लगभग ख़त्म हो गई है। कांग्रेस ने कहा है कि ट्रंप के दबाव में नरेंद्र मोदी ने ईरान के चाबहार पोर्ट से अपना कंट्रोल छोड़ दिया है और चुपके से वेबसाइट भी बंद करवा दी। इसने प्रधानमंत्री पर हमला करते हुए कहा है कि नरेंद्र मोदी ने एकबार फिर से ट्रंप के आगे सरेंडर कर दिया है। इन रिपोर्टों पर विदेश मंत्रालय ने कहा है कि इस पर वह यूएस पक्ष के साथ बातचीत कर रहे हैं।

कांग्रेस ने ख़बरों का हवाला देते हुए कहा है कि इस बेहद महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट में मोदी सरकार ने देश की जनता के 120 मिलियन डॉलर लगाए थे और अब ये सब स्वाहा हो गए हैं। पार्टी ने आरोप लगाया है कि जब चाबहार पोर्ट का एग्रीमेंट हुआ था तो नरेंद्र मोदी ने कहा था कि इकोनॉमी से जुड़ा बहुत बड़ा काम हुआ है, ये मेरी बहुत बड़ी सफलता है। कांग्रेस ने पीएम पर चुप्पी साधने का आरोप लगाते हुए कहा है कि अब जब चाबहार पोर्ट का कंट्रोल छोड़ दिया है तो इसपर कुछ नहीं बोल रहे हैं।
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चाबहार भारत को अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया से एक अहम और सीधा समुद्री रास्ता देता है। इससे पाकिस्तान को बाईपास किया जा सकता है और चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का मुकाबला भी किया जा सकता है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि नरेंद्र मोदी ट्रंप के दबाव के आगे झुक गए और देश का नुकसान कर दिया। पार्टी ने दो बड़े सवाल पूछे हैं-
  • भारत की विदेश नीति अमेरिका के व्हाइट हाउस से क्यों तय की जा रही है? 
  • नरेंद्र मोदी, अमेरिका को भारत पर दबाव बनाने क्यों दे रहे हैं?

ट्रंप के टैरिफ के बाद हुआ फ़ैसला?

कांग्रेस ने ये आरोप तब लगाए हैं जब भारत और ईरान के बीच चाबहार पोर्ट को विकसित करने का 10 साल पुराना प्रयास अब लगभग पूरी तरह ख़त्म हो चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 12 जनवरी 2026 को घोषणा की थी कि जो भी देश ईरान के साथ व्यापार करेगा, उसे अमेरिका के साथ होने वाले सभी व्यापार पर 25 प्रतिशत टैरिफ देना होगा।

ट्रंप के ताज़ा टैरिफ़ से पहले अमेरिका ने सितंबर 2025 में चाबहार पोर्ट पर प्रतिबंध लगा दिए थे, जिससे भारत की रणनीतिक योजना को बड़ा झटका लगा।

वह प्रतिबंध मुख्य रूप से ईरान में न्यूक्लीयर प्रोग्राम से जुड़ा है। हालाँकि, भारत ने अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय को अपनी योजना बताई कि वह पोर्ट से सभी गतिविधियाँ बंद कर देगा। इसके आधार पर भारत को 6 महीने की छूट मिली, जो 29 अक्टूबर 2025 से शुरू होकर 26 अप्रैल 2026 तक वैध है। लेकिन इस बीच, ईरान में ताज़ा हिंसा के बीच कुछ दिन पहले ही ट्रंप ने ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर 25 फीसदी का टैरिफ़ लगाया है।

भारत ने पूरा पैसा ईरान को दे दिया

द इकोनॉमिक टाइम्स ने सरकारी सूत्रों के हवाले से ख़बर आई है कि प्रतिबंध लगने से पहले ही भारत ने चाबहार पोर्ट के विकास के लिए वादा किया गया लगभग 120 मिलियन डॉलर यानी क़रीब 1000 करोड़ रुपये का पूरा पैसा ईरान को ट्रांसफर कर दिया है। यह पैसा मार्च 2016 में 10 साल के लंबे समझौते के अनुसार दिया गया।
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रिपोर्ट में एक सूत्र के हवाले से कहा गया, 'प्रतिबंध लगने पर पैसा ट्रांसफर करना मुश्किल हो जाता, इसलिए हमने पहले ही सारा पैसा दे दिया। अब भारत का चाबहार पर कोई वित्तीय दायित्व नहीं बचा है। ईरान अब इस पैसे से जो चाहे कर सकता है, जैसे क्रेन या अन्य उपकरण खरीदना और पोर्ट को खुद चलाना। भारत की कोई भूमिका नहीं रहेगी।'

निर्माण में लगी कंपनी बाहर निकल रही है!

चाबहार पोर्ट को चलाने और विकसित करने की जिम्मेदारी भारत पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड यानी आईपीजीएल के पास थी। यह पूरी तरह सरकारी कंपनी है। प्रतिबंध लगने के बाद आईपीजीएल के बोर्ड में सभी सरकारी निदेशकों ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया। कंपनी की वेबसाइट भी बंद कर दी गई ताकि पोर्ट से जुड़े किसी भी व्यक्ति पर प्रतिबंध का ख़तरा न हो। ईटी ने एक सरकारी सूत्र के हवाले से कहा है, 'भारत के पास चाबहार से निकलने के अलावा कोई चारा नहीं है। अच्छी बात ये है कि वहां हमारे कोई बड़े एसेट नहीं हैं। हम सिर्फ ईरानी कर्मचारियों की मदद से पोर्ट चला रहे थे। अब अमेरिका प्रतिबंध हटाए तभी हम वापस जा सकते हैं।'

विदेश मंत्रालय ने क्या कहा?

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा है, 'जैसा कि आप जानते हैं कि 28 अक्टूबर 2025 को यूएस के ट्रेजरी विभाग ने एक चिट्ठी जारी की थी जिसमें 26 अप्रैल 2026 तक वैलिड कंडीशनल सैंक्शन से छूट की जानकारी दी गई थी। हम इस व्यवस्था पर काम करने के लिए यूएस पक्ष के साथ बातचीत कर रहे हैं।'
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चाबहार पोर्ट भारत के लिए कितना अहम?

चाबहार पोर्ट ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर है। यह भारत को बिना पाकिस्तान से गुजरे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का समुद्र और जमीन से रास्ता देता है। यह प्रोजेक्ट क्षेत्रीय व्यापार और ट्रांजिट के लिए बेहद अहम है। यह पोर्ट इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर का हिस्सा है, जो 7200 किलोमीटर लंबा मल्टी-मोडल नेटवर्क है। इससे भारत, ईरान, अफगानिस्तान, अजरबैजान, रूस, मध्य एशिया और यूरोप के बीच माल की ढुलाई आसान होती है।

क्या बाद में वापसी संभव?

ट्रंप के नए 25% टैरिफ और ईरान में अस्थिरता से भारत के लिए चाबहार प्रोजेक्ट को जारी रखना बहुत मुश्किल हो गया। बता दें कि ईरान में पिछले कुछ हफ्तों से सरकार विरोधी बड़े प्रदर्शन हो रहे हैं, जिनमें कई लोगों की मौत की खबरें हैं। भारत की चाबहार में आगे भागीदारी अब ईरान पर अमेरिकी रुख पर निर्भर करेगी।