अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रंप के टैरिफ को रद्द करने के फैसले के बाद भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम ट्रेड डील पर बातचीत टल गई है। अब नई तारीख फिर से तय की जा रही है। यह मार्च में हो सकती है।
ट्रंप टैरिफ की घोषणा करते हुए। फाइल फोटो
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौते की बातचीत में अचानक रुकावट आ गई है। वाशिंगटन डीसी में सोमवार (23 फरवरी 2026) से शुरू होने वाली तीन दिवसीय बैठक को स्थगित कर दिया गया है, जिसमें समझौते के कानूनी पाठ को अंतिम रूप देने की योजना थी। यह फैसला अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद आया है, जिसमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत लगाए गए बड़े पैमाने के टैरिफ को अवैध करार दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाया कि ट्रंप ने आपातकालीन शक्तियों का दुरुपयोग कर टैरिफ नहीं लगा सकते, क्योंकि इसके लिए कांग्रेस की मंजूरी जरूरी है। फैसले के तुरंत बाद ट्रंप प्रशासन ने 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत अस्थायी टैरिफ लगाए, पहले 10% और फिर इसे बढ़ाकर 15% कर दिया। भारत के लिए यह दर फिलहाल 10% तय की गई है, जो पहले घोषित 18% से कम है।
दोनों देशों ने इस महीने की शुरुआत में एक फ्रेमवर्क पर सहमति जताई थी, जिसमें अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर टैरिफ को 18% तक कम करने और भारत द्वारा अमेरिकी उत्पादों की खरीद बढ़ाने का प्रावधान था। हालांकि, समझौता अभी औपचारिक रूप से हस्ताक्षरित नहीं हुआ था। भारतीय मुख्य वार्ताकार और उनकी टीम की अमेरिका यात्रा, जो रविवार को निर्धारित थी, अब स्थगित कर दी गई है। दोनों पक्षों ने संयुक्त रूप से कहा है कि "नई घटनाओं और उनके प्रभावों का मूल्यांकन करने के बाद" नई तारीख तय की जाएगी।
ट्रंप ने शुक्रवार को ही बयान दिया कि "भारत के साथ समझौते में कोई बदलाव नहीं है। भारत टैरिफ चुकाएगा और अमेरिका नहीं।" उन्होंने इसे "उलटा" करार दिया, जिसमें पहले भारत अमेरिका को "लूट" रहा था, लेकिन अब स्थिति बदल गई है।
वाणिज्य मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, टैरिफ नीति में आई इस अनिश्चितता के कारण बातचीत स्थगित की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह देरी भारत के लिए फायदेमंद हो सकती है, क्योंकि अमेरिकी उत्पादों को भारतीय बाजार में तत्काल पहुंच देने की जरूरत टल गई है। समझौता अभी हस्ताक्षरित नहीं होने से भारत की कोई बाध्यता नहीं है।
हिनरिच फाउंडेशन की ट्रेड पॉलिसी प्रमुख डेबोरा एल्म्स ने कहा, "कोर्ट के फैसले से इन 'नेपकिन डील्स' (कागजी समझौतों) की स्थिरता पर सवाल उठ गए हैं। यदि विदेशी सरकारें बातचीत दोबारा नहीं खोलतीं, तो कंपनियां IEEPA आधारित टैरिफ के खिलाफ मुकदमा कर सकती हैं।" उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका अब सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, ड्रोन, क्रिटिकल मिनरल्स और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में अनुचित व्यापार प्रथाओं की जांच शुरू करेगा, जिससे इन क्षेत्रों पर उच्च टैरिफ लग सकते हैं।
अमेरिका ने लगभग 20 व्यापार भागीदारों के साथ इसी तरह के फ्रेमवर्क समझौते किए हैं, लेकिन इनकी कानूनी वैधता पर सवाल हैं क्योंकि कांग्रेस की मंजूरी नहीं ली गई। भारतीय स्टील और एल्यूमिनियम उद्योग ने इन समझौतों के तहत छूट मांगी थी, लेकिन धारा 232 के तहत टैरिफ अभी भी लागू हैं।
फिलहाल दोनों देश स्थिति की समीक्षा कर रहे हैं। यह घटनाक्रम भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में नई चुनौतियां और अवसर दोनों ला सकता है, जबकि निर्यातकों को टैरिफ की अस्थिरता से निपटना पड़ रहा है। नई बैठक की तारीख जल्द तय होने की उम्मीद है।